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किरीबुरु : सारंडा में हाथियों का कॉरिडोर प्रभावित होने से हाथी हो रहे हिंसक!

Kiriburu (Shailesh Singh) : सारंडा रिजर्व वन क्षेत्र स्थित टाटा स्टील की विजय-टू एवं सेल की विभिन्न खदानों के आसपास के जंगल क्षेत्रों में पिछले एक वर्ष से जंगली हाथियों की अचानक बढ़ी गतिविधियां गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है. हाथियों की गतिविधियों ने ग्रामीणों से अधिक इन खदान प्रबंधनों की परेशानी व तनाव निरंतर बढ़ा रही है. टाटा स्टील एवं सेल की सारंडा स्थित उक्त खदान से सटे जंगलों में हाथी निरंतर अपना आशियाना बनाकर एवं खदान से प्रभावित गांव क्षेत्रों में जाकर उत्पात मचा रहे हैं. इसे भी पढ़ें : नेशनल">https://lagatar.in/national-st-commission-team-reaches-bengal-to-investigate-sandeshkhali-case-will-visit-the-area/">नेशनल

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इस क्षेत्र के जंगल से हाथियों को भगाने के लिये बीते महीने वन विभाग को बंगाल की विशेषज्ञ टीम को बुलाना पड़ा था. अब पुनः हाथी आकर टाटा स्टील व सेल की खदानों के आसपास के गांवों व जंगलों में हाथी उत्पात मचाकर अनेक गंभीर सवाल खडा़ कर दिया है. उल्लेखनीय है कि सारंडा भारत का पहला नोटिफाईड एलिफैंट (हाथी) रिजर्व- ए क्षेत्र है. इसे हाथियों का वास स्थल कहा जाता है. इसे भी पढ़ें : पूर्व">https://lagatar.in/former-cm-hemants-bet-abua-housing-scheme-will-prove-to-be-a-game-changer-in-los-vis-elections/">पूर्व

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हाथी अपने वास स्थल सारंडा से विचरण करने कोल्हान, पोड़ाहाट, दलमा आदि जंगल होते धालभूमगढ़ के जंगल तक जाते एवं पुनः वहां से अपने कॉरिडोर से सारंडा वापस आते है. तब हाथी विभिन्न जंगलों के गांवों में उत्पात एंव जान-माल का नुकसान नहीं पहुंचाते थे. अब ऐसा क्या बदलाव हुआ जो हाथी हिंसा का रूप धारण कर जान-माल का भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं! यह यक्ष प्रश्न आज सभी के सामने खड़ा है. इसे भी पढ़ें : श्री">https://lagatar.in/31st-anniversary-of-shri-vaishnav-durga-temple-today-this-temple-is-a-symbol-of-devotion-devotion-and-faith/">श्री

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सारंडा में अनियंत्रित माइनिंग एवं भारी पैमाने पर इन्क्रोचमेंट की वजह से हाथियों के स्वभाव में भारी बदलाव हुआ है. लगभग 857 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला सारंडा में लगभग 200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में खनन कार्य चल रहा है जिसमें सेल और टाटा स्टील शामिल है. सैकड़ों एकड़ जमीन पर अवैध इन्क्रोचमेंट है. आजादी पूर्व ब्रिटिश सरकार ने सारंडा के विभिन्न क्षेत्रों में अपने उद्देश्य हेतु 10 जंगल गांव थलकोबाद, तिरिलपोसी, नवागाँव (एक और दो), करमपदा, भनगाँव, दिघा, बिटकिलसोय, बालीबा एंव कुमडीह को बसाया था. इसके अलावे दर्जनों राजस्व गाँव थे, जिनकी आबादी मुश्किल से 10-15 हजार के करीब होगी. इसे भी पढ़ें : श्री">https://lagatar.in/31st-anniversary-of-shri-vaishnav-durga-temple-today-this-temple-is-a-symbol-of-devotion-devotion-and-faith/">श्री

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आज सारंडा में झारखण्ड आंदोलन एंव वनाधिकार पट्टा के नाम पर भारी पैमाने पर जंगलों को काट जमीन पर कब्जा कर दर्जनों अवैध गाँव बसाया गया. जिससे सारंडा पर जनसंख्या का भारी बोझ बढ़कर आबादी लगभग 60-70 हजार के करीब पहुंच गई है. सारंडा पर बढा़ जनसंख्या का बोझ का लाभ लकड़ी माफिया लकड़ी तस्करी के रूप में उठाने लगे हैं. जिससे लगभग 25-30 फीसदी सारंडा का सघन वन क्षेत्र पहले हीं खत्म हो गया. अर्थात खनन कम्पनियों को खनन हेतु लिज दिये जाने तथा अवैध इन्क्रोचमेंट ने सारंडा में हाथियों का घर और कौरिडोर को अलग-अलग क्षेत्रों में खंडित कर दिया. जिससे हाथियों का मूवमेंट रूक गया. इसी वजह से हाथियों एंव आदमी में टकराव बढ़ गया. इसे भी पढ़ें : गिरिडीह">https://lagatar.in/giridih-family-welfare-day-celebrated-in-8-panchayats-including-village/">गिरिडीह

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विकास और रोजगार के नाम पर सारंडा में औद्योगीकरण, खनन, सड़कों का जाल आदि बढा़ने, दिन-रात भारी मशीनों एंव वाहनों के चलने से होने वाली कंपन दूर बैठे हाथियों का बाईलौजिकल क्लौक को प्रभावित कर रहा है. जबकि सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद रिजर्व वन क्षेत्र में भारी मशीनों एंव वाहनों का परिचालन पर प्रतिबंध है. अनियंत्रित खनन, टाटा स्टील की खदानों से लाखों टन फाइन्स चेकडैम को तोड़कर बहना, अवैध इन्क्रोचमेंट से होने वाला भूमि धसान आदि वजहों से सारंडा की तमाम प्राकृतिक जलश्रोत एंव कारो-कोयना जैसी बडी़ नदियों का अस्तित्व खत्म होते जा रहा है, जिससे हाथियों के सामने पानी व तमाम प्रकार की समस्या उत्पन्न हो रही है. [wpse_comments_template]

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