Kiriburu (Shailesh Singh) : सारंडा जंगल में वर्तमान समय में गंभीर पर्यावरणीय और पारिस्थितिकी समस्याएं बड़े पैमाने पर वनों और वृक्षों की कटाई के कारण उत्पन्न हुई हैं, और हो रही है. जैसे- मिट्टी के क्षरण का बढ़ना, मिट्टी का कटाव और जमाव के कारण नदियों का रुकना, तापमान और बाढ़ में वृद्धि होना इत्यादि है. सारंडा रिजर्व वन के अध्ययन से पता चलता है कि एक समय यह घने जंगलों में से एक था और पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं में बहुत ही समृद्ध था. खनन गतिविधियाँ, जंगल में नए गांवों का बसना, नक्सली हिंसा और लकड़ीयों की तस्करी आदि के कारण वन क्षेत्र संकोचन के लिए मुख़्य रुप से ज़िम्मेदार हैं. इसे भी पढ़ें : चांडिल">https://lagatar.in/chandil-devotees-became-emotional-after-listening-to-the-story-of-bal-gopal-and-yashoda-maiya/">चांडिल
: बाल गोपाल और यशोदा मैया की कथा सुनकर भावविभोर हुए भक्त
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alt="" width="600" height="400" /> इसके परिणामस्वरूप पहाड़ी वन क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और बारहमासी जल स्रोतों का रुकना और सुखना है. यह अनुमान लगाया गया है कि दस हजार हेक्टेयर से अधिक अनछुए जंगल जहाँ 80 प्रतिशत कैनोपी के कवर में चल रहे खनन गतिविधियाँ तथा जंगल के कई हिस्सों में नए गांवों के बसने की वजह से तबाह और बरबाद हो गया है. सारंडा रिजर्व वन के विनाश के कारण वनस्पतियों और जीवों की कई दुर्लभ प्रजातियाँ विलुप्त हो गई और कुछ विलुप्त होने के कगार पर है. इसी तरह अगर इसका विनाश होता गया तो एक दिन यह वन भूमि बंजर भूमि बन जाएगी. इसे भी पढ़ें : किरीबुरु">https://lagatar.in/kiriburu-police-crpf-and-cobra-remained-worried-for-hours-after-the-loud-sound-of-explosion-in-saranda/">किरीबुरु
: सारंडा में विस्फोट की तेज आवाज के बाद पुलिस, सीआरपीएफ व कोबरा घंटों रहे परेशान
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alt="" width="600" height="400" /> झारखंड राज्य के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित सारंडा एक घना जंगल है. यह क्षेत्र पूर्व में सिंह परिवार (निजी तौर पर सरायकेला का शाही परिवार) का निजी शिकार करने का क्षेत्र था. यह जंगल 820 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ हैं. सारंडा का शाब्दिक अर्थ 700 पहाड़ी है. जिसका पारिस्थितिकीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो कि दुनिया में सबसे बड़ा साल का जंगल है. सारंडा कई दशकों तक के लिए फॉरेस्टरों की पीढ़ियों के लिए प्रशिक्षण का स्कूल रहा है. इसे भी पढ़ें : भड़काऊ">https://lagatar.in/maulana-azhari-arrested-from-mumbai-for-giving-inflammatory-speech/">भड़काऊ
भाषण देने के आरोप में मुंबई से मौलाना अजहरी गिरफ्तार, जूनागढ़ ले गयी गुजरात एटीएस
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alt="" width="600" height="400" /> यह प्रमुख रुप से हाथियों का निवास/आवास स्थल है. यह मुख्य रूप से सिंहभूम हाथी रिजर्व है, जिसमें लगभग 150 हाथियों का झुडं था जो 820 वर्ग किमी वन में रहता था. 2001 में केंद्र सरकार ने हाथी परियोजना के तहत यह क्षेत्र हाथी आरक्षित घोषित किया था. जिसमें हाथियों की संख्या 2002 में 424 से घटकर 2005 में 375 हो गई थी. अभी इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है. नदियों के पानी में अधिक लौह अयस्क की मात्रा पाये जाने के कारण पानी पीने के लिए अयोग्य हो गया और अयस्कों को ढ़ोने वाले ट्रकों की आवाज ने सारंडा के हाथियों को डरा दिया जिससे हाथी सारंडा से दूर होते चले गए, जो इनका मुख्य क्षेत्र था. इसे भी पढ़ें : रांची">https://lagatar.in/ranchi-this-year-10-state-service-officers-came-under-the-scanner-for-corruption/">रांची
: इस साल भ्रष्टाचार की आंच में आ गए राज्य सेवा के 10 अफसर डॉ. आरके सिंह के अनुसार, जिन्होंने 1993 से 1998 के बीच सारंडा में वन्यप्राणियों पर डॉक्ट्रेट का शोध किया था: खनन, के साथ नदियों में अप्रबंधित छिद्र/सिल्ट निपटान हाथियों के संरक्षण के लिए सबसे बड़ा खतरा है. एमओईएफएंडसीसी द्वारा लिखित गज रिपोर्ट ने हाथी टास्क फोर्स का गठन किया गया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस क्षेत्र में खनन करने के लिए संवैधानिक रुप से प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा गठन किए गए राष्ट्रीय हाथी संरक्षण प्राधिकरण से प्राप्त अनुमोदन के बाद ही खनन किया जा सकता है. यह खनन कार्य सारंडा की आत्मा को मार रहा है. इसे भी पढ़ें : जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-mango-man-missing-for-two-days-complaint-to-police/">जमशेदपुर
: मानगो का शख्स दो दिन से लापता, पुलिस से शिकायत इस प्राचीन साल वन के नीचे लौह अयस्क का भंडार विश्व और एशिया महादेश के भंडारों में से एक है. सारंडा के मौजूदा खदानों ने पहले ही सारंडा की व्यापकता को नष्ट कर दिया है. यह अनुमान लगाया गया है कि 80 प्रतिशत से अधिक अनछुए जंगल के 11000 हेक्टेयर कुंडली जंगल के कई हिस्सों में चल रहे खनन से तबाह हो गया है. जैसे गुआ, घाटकुडी़, हाथी गेट, बरायबुरु, टाटिबा, झंडीबुरु, किरीबुरु-मेघाहातुबुरु, चिरिया/मनोहरपुर ``एलिफेंट हिल`` इत्यादि. इससे भी बदतर स्थिति तब हो जाएगी जब लौह अयस्क के नये नये खदानों का ऑक्सन होगा और भारत की बड़ी-बड़ी इस्पात कंपनियों को भविष्य में खनन हेतु हरी झंडी मिल जायेगी. यहाँ इस्पात कंपनियां सारंडा के उपर गिद्धों जैसी दृष्टि जमाए हुए इस खुबसुरत जंगल के मरने की प्रतीक्षा कर रहे है. इसे भी पढ़ें : रांची">https://lagatar.in/ranchi-section-144-imposed-within-100-meters-of-assembly-complex-on-5-6-february/">रांची
: 5-6 फरवरी को विधानसभा परिसर के 100 मीटर के दायरे में धारा 144 लागू सारंडा में साल (शोरिया रोबस्टा) सबसे महत्वपूर्ण पेड़ है और इस क्षेत्र की चट्टानी मिट्टी के लिए उपयोगी है. यद्पि साल एक पेडीड्युल पेड़ है, जिसकी पत्तियों की शुरुआत गर्मियों में होती है. वैसे भी वन वृक्ष आम तौर पर सदाबहार होता है, इस प्रकार के पेड़ों में आम, जामुन, कटहल हैं. अन्य महत्वपूर्ण पेड़ महुआ, इमली, चहार, केंदू, सागवान, कुसुम, तिलई, हरिन हारा (आर्मोसा रोहितुला), गैलर (फ़िसस ग्लोमेरेटा), आसन आदि हैं. आरक्षित वन कई जानवरों का अड्डा और निवास स्थल है. सारंडा के वनों में जंगली हाथी, सांबर, जंगली सुअर, जंगली मुर्गी और कुटरा (जंगली बकरी), मोर के झुंड जंगलों के आसपास घूमते हुए मिल जाते हैं. इसे भी पढ़ें : किरीबुरु">https://lagatar.in/kiriburu-foundation-day-of-lokeshwarnath-dham-temple-on-10th-february/">किरीबुरु
: 10 फरवरी को लोकेश्वरनाथ धाम मंदिर का स्थापना दिवस इस जंगल में बाइसन और तेंदुए पाए जाते हैं. बाघ यहाँ कभी भी नहीं थे लेकिन कई बार देखे जाने का दावा किया गया हैं. तेंदुए सामान्यतः यहाँ पाए जाते हैं. मध्य भारत में हाथियों का निवास 17000 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैला हुआ हैं, झारखंड राज्य से ओडिशा और पश्चिम बंगाल के एक दक्षिणी भाग हाथियों को अंजू-अंबिया गलियारे का उपयोग सरंडा से कोल्हान वन डिवीजन में करने के लिए किया गया है. और इस रेंज में देश के सबसे ज्यादा हाथियों के निवास स्थान पर कब्जा कर लिया गया है, जो कि खनन, खेती और विकास गतिविधियों के कारण हो गया है. इसे भी पढ़ें : गोड्डा">https://lagatar.in/sushil-jha-again-becomes-the-president-of-godda-advocates-association-yogesh-jha-occupies-the-post-of-general-secretar/">गोड्डा
अधिवक्ता संघ का सुशील झा फिर बने अध्यक्ष, महासचिव पद पर योगेश झा का कब्जा सारंडा वन, वन्य जीवन का सुनहरा खजाना है. यह जगह 40 से अधिक वन्यप्राणियों की प्रजातियों के साथ समृद्ध है. 162 प्रजातियां पक्षियों के, 9 प्रजातियां उभयचर के और 33 प्रजाति सरीसृपों के हैं. सारंडा रोमांचक, रंगीन वनस्पतियों और जीवों से भरा हुआ है. यह अपने राजसी साल के वृक्षों के लिए जाना जाता है जो विश्व प्रसिद्ध है. साल के अलावा, बहुत से प्रमुख पेड़ प्रजाति है, जिसमें बड़ी संख्या में वृक्ष, जड़ी-बूटियां और झाड़ी की सजावट का यह खूबसूरत जंगल है. सारंडा की पहाड़ियों में किरिबुरु की जादुई सूर्योदय और सूर्यास्त शानदार है जिसका नजारा देखने भारत के प्रत्येक प्रांत से लोग आते है. इसके अलावे लिगीरदा स्वाद एक वनस्पति स्वर्ग है जो 7-8 एकड़ में फैला हुआ है. यह संकीर्ण दलदली भूमि जो थलकोबाद वन विश्रामगृह से 4 किमी दूर है. थलकोबाद से 10 किमी दूर टॉयबो समेत अन्य प्राकृतिक झरने है, इस झरने की घाटी हाथियों के लिए एक आदर्श मैदान है जो अक्सर इस जगह का दौरा करते हैं. इसे भी पढ़ें : गोड्डा">https://lagatar.in/sushil-jha-again-becomes-the-president-of-godda-advocates-association-yogesh-jha-occupies-the-post-of-general-secretar/">गोड्डा
अधिवक्ता संघ का सुशील झा फिर बने अध्यक्ष, महासचिव पद पर योगेश झा का कब्जा खनन के प्रभाव से मिट्टी का क्षरण, सिंकहोलों का गठन, जैव विविधता का नुकसान, खनन प्रक्रिया से रसायनों द्वारा मिट्टी, भूजल और सतह के पानी को प्रदूषित करता हैं. खनन कंपनियों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता होगी कि जो क्षेत्र खनन कार्य के लिए वन विभाग से मिला है वह खनन करने के उपरांत वन विभाग को मूल रुप में वापस कर दिया जाएगा. सभी खनन कंपनियों एमआईओएफसीसी और वन विभाग द्वारा अनुमोदित क्षेत्र से अधिक वन भूमि का उपयोग कर रहे हैं. इसे भी पढ़ें : बालूमाथ">https://lagatar.in/balumath-seven-day-rudra-mahayagya-inauguration-of-branch-office/">बालूमाथ
: सात दिवसीय रूद्र महायज्ञ, शाखा कार्यालय का उद्घाटन अनुमोदित क्षेत्र में खनन और संबद्ध गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के लिए एक समिति का गठन किया जाना चाहिए और जुर्माना लगाया जाना चाहिए या खनन कार्य बंद होना चाहिए जहाँ खनन कंपनियाँ एमआईओएफसीसी की सिफारिशों का पालन नहीं करती हैं. केंद्र या राज्य सरकार की एजेंसियां जैसे एमआईओएफसीसी, आईबीएम, खनन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वन विभाग आदि क्षेत्रों का निरीक्षण कर रहे हैं, लेकिन वे अवैध खनन गतिविधियों के खिलाफ पारिस्थितिक संतुलन के अस्तित्व के लिए पूर्ण विवरणों का निरीक्षण नहीं कर पा रहे हैं. इस प्राचीन साल वन के नीचे लौह अयस्क के देश के सबसे अमीर खजाने में से एक है. लेकिन मौजूदा खानों ने सरंडा डिवीजन के 85,000 हेक्टेयर (हेक्टेयर) में सारंडा के स्वैपों को पहले ही क्षतिग्रस्त कर दिया है. इसे भी पढ़ें : गिरिडीह">https://lagatar.in/giridih-awarding-bharat-ratna-to-advani-is-a-matter-of-pride-for-the-country-laxman-singh/">गिरिडीह
: आडवाणी को भारत रत्न देना देश के लिए गर्व की बात- लक्ष्मण सिंह लगभग 16 संख्या में खनन कंपनियाँ लौह अयस्क खनन पट्टा क्षेत्र के 6526.369 हेक्टेयर में काम कर रही थी, और 2892.344 हेक्टेयर में खानों की एफसी लंबित होने के कारण 11 खनन पट्टे का क्षेत्र बंद हो गया है. एमआईओएफसीसी के प्रस्ताव 6505.50 हेक्टेयर के लिए प्रस्तावित खनन पट्टों का आवेदन कुदलीबाद, करमपदा और घाटकुडी़ इत्यादि क्षेत्रों में विभिन्न कंपनियों द्वारा सारंडा में खनन पट्टा के लिए आवेदन दिया था. कुल खनन पट्टों (वर्तमान + बंद + प्रस्तावित) क्षेत्र 15924.013 हेक्टेयर है. लौह अयस्क खनन के बाद इस वन में क्या बचेगा कहना मुश्किल है. इसे भी पढ़ें : लातेहार">https://lagatar.in/latehar-obc-ekta-rath-leaves-regional-conference-to-be-held-on-11th/">लातेहार
: ओबीसी एकता रथ रवाना, 11 को होगा प्रमंडलीय सम्मेलन यह सारंडा जंगल के भविष्य के लिए उभरने वाली जलती हुई समस्याएं हैं. जंगल के आसपास के क्षेत्रों में अवैध खनन बड़े पैमाने पर हो रहे थे जो अभी बंद है. हजारों ट्रकों की वजह से चाईबासा से नोवामुंडी की सड़कों पर जाम लगते थे जिससे गांव के लोगों और पारिस्थितिकी के लिए गंभीर संकट था. जब से एमबी साह आयोग की यात्रा/दौरा हुआ तब से सारंडा में अवैध खनन बंद हो गया है. इसे भी पढ़ें : लातेहार">https://lagatar.in/latehar-crpf-distributed-goods-appeal-to-take-benefits-of-schemes/">लातेहार
