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किरीबुरु : सियासत का गणित हम नासमझ जनता की समझ से परे!

Kiriburu (Shailesh Singh) : सियासत का गणित सीखना हम भोली-भाली जनता के वश की बात नहीं है. आखिर हम क्यों इस सियासत के चक्कर में पड़कर समाज की आपसी एकता व भाईचारे को तार-तार कर रहे हैं. कल तक हम एक स्थान पर बैठकर परिवार व समाज को आगे बढा़ने हेतु मिलकर काम करने की कशमें खाये थे, लेकिन आज चुनाव ते हीं अलग-अलग झंडा पकड़ एक-दूसरे के खिलाफ क्यों खडे़ हो गये ! आज गांव से लेकर शहर तक ऐसा हीं नजारा देखने को मिल रहा है. नेता आपस में जरुरत अनुसार मिलते व आशियाना बदलते रहते हैं, हमारी एक-एक वोट से जीतकर वह अपना कीमत सैकड़ों करोड़ों में लगाकर स्वयं को बेच देते हैं, लेकिन उनके चक्कर में हम आजीवन अपनों से दुश्मनी कर दूरी बना लेते हैं. यह सियासत की गणित हम सभी की समझ से बाहर की चीज है. इसे भी पढ़ें : पीएम">https://lagatar.in/pm-modis-election-meeting-in-darbhanga-today-road-show-will-also-be-held-in-kanpur/">पीएम

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गणित यानी हिसाब के चार बड़े कायदे माने गये हैं- जोड़, घटाव, गुणा और भाग. जिसने जीवन भर हिसाब नहीं सीखा वह कबीर या कवि तो बन सकता है, लेकिन चाणक्य या राजनीतिज्ञ नहीं बन सकता. वैसे अपने देश की सियासत में भी गणित की भूमिका महत्वपूर्ण है. असल गणित तो राजनीति में ही चलती है. एक नेता के लिए जोड़ का बड़ा महत्व है. कुर्सी पर बैठते ही वह माल जमा करना शुरू कर देता है. कुछ नेता तो अपनी छोटी सी राजनीतिक जिन्दगी में इतना जोड़ लेते हैं कि उनकी सात पीढ़ियां खाती और उड़ाती रहती हैं. नेता को धन के साथ लोगों को भी जोड़ना पड़ता है. लोगों को जोड़ने के लिए धर्म, जाति, वर्ण, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद, प्रांतवाद सभी सूत्रों को आजमाना पड़ता है. इसे भी पढ़ें : गोविंदपुर">https://lagatar.in/govindpur-journalist-rajesh-sinhas-father-passes-away-last-rites-performed-at-khudia-ghat/">गोविंदपुर

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गणित का दूसरा फार्मूला घटाव है. राजनीतिज्ञ जोड़ से जितना प्रेम करते हैं घटाव से उतनी ही अधिक नफरत. किन्तु कुछ लोगों को इस इस क्रिया में बड़ा लुत्फ आता है. कायदे-आजम जिन्ना को तफरीक (घटाव) से बड़ा प्रेम था. इसीलिए उन्होंने विशाल हिन्दुस्तान से पाकिस्तान को निकाल कर एक देश के दो टुकड़े कर डाले. वैसे घटाव को पसंद करने वाले नेता अपने देश में कई नजर आ रहे हैं. लेकिन कभी-कभी घटाव बड़ा सेहतमंद मतलब फायदेमंद हो सकता है. कुछ तो वोट की खातिर अपने से धार्मिक राजनीति को घटाने का मन बना लिया है. दूसरी तरफ नेताओं को चुनाव के दौरान उनके द्वारा एकत्रित किया गया वैद्य-अवैद्ध कमाई के पैसे जब घटना प्रारम्भ होता है तो उन्हें काफी बुरा लगता है. इसे भी पढ़ें : आम">https://lagatar.in/male-leader-vinod-singh-is-contesting-elections-with-the-support-of-common-voters-migrants-are-also-donating/">आम

