तीन राज्यों से चादरपोशी करने आते हैं मुरीद
कुर्बान अली शाह के मजार की प्रसिद्धि झारखंड सहित कई राज्यों में है. हर साल 20 और 21 मार्च को इनकी सलाना उर्स अकीदत के साथ मनायी जाती है. पीरे मुरशीद कुरबान अली शाह का जन्म सन् 1862 में सुरजुडीह गांव के एक इज्जतदार घराने में हुई थी. तीन साल की उम्र में ही इनके माता-पिता इन्हें छोड़कर इस दुनिया से चल बसे. चुंकि इनके दादा की मौत पहले ही हो चुकी थी. इसलिए कुर्बान अली शाह की दादी ने ही इनकी परवरिश का जिम्मा उठाया और कई मुश्किलों को झेलते हुए इनकी परवरिश की. हजरत अली कुर्बान अली शाह दिन रात खुदा की इबादत व रियाजत में बिताते थे. धीरे-धीरे इनके मुरीदों की तादाद बिहार के कई गांवों से लेकर बंगाल तक फैल गयी. इस दौरान इन्होंने कई करामात भी दिखाए. जिससे लोग समझ गए कुरबान अली शाह कोई आम इंसान नहीं बल्कि अल्लाह से सीधे नाता रखनेवाले हजरत पीर हैं. सन् 1947 में 85 वर्ष की उम्र में इस दुनियां से रूखसत हुए. इसके बाद इनकी याद में घरवालों ने सुरजुडीह में मजार बनवाया. तब से लेकर हर वर्ष 20 व 21 मार्च को हजारों की संख्या में लोग इनकी मजार पर चादरपोशी के लिए आते हैं. अमीर से लेकर गरीब हर तबके के लोग इनकी सलाना उर्स में शामिल होते हैं. डेढ़ दशक पूर्व तक इनकी सलाना उर्स सिर्फ 20 मार्च को ही होती थी लेकिन झारखंड, बिहार व पश्चिम बंगाल से आनेवाले हजारों की तादाद में मुरीदों की संख्या देखते हुए उर्स कमेटी की ओर दो दिन उर्स लगाने का निर्णय लिया गया. यह">https://lagatar.in/petarwar-mega-health-camp-will-be-held-in-pichhri-on-march-28/">यहभी पढ़ें : पेटरवार : 28 मार्च को पिछरी में लगेगा मेगा हेल्थ कैम्प [wpse_comments_template]

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