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कुंभ हादसा : सच छिपाने के लिए सियासत

Nishikant Thakur आज देश में दो ही बातों की चर्चा तेज है-पहला तो नववर्ष का बजट, जिसका असर देश के जन-जन तक होगा. इस पर चर्चा इस वर्ष जब जब अच्छाई या जनहित के मुद्दों पर बात होगी, तो बजट पर भी चर्चा जरूर होगी और देश के सामान्य माध्यवर्ग, उच्च वर्ग सभी के लिए गंभीर विषय होगा. लेकिन, दूसरा विषय है जिसने कई परिवारों को अपनी जद में समेट लिया और उनके परिवार के कई सदस्यों को काल के पैरों तले रौंद दिया... यानी, महाकुंभ. प्रयागराज में 29 जनवरी की सुबह घटित इस दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने देश के खुशी भरे माहौल को मातम में बदल दिया. सरकारी आंकड़ों को देखें तो सरकार के अनुसार तीस श्रद्धालुओं को निर्दयी काल ने अपने गाल में समा लिया। काश, कुम्भ महानगरी प्रयागराज में समुचित व्यवस्था की गई होती, तो ऐसा हो नहीं सकता कि इतने श्रद्धालुओं का जीवन असमय खत्म होता. दुर्भाग्यपूर्ण इस हादसे का मुख्य कारण जो छन-छनकर सामने आ रहा है वह यह कि केवल सरकारी बदइंतजामी के कारण ऐसा हुआ और जिसे छिपाने की कोशिशें अब तक जारी हैं. पहले तो सरकारी तंत्र ने यह स्वीकार ही नहीं किया कि हादसे में इतने लोगों की जान चली गई है. हादसे को कई घंटे तक दबाकर रखा गया और कहा गया कि अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए. मृतकों के आश्रितों की चीख-पुकार को अनसुना करते हुए सरकारी तंत्र कहता रहा-अफवाहों पर ध्यान न दें. यह कैसा सरकारी तंत्र है, जो देखता रह गया और ऊपर बैठे शीर्ष नेतृत्व को भटकाता रहा कि कोई हादसा नहीं हुआ है, थोड़ी बहुत भगदड़ मची थी, जिसे शांत कर लिया गया है. उस दिन के ब्रह्ममुहूर्त में जान बचाकर लौटे श्रद्धालुओं की मानें तो बहुत से लोग मारे गए हैं, लेकिन सरकारी गणना के अनुसार हताहतों की संख्या केवल 30 है. वैसे कुछ सरकारी अधिकारी निलंबित किए जा चुके हैं. इस दुर्व्यवस्था के मुख्य कर्ताधर्ता चूंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही कर रहे हैं, अतः संत समाज ने उनको भी इस्तीफा देने पर जोर दिया है. शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि बराबर वह एक्स पर आश्रित रहे कि सच्चाई जान सकें कि आखिर अफवाह क्यों फैलाई गई है और सच्चाई क्या है? लेकिन, देर सुबह तक यह जानकारी सामने नहीं आ सकी जिसके कारण वे मृतकों को श्रद्धांजलि तक नहीं दे सके और अन्न ग्रहण कर लिया. सच को दबाने, शवों को छिपाने और साक्ष्य को मिटाने का यह जो घृणित कार्य किया गया है, उसके लिए पूरी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हे. वह कुंभ के सफल आयोजन में फेल साबित हुए, लिहाजा उन्हें पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। जो भी हो, पूरी सच्चाई तो तभी सामने आएगी, जब निष्पक्ष होकर किसी उच्च कमेटी द्वारा इस भयावह दुर्घटना की जांच की जाएगी, लेकिन क्या इसकी इसलिए जांच दूसरी तरफ मोड़ दिया जाएगा कि इस तरह का हादसा तो नेहरू के कार्यकाल में भी हुआ था. कुछ भी हो, जिन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को खोया उनका क्या होगा और सच में कितनी मौतें हुईं, उसका सच सामने आ सकेगा? प्रयागराज में स्नानार्थियों की जान गंवाने वालों को लेकर पूरा देश स्तब्ध है, मृतकों के स्वजन को ढाढस बंधा रहा है, लेकिन अभी त्रिवेणी घाट पर भक्तों की कमी नहीं आ रही है. जिस तरह बसंत पंचमी के दिन स्नान करने वालों की श्रद्धा देखी जा रही थी, उससे तो यही लगता था कि जिन्होंने अकारण अपनी जान गवाई, उनके जीवन का कोई मूल्य ही नहीं था. लेकिन, देश के शीर्ष पंचायत में हमारा नेतृत्व करने वाले नेतागण इसे मुद्दा बना रहे