: सीआरपीएफ ने बांटा सामान, योजनाओं का लाभ लेने की अपील कारो और कोयना दो बारहमासी नदियाँ हैं जो इस क्षेत्र के जल निकासी व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. खनन और संबद्ध गतिविधियों (कॉलोनी के लिए पानी की आपूर्ति सहित) के लिए पानी का स्रोत है. सारंडा के कारो नदी और कोयना नदी खनन और संबंधित गतिविधियों के कारण व्यापक रुप से प्रदूषित हो गया है, यह गर्मियों के दौरान हाथियों के लिए एक आवश्यक जल स्रोत भी है. जैसा कि नदियों और जंगलों में सूखा पड़ने और सूख जाने के कारण हाथियों का झुंड पड़ोसी राज्य ओडिशा व छत्तीसगढ़ में चला जाता है. जिससे गंभीर संघर्ष उत्पन्न हो जाता है, जो जीवन और आजीविका के लिए बहुत ही नुकसानदायक होता है. इसे भी पढ़ें : हजारीबाग">https://lagatar.in/hazaribagh-vishwakarma-samaj-protest-in-ranchi-on-18th-february/">हजारीबाग
: 18 फरवरी को रांची में विश्वकर्मा समाज का धरना क्योंकि हम जंगलों को और अधिक टुकड़े - टुकड़े करते चले जा रहे हैं. खनन पट्टा क्षेत्र से मानसून के दौरान अतिरिक्त रन-ऑफ वॉटर कोयना और कारो नदी में बह कर जाता है, जो कि सक्रिय खनन क्षेत्र, ओव्हरबर्डन डंप, कच्ची सड़कों और पट्टे के अंदर अबाधित प्राकृतिक वन क्षेत्र के प्राकृतिक मिट्टी के कणों को नष्ट कर देता है, जहां कोई खनन गतिविधियाँ नहीं है. इसे भी पढ़ें : राजधानी">https://lagatar.in/rahul-gandhis-public-meeting-tomorrow-in-the-capital-ranchi-telangana-cm-will-also-attend/">राजधानी
रांची में राहुल गांधी की आमसभा कल, तेलंगाना के सीएम भी होंगे शामिल यह मानसून के दौरान अधिक से अधिक होता है. इसके अलावा भी अयस्क धुलाई के कारण भी नदियों में सिल्ट जमाव या बहाव के कारण पानी की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है. नदियों के जल की ग़ुणवत्ता को बनाए रखना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जो पीने के पानी के स्रोत के रूप में काम करता है. सारंडा जंगल के अंदर रहने वाले गांवों के लोग, और जीव - जन्तु इन्हीं नदियों पर निर्भर रहते है. यह दोनों नदियां पुरे सारंडा में बसे छोटे – छोटे औद्योगिक नगरों की प्यास बुझाती है. इसे भी पढ़ें : लातेहार">https://lagatar.in/latehar-crpf-distributed-goods-appeal-to-take-benefits-of-schemes/">लातेहार
: सीआरपीएफ ने बांटा सामान, योजनाओं का लाभ लेने की अपील 20-40 वर्षों से खानों में रोज़गार की वजह से खनन पट्टा के आस पास के वन क्षेत्र में दर्जनों नए गांव बसे हैं. लोगों ने फसलों के लिए और झोपड़ियों को बनाने के लिए नाले और नदियों के नजदीक के हजारों एकड़ वनों को नष्ट कर पेड़ों को काट दिया है. सरंडा साल के साल, सगवान, बिजा और गमहार महंगे पेड़ हैं और फर्नीचर बनाने के लिए बहुत उपयोगी हैं. ये महंगी पेड़ रात में जंगल माफिया द्वारा काटी जा रही हैं. भारत सरकार ने सारंडा विकास योजना माओवादी त्रस्त गांवों के विकास के लिए बनाया था. इसे भी पढ़ें : बेरमो">https://lagatar.in/bermo-gomiya-residents-will-soon-get-clean-water-from-konar-river-chandraprakash/">बेरमो
: गोमिया वासियों को जल्द मिलेगा कोनार नदी का साफ पानी- चंद्रप्रकाश उस योजना में बताया गया था कि माओवादियों के कई प्रशिक्षण शिविर सारंडा में स्थित है. उस समय लगभग 56 गांवों में 36,500 से अधिक की आबादी वाले करीब 7000 आदिवासी परिवार रहते थे, जिनकी संख्या अब बढ़ चुकी हैं. इस विकास योजना में इंदिरा आवास योजना के तहत मकान बनाना, मनरेगा कार्यों के लिए स्थानीय आदिवासी युवकों को रोज़गार मित्र की नियुक्ति, सभी बस्तियों के लिए कनेक्टिविटी में सुधार के लिए पीएमजीएसवाई के तहत सड़कों और पूलों का निर्माण, आईडीसी सेंटर इत्यादि किया जाना था. लेकिन सभी भारी भ्रष्टाचार का भेंट चढ़ गया. इसे भी पढ़ें : पलामू">https://lagatar.in/palamu-dead-body-of-a-newborn-found-at-the-crematorium/">पलामू
: श्मशान घाट पर मिला नवजात का शव सारंडा वन प्रकृति का उपहार है, और इसे निम्नलिखित कदम उठाकर संरक्षित और सुरक्षित किया जाना चाहिए. अंधाधुंध वनों की कटाई पर रोक लगाई जानी चाहिए और ईंधन के रुप में प्रयोग होने वाली लकड़ी की बर्बादी को बचाया जाना चाहिए. ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत, जैसे बायोगैस का उपयोग ईंधन की लकड़ी के पूरक के लिए किया जाना चाहिए. इसे भी पढ़ें : अपराधी">https://lagatar.in/criminals-do-not-recognize-geographical-boundaries-law-enforcement-agencies-should-not-consider-borders-as-obstacles-amit-shah/">अपराधी
भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानते,कानून प्रवर्तन एजेंसियां सीमाओं को बाधा नहीं मानें : अमित शाह वनों की आग को रोका जाना चाहिए और कृषि के लिए अयोग्य क्षेत्रों में बड़े वनीकरण किए जाने चाहिए. जंगल के पेड़ों की कीटों और बीमारियों को रासायनिक और जैविक रूप से नियंत्रित किया जाना चाहिए. जंगलों में मवेशियों की चराई को हतोत्साहित किया जाना चाहिए. पेड़ों की कटाई में भेदभाव होना चाहिए. वनों की कटाई वाले क्षेत्रों का वनीकरण किया जाना चाहिए. लौह अयस्क का खनन हेतु और लीज देने से बचना चाहिये. [wpse_comments_template]
: बाल गोपाल और यशोदा मैया की कथा सुनकर भावविभोर हुए भक्त
alt="" width="600" height="400" /> इसके परिणामस्वरूप पहाड़ी वन क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और बारहमासी जल स्रोतों का रुकना और सुखना है. यह अनुमान लगाया गया है कि दस हजार हेक्टेयर से अधिक अनछुए जंगल जहाँ 80 प्रतिशत कैनोपी के कवर में चल रहे खनन गतिविधियाँ तथा जंगल के कई हिस्सों में नए गांवों के बसने की वजह से तबाह और बरबाद हो गया है. सारंडा रिजर्व वन के विनाश के कारण वनस्पतियों और जीवों की कई दुर्लभ प्रजातियाँ विलुप्त हो गई और कुछ विलुप्त होने के कगार पर है. इसी तरह अगर इसका विनाश होता गया तो एक दिन यह वन भूमि बंजर भूमि बन जाएगी. इसे भी पढ़ें : किरीबुरु">https://lagatar.in/kiriburu-police-crpf-and-cobra-remained-worried-for-hours-after-the-loud-sound-of-explosion-in-saranda/">किरीबुरु
: सारंडा में विस्फोट की तेज आवाज के बाद पुलिस, सीआरपीएफ व कोबरा घंटों रहे परेशान
alt="" width="600" height="400" /> झारखंड राज्य के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित सारंडा एक घना जंगल है. यह क्षेत्र पूर्व में सिंह परिवार (निजी तौर पर सरायकेला का शाही परिवार) का निजी शिकार करने का क्षेत्र था. यह जंगल 820 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ हैं. सारंडा का शाब्दिक अर्थ 700 पहाड़ी है. जिसका पारिस्थितिकीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो कि दुनिया में सबसे बड़ा साल का जंगल है. सारंडा कई दशकों तक के लिए फॉरेस्टरों की पीढ़ियों के लिए प्रशिक्षण का स्कूल रहा है. इसे भी पढ़ें : भड़काऊ">https://lagatar.in/maulana-azhari-arrested-from-mumbai-for-giving-inflammatory-speech/">भड़काऊ
भाषण देने के आरोप में मुंबई से मौलाना अजहरी गिरफ्तार, जूनागढ़ ले गयी गुजरात एटीएस
alt="" width="600" height="400" /> यह प्रमुख रुप से हाथियों का निवास/आवास स्थल है. यह मुख्य रूप से सिंहभूम हाथी रिजर्व है, जिसमें लगभग 150 हाथियों का झुडं था जो 820 वर्ग किमी वन में रहता था. 2001 में केंद्र सरकार ने हाथी परियोजना के तहत यह क्षेत्र हाथी आरक्षित घोषित किया था. जिसमें हाथियों की संख्या 2002 में 424 से घटकर 2005 में 375 हो गई थी. अभी इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है. नदियों के पानी में अधिक लौह अयस्क की मात्रा पाये जाने के कारण पानी पीने के लिए अयोग्य हो गया और अयस्कों को ढ़ोने वाले ट्रकों की आवाज ने सारंडा के हाथियों को डरा दिया जिससे हाथी सारंडा से दूर होते चले गए, जो इनका मुख्य क्षेत्र था. इसे भी पढ़ें : रांची">https://lagatar.in/ranchi-this-year-10-state-service-officers-came-under-the-scanner-for-corruption/">रांची
: इस साल भ्रष्टाचार की आंच में आ गए राज्य सेवा के 10 अफसर डॉ. आरके सिंह के अनुसार, जिन्होंने 1993 से 1998 के बीच सारंडा में वन्यप्राणियों पर डॉक्ट्रेट का शोध किया था: खनन, के साथ नदियों में अप्रबंधित छिद्र/सिल्ट निपटान हाथियों के संरक्षण के लिए सबसे बड़ा खतरा है. एमओईएफएंडसीसी द्वारा लिखित गज रिपोर्ट ने हाथी टास्क फोर्स का गठन किया गया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस क्षेत्र में खनन करने के लिए संवैधानिक रुप से प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा गठन किए गए राष्ट्रीय हाथी संरक्षण प्राधिकरण से प्राप्त अनुमोदन के बाद ही खनन किया जा सकता है. यह खनन कार्य सारंडा की आत्मा को मार रहा है. इसे भी पढ़ें : जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-mango-man-missing-for-two-days-complaint-to-police/">जमशेदपुर
