Ranchi : JPSC-JSSC परीक्षा में कथित गड़बड़ी, पेपर लीक, ओएमआर में हेराफेरी और अवैध तरीके से अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के मामले में CID की जांच में गिरफ्तार आरोपियों के पारिवारिक और आपराधिक इतिहास से जुड़े कई तथ्य सामने आए हैं. CID की ओर से विशेष अदालत में दी गई जानकारी के मुताबिक, JPSC की परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी एजेंसी टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (TDPL) के निदेशक रामबीर सिंह ने वर्ष 2005 में उत्तर प्रदेश में दारोगा भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा पास की थी, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका. नौकरी नहीं मिलने के बाद वर्ष 2010 में उसने TDPL नाम से कंपनी शुरू की. शुरुआती दौर में कंपनी में रामबीर के साथ तारिक और सत्यपाल सिंह निदेशक थे. कंपनी शेयर मार्केटिंग, चुनाव संबंधी काम, टेंडर और आधार कार्ड से जुड़े कार्य करती थी. वर्ष 2013 में तारिक ने कंपनी से इस्तीफा दे दिया.
अभय तिवारी से मुलाकात के बाद बदला खेल
जांच में सामने आया है कि वर्ष 2022-23 के दौरान दिल्ली में रामबीर की मुलाकात मध्य प्रदेश के मुरैना निवासी लालू प्रसाद से हुई थी. लालू प्रसाद ने ही रामबीर की पहचान अभय तिवारी से कराई थी. CID के अनुसार, अभय तिवारी की मदद से TDPL को वर्ष 2023 में JPSC से जुड़ा काम मिला. जांच एजेंसी के मुताबिक, इसी दौरान TDPL की परीक्षा संचालन से जुड़ी गतिविधियों में भूमिका बढ़ती गई और बाद में JPSC की परीक्षा प्रक्रिया में कंपनी की पहुंच बनी.
उस्मान ने बनाई दूसरी कंपनी, फिर TDPL से जुड़ा कनेक्शन
मामले के दूसरे आरोपित मोहम्मद उस्मान ने वर्ष 2009 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी. वर्ष 2010 से 2016 तक उसने मेगा सॉफ्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड में तकनीकी सपोर्ट इंजीनियर के तौर पर काम किया. इसके बाद वर्ष 2017 में सहयोगी हेमंत कुमार वर्मा के साथ मिलकर पीकर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई.
लखनऊ मुख्यालय वाली यह कंपनी बैंकिंग क्षेत्र के लिए सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराती थी. वर्ष 2020 में हेमंत वर्मा के माध्यम से उस्मान की मुलाकात रामबीर सिंह से हुई. इसके बाद उसे उत्तर प्रदेश विधानसभा में आरओ और एआरओ परीक्षा के आवेदन फॉर्म तथा प्रवेश पत्र तैयार करने का काम मिला.
CID की जांच के अनुसार, वर्ष 2025 में रामबीर ने उस्मान से दोबारा संपर्क किया. इसके बाद झारखंड में भी JPSC से जुड़ी तकनीकी व्यवस्था तैयार कराने का आरोप सामने आया है. जांच एजेंसी का आरोप है कि इसी नेटवर्क के जरिए पैसे लेकर अभ्यर्थियों को अवैध तरीके से लाभ पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई.
श्वेता गुप्ता के कार्यकाल की भी जांच
मामले में गिरफ्तार JPSC की तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता के सेवा इतिहास की जानकारी भी CID ने अदालत के समक्ष रखी है. वर्ष 2010 में तीसरी JPSC परीक्षा के जरिए उनका चयन हुआ था. उनकी पहली पोस्टिंग रामगढ़ BDO के रूप में हुई थी. इसके बाद उन्होंने इटकी BDO, रांची में कार्यपालक दंडाधिकारी, महिला एवं बाल विकास तथा सामाजिक सुरक्षा विभाग में सहायक निदेशक और राजभवन में अवर सचिव के रूप में काम किया.
वर्ष 2024 में श्वेता गुप्ता JPSC में उप परीक्षा नियंत्रक बनीं. इस दौरान परीक्षा नियंत्रक के अवकाश पर रहने पर उन्होंने आयोग के कई महत्वपूर्ण कार्य संभाले. CID के अनुसार, उनके कार्यकाल में JPSC की 11वीं और 13वीं सिविल सेवा परीक्षा के साक्षात्कार हुए थे. पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते के आदेश पर परीक्षा परिणाम जारी किए जाने की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका रही थी.
CID अब गिरफ्तार आरोपियों की भूमिका, आपसी संपर्क और परीक्षा प्रक्रिया में उनकी कथित दखल की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है. मामले में सामने आ रहे दस्तावेजों और बयानों के आधार पर जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है.