हैं. यहां तक कि लोकसभा में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तो लोकसभा का बहिष्कार किया और सदन में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सत्तारूढ़ को जमकर कोसा. वहीं, दूसरी ओर राज्यसभा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि कुम्भ की दुर्घटना में  मृतक के सरकारी 30 के आंकड़े दिए जा रहे हैं, जबकि यहां "हजारों लोगों" की मौत हुई है सरकार इसके लिए दोषियों को सजा दे. इस पर सभापति महोदय ने कहा कि इसके प्रमाण दें कि हादसे में इतने लोगों की जान गई है. माननीय सभापति जगदीप धनकड़ द्वारा प्रमाण मांगना थोड़ा हास्यास्पद लगता है; क्योंकि प्रमाणित करना तो सरकार का काम है. ऐसा इसलिए कि सोशल मीडिया पर यह बात सार्वजनिक हो रही है कि जिस तरह जेसीबी मशीन द्वारा त्रिवेणी, झूंसी तथा अन्य कई स्थानों से सामान उठाकर ट्रैक्टरों में भरा जा रहा है और प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि हादसे में मृतकों की संख्या गिनने वाला कोई अफसर मौजूद नहीं था और हादसा वाले स्थान से सैकड़ों लावारिस सामानों को उठाया जा रहा था. जितने परिवार ने खोया-पाया केंद्र पर अपने परिवार के सदस्यों के गुम हो जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई है, उसकी भी गिनती करके मृतकों को संख्या का सच जाना जा सकता है. लेकिन, अब यहां प्रश्न फिर यही है कि क्या निष्पक्ष जांच कराकर सही आंकड़ा देश को बताया जा सकेगा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन भगदड़ के लिए दुख जताते हुए कहा कि `मैं महाकुंभ में जो हादसा हुआ, उसमें हमें कुछ पुण्यात्माओं को खोना पड़ा है. कई लोगों को चोटें भी आई हैं. मैं प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट करता हूं और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना करता हूं. हादसे में करीब 30 लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए` हादसे के बाद से सपा और कांग्रेस जैसे दल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा पर निशाना साध रहे हैं. वहीं, अब सीएम योगी ने भी समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को जवाब दिया है. सीएम योगी ने कहा है कि कांग्रेस और सपा के बीच सनातन विरोधी प्रतिस्पर्धा चल रही है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महाकुंभ हादसे को लेकर अखिलेश यादव के बयान को शर्मनाक बताया है. सीएम योगी ने कहा कि उन्हें मल्लिकार्जुन खरगे के बयान पर अफसोस होता है. अखिलेश का सनातन विरोधी चरित्र उजागर हो गया है. सीएम योगी ने कहा है कि समाजवादी पार्टी झूठ फैला रही है. महाकुंभ भगदड़ पर अखिलेश और खरगे ने झूठ पर झूठ बोला है. कहा जाता है कि आस्था पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता; क्योंकि यह आस्था ही भारतीयों को विश्व में एक अलग पहचान देती है. इसलिए अब समझने का प्रयास करते हैं कि अर्द्धकुंभ, कुम्भ और महाकुंभ की पौराणिक कथा क्या है. कई ग्रंथों के अनुसार यह आयोजन 850 वर्ष पूर्व से आयोजित होता आ रहा है, लेकिन यदि संत-महात्माओं की मानें तो उनका मानना यह है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश से जहां—जहां अमृत की बूंदें गिरीं, वहां—वहां कुम्भ का आयोजन होता है. जिन स्थानों पर इसका आयोजन होता है, वे हैं प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक, लेकिन महाकुम्भ का आयोजन केवल प्रयागराज में ही होता है. प्राचीन शिलालेखों में भी आस्था के इन महान केंद्रों का उल्लेख किया गया है. डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र स्तंभकार हैं, ये इनके निजी विचार हैं.

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