: मानगो का शख्स दो दिन से लापता, पुलिस से शिकायत इस प्राचीन साल वन के नीचे लौह अयस्क का भंडार विश्व और एशिया महादेश के भंडारों में से एक है. सारंडा के मौजूदा खदानों ने पहले ही सारंडा की व्यापकता को नष्ट कर दिया है. यह अनुमान लगाया गया है कि 80 प्रतिशत से अधिक अनछुए जंगल के 11000 हेक्टेयर कुंडली जंगल के कई हिस्सों में चल रहे खनन से तबाह हो गया है. जैसे गुआ, घाटकुडी़, हाथी गेट, बरायबुरु, टाटिबा, झंडीबुरु, किरीबुरु-मेघाहातुबुरु, चिरिया/मनोहरपुर ``एलिफेंट हिल`` इत्यादि. इससे भी बदतर स्थिति तब हो जाएगी जब लौह अयस्क के नये नये खदानों का ऑक्सन होगा और भारत की बड़ी-बड़ी इस्पात कंपनियों को भविष्य में खनन हेतु हरी झंडी मिल जायेगी. यहाँ इस्पात कंपनियां सारंडा के उपर गिद्धों जैसी दृष्टि जमाए हुए इस खुबसुरत जंगल के मरने की प्रतीक्षा कर रहे है. इसे भी पढ़ें : रांची">https://lagatar.in/ranchi-section-144-imposed-within-100-meters-of-assembly-complex-on-5-6-february/">रांची
: 5-6 फरवरी को विधानसभा परिसर के 100 मीटर के दायरे में धारा 144 लागू सारंडा में साल (शोरिया रोबस्टा) सबसे महत्वपूर्ण पेड़ है और इस क्षेत्र की चट्टानी मिट्टी के लिए उपयोगी है. यद्पि साल एक पेडीड्युल पेड़ है, जिसकी पत्तियों की शुरुआत गर्मियों में होती है. वैसे भी वन वृक्ष आम तौर पर सदाबहार होता है, इस प्रकार के पेड़ों में आम, जामुन, कटहल हैं. अन्य महत्वपूर्ण पेड़ महुआ, इमली, चहार, केंदू, सागवान, कुसुम, तिलई, हरिन हारा (आर्मोसा रोहितुला), गैलर (फ़िसस ग्लोमेरेटा), आसन आदि हैं. आरक्षित वन कई जानवरों का अड्डा और निवास स्थल है. सारंडा के वनों में जंगली हाथी, सांबर, जंगली सुअर, जंगली मुर्गी और कुटरा (जंगली बकरी), मोर के झुंड जंगलों के आसपास घूमते हुए मिल जाते हैं. इसे भी पढ़ें : किरीबुरु">https://lagatar.in/kiriburu-foundation-day-of-lokeshwarnath-dham-temple-on-10th-february/">किरीबुरु
: 10 फरवरी को लोकेश्वरनाथ धाम मंदिर का स्थापना दिवस इस जंगल में बाइसन और तेंदुए पाए जाते हैं. बाघ यहाँ कभी भी नहीं थे लेकिन कई बार देखे जाने का दावा किया गया हैं. तेंदुए सामान्यतः यहाँ पाए जाते हैं. मध्य भारत में हाथियों का निवास 17000 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैला हुआ हैं, झारखंड राज्य से ओडिशा और पश्चिम बंगाल के एक दक्षिणी भाग हाथियों को अंजू-अंबिया गलियारे का उपयोग सरंडा से कोल्हान वन डिवीजन में करने के लिए किया गया है. और इस रेंज में देश के सबसे ज्यादा हाथियों के निवास स्थान पर कब्जा कर लिया गया है, जो कि खनन, खेती और विकास गतिविधियों के कारण हो गया है. इसे भी पढ़ें : गोड्डा">https://lagatar.in/sushil-jha-again-becomes-the-president-of-godda-advocates-association-yogesh-jha-occupies-the-post-of-general-secretar/">गोड्डा
अधिवक्ता संघ का सुशील झा फिर बने अध्यक्ष, महासचिव पद पर योगेश झा का कब्जा सारंडा वन, वन्य जीवन का सुनहरा खजाना है. यह जगह 40 से अधिक वन्यप्राणियों की प्रजातियों के साथ समृद्ध है. 162 प्रजातियां पक्षियों के, 9 प्रजातियां उभयचर के और 33 प्रजाति सरीसृपों के हैं. सारंडा रोमांचक, रंगीन वनस्पतियों और जीवों से भरा हुआ है. यह अपने राजसी साल के वृक्षों के लिए जाना जाता है जो विश्व प्रसिद्ध है. साल के अलावा, बहुत से प्रमुख पेड़ प्रजाति है, जिसमें बड़ी संख्या में वृक्ष, जड़ी-बूटियां और झाड़ी की सजावट का यह खूबसूरत जंगल है. सारंडा की पहाड़ियों में किरिबुरु की जादुई सूर्योदय और सूर्यास्त शानदार है जिसका नजारा देखने भारत के प्रत्येक प्रांत से लोग आते है. इसके अलावे लिगीरदा स्वाद एक वनस्पति स्वर्ग है जो 7-8 एकड़ में फैला हुआ है. यह संकीर्ण दलदली भूमि जो थलकोबाद वन विश्रामगृह से 4 किमी दूर है. थलकोबाद से 10 किमी दूर टॉयबो समेत अन्य प्राकृतिक झरने है, इस झरने की घाटी हाथियों के लिए एक आदर्श मैदान है जो अक्सर इस जगह का दौरा करते हैं. इसे भी पढ़ें : गोड्डा">https://lagatar.in/sushil-jha-again-becomes-the-president-of-godda-advocates-association-yogesh-jha-occupies-the-post-of-general-secretar/">गोड्डा
अधिवक्ता संघ का सुशील झा फिर बने अध्यक्ष, महासचिव पद पर योगेश झा का कब्जा खनन के प्रभाव से मिट्टी का क्षरण, सिंकहोलों का गठन, जैव विविधता का नुकसान, खनन प्रक्रिया से रसायनों द्वारा मिट्टी, भूजल और सतह के पानी को प्रदूषित करता हैं. खनन कंपनियों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता होगी कि जो क्षेत्र खनन कार्य के लिए वन विभाग से मिला है वह खनन करने के उपरांत वन विभाग को मूल रुप में वापस कर दिया जाएगा. सभी खनन कंपनियों एमआईओएफसीसी और वन विभाग द्वारा अनुमोदित क्षेत्र से अधिक वन भूमि का उपयोग कर रहे हैं. इसे भी पढ़ें : बालूमाथ">https://lagatar.in/balumath-seven-day-rudra-mahayagya-inauguration-of-branch-office/">बालूमाथ
: सात दिवसीय रूद्र महायज्ञ, शाखा कार्यालय का उद्घाटन अनुमोदित क्षेत्र में खनन और संबद्ध गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के लिए एक समिति का गठन किया जाना चाहिए और जुर्माना लगाया जाना चाहिए या खनन कार्य बंद होना चाहिए जहाँ खनन कंपनियाँ एमआईओएफसीसी की सिफारिशों का पालन नहीं करती हैं. केंद्र या राज्य सरकार की एजेंसियां जैसे एमआईओएफसीसी, आईबीएम, खनन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वन विभाग आदि क्षेत्रों का निरीक्षण कर रहे हैं, लेकिन वे अवैध खनन गतिविधियों के खिलाफ पारिस्थितिक संतुलन के अस्तित्व के लिए पूर्ण विवरणों का निरीक्षण नहीं कर पा रहे हैं. इस प्राचीन साल वन के नीचे लौह अयस्क के देश के सबसे अमीर खजाने में से एक है. लेकिन मौजूदा खानों ने सरंडा डिवीजन के 85,000 हेक्टेयर (हेक्टेयर) में सारंडा के स्वैपों को पहले ही क्षतिग्रस्त कर दिया है. इसे भी पढ़ें : गिरिडीह">https://lagatar.in/giridih-awarding-bharat-ratna-to-advani-is-a-matter-of-pride-for-the-country-laxman-singh/">गिरिडीह
: आडवाणी को भारत रत्न देना देश के लिए गर्व की बात- लक्ष्मण सिंह लगभग 16 संख्या में खनन कंपनियाँ लौह अयस्क खनन पट्टा क्षेत्र के 6526.369 हेक्टेयर में काम कर रही थी, और 2892.344 हेक्टेयर में खानों की एफसी लंबित होने के कारण 11 खनन पट्टे का क्षेत्र बंद हो गया है. एमआईओएफसीसी के प्रस्ताव 6505.50 हेक्टेयर के लिए प्रस्तावित खनन पट्टों का आवेदन कुदलीबाद, करमपदा और घाटकुडी़ इत्यादि क्षेत्रों में विभिन्न कंपनियों द्वारा सारंडा में खनन पट्टा के लिए आवेदन दिया था. कुल खनन पट्टों (वर्तमान + बंद + प्रस्तावित) क्षेत्र 15924.013 हेक्टेयर है. लौह अयस्क खनन के बाद इस वन में क्या बचेगा कहना मुश्किल है. इसे भी पढ़ें : लातेहार">https://lagatar.in/latehar-obc-ekta-rath-leaves-regional-conference-to-be-held-on-11th/">लातेहार
: ओबीसी एकता रथ रवाना, 11 को होगा प्रमंडलीय सम्मेलन यह सारंडा जंगल के भविष्य के लिए उभरने वाली जलती हुई समस्याएं हैं. जंगल के आसपास के क्षेत्रों में अवैध खनन बड़े पैमाने पर हो रहे थे जो अभी बंद है. हजारों ट्रकों की वजह से चाईबासा से नोवामुंडी की सड़कों पर जाम लगते थे जिससे गांव के लोगों और पारिस्थितिकी के लिए गंभीर संकट था. जब से एमबी साह आयोग की यात्रा/दौरा हुआ तब से सारंडा में अवैध खनन बंद हो गया है. इसे भी पढ़ें : लातेहार">https://lagatar.in/latehar-crpf-distributed-goods-appeal-to-take-benefits-of-schemes/">लातेहार
: सीआरपीएफ ने बांटा सामान, योजनाओं का लाभ लेने की अपील कारो और कोयना दो बारहमासी नदियाँ हैं जो इस क्षेत्र के जल निकासी व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. खनन और संबद्ध गतिविधियों (कॉलोनी के लिए पानी की आपूर्ति सहित) के लिए पानी का स्रोत है. सारंडा के कारो नदी और कोयना नदी खनन और संबंधित गतिविधियों के कारण व्यापक रुप से प्रदूषित हो गया है, यह गर्मियों के दौरान हाथियों के लिए एक आवश्यक जल स्रोत भी है. जैसा कि नदियों और जंगलों में सूखा पड़ने और सूख जाने के कारण हाथियों का झुंड पड़ोसी राज्य ओडिशा व छत्तीसगढ़ में चला जाता है. जिससे गंभीर संघर्ष उत्पन्न हो जाता है, जो जीवन और आजीविका के लिए बहुत ही नुकसानदायक होता है. इसे भी पढ़ें : हजारीबाग">https://lagatar.in/hazaribagh-vishwakarma-samaj-protest-in-ranchi-on-18th-february/">हजारीबाग
: 18 फरवरी को रांची में विश्वकर्मा समाज का धरना क्योंकि हम जंगलों को और अधिक टुकड़े - टुकड़े करते चले जा रहे हैं. खनन पट्टा क्षेत्र से मानसून के दौरान अतिरिक्त रन-ऑफ वॉटर कोयना और कारो नदी में बह कर जाता है, जो कि सक्रिय खनन क्षेत्र, ओव्हरबर्डन डंप, कच्ची सड़कों और पट्टे के अंदर अबाधित प्राकृतिक वन क्षेत्र के प्राकृतिक मिट्टी के कणों को नष्ट कर देता है, जहां कोई खनन गतिविधियाँ नहीं है. इसे भी पढ़ें : राजधानी">https://lagatar.in/rahul-gandhis-public-meeting-tomorrow-in-the-capital-ranchi-telangana-cm-will-also-attend/">राजधानी
रांची में राहुल गांधी की आमसभा कल, तेलंगाना के सीएम भी होंगे शामिल यह मानसून के दौरान अधिक से अधिक होता है. इसके अलावा भी अयस्क धुलाई के कारण भी नदियों में सिल्ट जमाव या बहाव के कारण पानी की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है. नदियों के जल की ग़ुणवत्ता को बनाए रखना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जो पीने के पानी के स्रोत के रूप में काम करता है. सारंडा जंगल के अंदर रहने वाले गांवों के लोग, और जीव - जन्तु इन्हीं नदियों पर निर्भर रहते है. यह दोनों नदियां पुरे सारंडा में बसे छोटे – छोटे औद्योगिक नगरों की प्यास बुझाती है. इसे भी पढ़ें : लातेहार">https://lagatar.in/latehar-crpf-distributed-goods-appeal-to-take-benefits-of-schemes/">लातेहार
: सीआरपीएफ ने बांटा सामान, योजनाओं का लाभ लेने की अपील 20-40 वर्षों से खानों में रोज़गार की वजह से खनन पट्टा के आस पास के वन क्षेत्र में दर्जनों नए गांव बसे हैं. लोगों ने फसलों के लिए और झोपड़ियों को बनाने के लिए नाले और नदियों के नजदीक के हजारों एकड़ वनों को नष्ट कर पेड़ों को काट दिया है. सरंडा साल के साल, सगवान, बिजा और गमहार महंगे पेड़ हैं और फर्नीचर बनाने के लिए बहुत उपयोगी हैं. ये महंगी पेड़ रात में जंगल माफिया द्वारा काटी जा रही हैं. भारत सरकार ने सारंडा विकास योजना माओवादी त्रस्त गांवों के विकास के लिए बनाया था. इसे भी पढ़ें : बेरमो">https://lagatar.in/bermo-gomiya-residents-will-soon-get-clean-water-from-konar-river-chandraprakash/">बेरमो
: गोमिया वासियों को जल्द मिलेगा कोनार नदी का साफ पानी- चंद्रप्रकाश उस योजना में बताया गया था कि माओवादियों के कई प्रशिक्षण शिविर सारंडा में स्थित है. उस समय लगभग 56 गांवों में 36,500 से अधिक की आबादी वाले करीब 7000 आदिवासी परिवार रहते थे, जिनकी संख्या अब बढ़ चुकी हैं. इस विकास योजना में इंदिरा आवास योजना के तहत मकान बनाना, मनरेगा कार्यों के लिए स्थानीय आदिवासी युवकों को रोज़गार मित्र की नियुक्ति, सभी बस्तियों के लिए कनेक्टिविटी में सुधार के लिए पीएमजीएसवाई के तहत सड़कों और पूलों का निर्माण, आईडीसी सेंटर इत्यादि किया जाना था. लेकिन सभी भारी भ्रष्टाचार का भेंट चढ़ गया. इसे भी पढ़ें : पलामू">https://lagatar.in/palamu-dead-body-of-a-newborn-found-at-the-crematorium/">पलामू
: श्मशान घाट पर मिला नवजात का शव सारंडा वन प्रकृति का उपहार है, और इसे निम्नलिखित कदम उठाकर संरक्षित और सुरक्षित किया जाना चाहिए. अंधाधुंध वनों की कटाई पर रोक लगाई जानी चाहिए और ईंधन के रुप में प्रयोग होने वाली लकड़ी की बर्बादी को बचाया जाना चाहिए. ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत, जैसे बायोगैस का उपयोग ईंधन की लकड़ी के पूरक के लिए किया जाना चाहिए. इसे भी पढ़ें : अपराधी">https://lagatar.in/criminals-do-not-recognize-geographical-boundaries-law-enforcement-agencies-should-not-consider-borders-as-obstacles-amit-shah/">अपराधी
भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानते,कानून प्रवर्तन एजेंसियां सीमाओं को बाधा नहीं मानें : अमित शाह वनों की आग को रोका जाना चाहिए और कृषि के लिए अयोग्य क्षेत्रों में बड़े वनीकरण किए जाने चाहिए. जंगल के पेड़ों की कीटों और बीमारियों को रासायनिक और जैविक रूप से नियंत्रित किया जाना चाहिए. जंगलों में मवेशियों की चराई को हतोत्साहित किया जाना चाहिए. पेड़ों की कटाई में भेदभाव होना चाहिए. वनों की कटाई वाले क्षेत्रों का वनीकरण किया जाना चाहिए. लौह अयस्क का खनन हेतु और लीज देने से बचना चाहिये. [wpse_comments_template]
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