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किरीबुरू : 1932 का खतियान लागू हुआ तो सारंडा के आदिवासी सरकारी योजनाओं से हो जायेंगे वंचित

Kiriburu (Shailesh Singh) : झारखंड सरकार यदि वर्ष 1932 का खतियान का नियम राज्य में लागू करती है तो पश्चिम सिंहभूम के सारंडा जंगल में निवास करने वाले वन ग्रामों व इन्क्रोचमेंट गांवों के आदिवासी व मूलवासी झारखंड सरकार के इस निर्णय का खुलकर विरोध करेंगे. सारंडा के ग्रामीणों ने लगातार न्यूज को बताया कि वे झारखंड सरकार से इस मामले को लेकर वर्षों से अपने अधिकार और मालिकाना हक के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. लेकिन सरकार उनकी मांगें नहीं मान रही है और उनकी समस्याओं को सुने बगैर ही एक तरफा फैसला करने की योजना बना ली है. अगर झारखंड में 1932 का खतियान लागू हुआ तो सारंडा जंगल क्षेत्र में निवास करने वाले दर्जनों गांवों के आदिवासी सरकारी योजनाओं का लाभ लेने से वंचित हो जायेंगे. इसके लिये मुख्य रूप से जिम्मेदार झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार व मंत्री जोबा मांझी होगी. इसे भी पढ़े : किरीबुरु">https://lagatar.in/kiriburu-motorcyclist-hit-a-passerby-injured/">किरीबुरु

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सारंडा में वर्ष 1932 के बाद बसे अथवा बसाये गये हैं दर्जनों इन्क्रोचमेंट व राजस्व गांव

उल्लेखनीय है कि सारंडा में अंग्रेजों अथवा वन विभाग द्वारा बसाए गए दस वन ग्राम थलकोबाद (1905), तिरिलपोसी (1906), नवागांव (1908), करमपदा, नयागांव व भनगांव (1910), दीघा (1911), बिटकिलसोय (1914), बालिबा (1917) व कुमडीह (1927) समेत मंत्री जोबा मांझी के पति स्व. देवेन्द्र मांझी द्वारा वर्ष 1980 के दशक में झारखंड आंदोलन के नाम पर सारंडा जंगल को काट कर बसाये गयें दर्जनों इन्क्रोचमेंट गांव के अलावा दर्जनों राजस्व गांव वर्ष 1932 के बाद बसे अथवा बसाये गये हैं. ऐसे गांवों में निवास करने वाले आदिवासियों व वनवासियों की संख्या लगभग 50-75 हजार के करीब है. अगर सरकार 1932 का खतियान लागू कर देती है तो सारंडा के आदिवासी उक्त सरकारी योजनाओं का लाभ लेने से वंचित रह जायेंगे. इसे भी पढ़े : अररिया">https://lagatar.in/araria-a-horrific-road-accident-four-people-including-three-year-old-innocent-died/">अररिया

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वन विभाग ने ग्रामीणों को 1991-92 में दिया है ग्राम भूमि का खतियान 

वहीं, इस संबंध में सारंडा के दिघा गांव के मुंडा मसीह चरण तोपनो, बिटकिलसोय निवासी शांतियल भेंगरा, नवागांव व करमपदा के मुंडा राजेश व चन्द्रराम मुंडा, पूर्व मुखिया आलोक तोपनो आदि ने लगातार न्यूज से बातचित में कहा कि वन विभाग ने उन्हें वर्ष 1964 में वन ग्राम भूमि का खतियान दिया था. लेकिन सभी ग्रामीणों से खतियान कुछ त्रुटि की बात कह वापस भी ले लिया गया था. बाद में 1991-92 में खतियान दिया गया है. अगर सरकार 1932 का खतियान लागू करती है तो हम सभी सरकार की योजनाओं का लाभ लेने से वंचित हो जायेंगे. यदि ऐसा हुआ तो हम सभी राज्य सरकार के खिलाफ जोरदार आंदोलन छेडे़ंगे व कानूनी लड़ाई हेतु न्यायालय की शरण में जायेंगे. उन्होंने कहा कि सारंडा में दर्जनों इन्क्रोचमेंट गांव मंत्री जोबा मांझी व उनके स्व. पति देवेन्द्र मांझी द्वारा बसाया गया है. ऐसे में जिसके पास कोई खतियान नहीं है, वह भी इस लाभ से वंचित होंगे. इसे भी पढ़े : गंदगी">https://lagatar.in/who-will-put-the-pile-of-dirt-across-the-fleet-must-read-in-your-favorite-newspaper-shubham-sandesh/">गंदगी

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झारखंड कैबिनेट की विशेष बैठक में 1932 का खतियान नियम किया जाएगा पारित

उल्लेखनीय है कि झारखंड के शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो ने अपने एक ब्यान में कहा है कि 5 सितंबर को आयोजित झारखंड कैबिनेट की विशेष बैठक सह सत्र में आदिवासी व मूलवासियों के हित में 1932 के खतियान को लागू करने का प्रस्ताव पारित कर दिया जायेगा. यह प्रस्ताव पारित होगा या नहीं यह लगातार न्यूज दावा नहीं करता है. लेकिन अगर पारित हुआ तो सबसे ज्यादा नुकसान सारंडा के गांवों में निवास करने वाले आदिवासियों को होगा. साथ ही इसका राजनैतिक नुकसान भी सत्ता पक्ष के लोगों को आदिवासियों के भारी विरोध की वजह से उठाना पड़ सकता है. इसे भी पढ़े : एशिया">https://lagatar.in/asia-cup-pakistan-beat-india/">एशिया

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