मतदाताओं के सहयोग से चुनाव लड़ रहे माले नेता विनोद सिंह, प्रवासी भी दे रहे चंदा
"पहले तो सिखला दिये बंदूकों के गान, अब बस्ती-बस्ती बांटने आ रहे हैं मुस्कान". यह तो वोटों की राजनीति है और वोटों का ही जमाना है अन्यथा जमानत जब्त होने का खतरा भी है. अब ऐसा खतरा उच्च दर्जे का नेता तो उठाने से रहा ! "पडी़ हुई थी सड़क पर, कल कुत्ते की लाश, राजनीति करने लगी, उसमें वोट तलाश" गुणा भी बड़ा जबर्दस्त हिसाबी कायदा है. एक नेता कुर्सी पर बैठते ही अपनी जायदाद का गुणा करना शुरू कर देता है. यानी एक कोठी से चार कोठी. दो प्लाट से आठ प्लाट. तीन गाड़ी से 12 गाड़ियां. दो हजार चमचों से 10 हजार चमचे बनाने के लिए वह गुणा का सहारा लेता है. कई बार पूंजीपतियों से जोड़-तोड़ कर बेनामी फैक्टरियां लगाता है. इसे भी पढ़ें : आम">https://lagatar.in/male-leader-vinod-singh-is-contesting-elections-with-the-support-of-common-voters-migrants-are-also-donating/">आम

मतदाताओं के सहयोग से चुनाव लड़ रहे माले नेता विनोद सिंह, प्रवासी भी दे रहे चंदा
गुणा से जमा की गयी यह सम्पत्ति उसके बुढ़ापे में काम आती है, क्योंकि राजनीति में कुर्सी से हटते ही आदमी की कद्र पैसे की भी नहीं रह जाती. ऐसे में अपने एकाध चमचे को बैठाकर उसके साथ शाम बिताने के लिए धन की जरूरत होती है. आज गुणा का ही कमाल है. एक से बढ़कर एक लोग राजनीति के मैदान में दंगल जीतने के लिए लालायित रहते हैं. पूंजीपति, अभिनेता, तस्कर कौन ऐसा है जो इस दंगल में अपनी किस्मत नहीं आजमाना चाहता है. "अभिनेता नेता बने, नेता बने दलाल, जनता के विश्वास की खिंच रहे हैं खाल". इसे भी पढ़ें : लोहरदगा">https://lagatar.in/threat-from-own-people-and-independents-in-lohardaga/">लोहरदगा

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वैसे आज की राजनीति में सर्वाधिक महत्व है ``भाग`` का. भाग का अर्थ है बांटना. जैसे डाकुओं का दल डकैती के बाद माल को बांटता है वही हाल राजनीति का है. इसमें भी लोगों को बांटा जाता है. पढ़े-लिखे विद्वान लोग इस बंटवारे को ध्रुवीकरण कहते हैं. और हमारे जैसे अज्ञानी, बेवकूफ इसे बंदरबांट के नाम से अभिहीत करते हैं. बंदरबांट का आजकल हमारे समाज में कफी बोलबाला है. नेता, अफसर, कलमनवीस सभी बंदरबांट में जुटे हुए हैं. जिसके हिस्से में जो आता है वह डकार लेता है. राजनीति का सर्वश्रेष्ठ सूत्र है बांट कर खाना. इसलिए सारे राजनीतिक दलों के लोगों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना बंद कर दिया है. एकाध जो अभी यह काम कर रहे हैं उन्हें मैं नासमझ की श्रेणी में रखता हूँ, क्योंकि उन्हें शायद मिल-बांट कर खाना अच्छा नहीं लगता. इसे भी पढ़ें : जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-satyajit-ray-gave-a-new-look-to-indian-cinema-chandan-pandey/">जमशेदपुर

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वे सारा का सारा माल स्वयं डकार जाना चाहते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि हमाम में सब नंगे हैं. इस प्रकार स्थिति आज यह हो गयी है अपने देश की कि- फैल रहा है देश में एक भयंकर रोग, नैतिकता समझा रहे सभी अनैतिक लोग. बुजुर्गों का मामना है कि आदमी को गणितज्ञ होना चाहिए. एक गृहस्थ को पाई पाई और नेता को एक-एक वोट का हिसाब रखना चाहिए. समयानुसार गणित के चारों कायदों जोड़, घटाव, गुणा, भाग का प्रयोग करते रहना चाहिए. सचमुच अद्भुत तंत्र है अपना यह गणतंत्र. संत पड़े हैं जेल में, डाकू फिरें स्वतंत्र. [wpse_comments_template]

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