Search

Advertisement
Advertisement
Advertisement

किरीबुरु : किसानों का दर्द- हम अत्यंत गरीब हैं, गाय का दूध शहर चला जाता है

Kiriburu (Shailesh Singh) : ...साहब, हम अत्यंत गरीब हैं, गाय पालते हैं तो गोबर मिलता है. उससे गोइठा बनाते हैं. गाय का दूध तो शहर चला जाता है. हम और हमारे बच्चे दूध का सेवन नहीं कर पाते हैं. पौष्टिक आहार के अभाव में  हमारे बच्चे कुपोषण का शिकार होकर दम तोड़ देते हैं..., यह बातें सारंडा के गांवों के ग्रामीणों व किसानों ने कहीं. 23 अगस्त को किरीबुरु में लगने वाले साप्ताहिक मंगलाहाट में सारंडा के सुदूरवर्ती गांवों से पैदल अथवा अन्य माध्यमों से लगभग 30-40 किलोमीटर दूरी तय कर कृषि व वनोत्पाद बेचने आये किसानों की स्थिति दिखी. हालांकि ऐसा नजारा सिर्फ किरीबुरु जैसे हाट-बाजारों में हीं नहीं बल्कि पश्चिम सिंहभूम जिले के तमाम हाट-बाजारों में देखने को मिलता है. सारंडा के गांवों से आने वाले लगभग 80 फीसदी पुरुष व महिला किसान जितना कृषि व वन उत्पाद बेचने के लिये लाते हैं, उतनी सब्जियां तो यहां रहने वाले एक परिवार के लोगों के लिये एक समय का भोजन होता है. जितना सब्जी ये बेचने लाते हैं, उतनी सब्जी की इन्हें स्वयं जरुरत रहती है. फिर भी ये दर्जनों किलोमीटर पैदल सारंडा की ऊंची पहाड़ी को चढ़ दो पैसे की आस में यहां सब्जी बेचने आते हैं, ताकि इससे मिलने वाले पैसों से वे जरुरत की अन्य सामग्री खरीद सकें. इसे भी पढ़ें : जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-potka-on-27th-and-janta-durbar-of-deputy-commissioner-to-be-held-at-bodam-block-headquarters-on-29th-august/">जमशेदपुर

: 27 को पोटका व 29 अगस्त को बोड़ाम प्रखंड मुख्यालय में लगेगा उपायुक्त का जनता दरबार

किसी भी गांव में सिंचाई की व्यवस्था नहीं है : लक्ष्मण हुनी पूर्ति

https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/Kiriburu-Hat-1.jpg"

alt="" width="1156" height="521" /> किरीबुरु से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धर्नादिरी गांव निवासी लक्ष्मण हुनी पूर्ति ने लगातार न्यूज से बातचीत में कहा कि हम ग्रामीण जी रहे हैं, यही सबसे बड़ी बात है. सारंडा के किसी भी गांव में सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है. हमारा खेत अथवा जमीन सिर्फ नाम के लिये है. उस पर वे वर्षा आधारित खेती करते हैं. सही समय पर वर्षा नहीं हो तो पैदावार भी घाटे का हो जाता है. खेती इतनी ही होती है कि उसका इस्तेमाल हम स्वयं व बच्चों के पौष्टिक आहार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर उसे बाजार में बेच दो पैसा प्राप्त करते हैं. इसी दो पैसों से हम दवा, राशन सामग्री आदि अन्य जरूरत का सामान खरीदते हैं. इसे भी पढ़ें : चाकुलिया">https://lagatar.in/chakulia-the-unique-gift-of-nature-is-spreading-its-unique-shade-the-consummate-waterfall-of-ghaghra/">चाकुलिया

: अनुपम छटा बिखेर रहा प्रकृति का अनूठा उपहार घाघरा का घाघ झरना

मुर्गी व बकरी भी बेचने के लिए पालते हैं

https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/Kiriburu-hat-2.jpg"

alt="" width="1156" height="521" /> सारंडा के अन्य ग्रामीण जो पशुपालन भी करते हैं, उसने बताया की हम गाय पालते हैं तो गोबर मात्र पाते हैं. दूध को पूरा बेच देते हैं. बच्चों के पीने के लिये दूध नहीं रख पाते हैं. मुर्गी व बकरी भी पालते हैं. इसे भी हम हाट-बाजार में बेच जरूरत का सामान खरीदते हैं. कई बार तो अज्ञात बीमारी से हमारी सभी मुर्गी व बकरियां मर जाती हैं. इससे भारी नुकसान होता है. हमारे पास जीविकोपार्जन का दूसरा कोई संसाधन नहीं है. [wpse_comments_template]

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही