Ranchi : झारखंड में नक्सलवाद लंबे समय से सुरक्षा बलों और सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है. बीते कुछ वर्षों में नक्सली गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी जरूर आई है. लेकिन कई शीर्ष और बड़े नक्सली नेताओं ने सरेंडर नहीं किया है, जो एक अहम सवाल बना हुआ है.
2022 से अबतक 98 नक्सलियों ने किया सरेंडर
झारखंड में नक्सलवाद भले ही कमजोर पड़ा है. लेकिन बड़े नक्सली अब भी सरेंडर से दूर हैं. सुरक्षा एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, 2022 से 2026 (अबतक) राज्य में 98 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया. वहीं 83 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए. जबकि 1455 से अधिक नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया.

अब भी बचे हैं 70 से 80 हार्डकोर नक्सली
सुरक्षा एजेंसियों का अनुमान है कि झारखंड में अब करीब 180 से 220 सक्रिय नक्सली बचे हैं. इनमें लगभग 70 से 80 हार्डकोर सशस्त्र नक्सली हैं, जबकि 100 से अधिक मिलिशिया और स्थानीय सहयोगी कैडर शामिल हैं.

दूसरे राज्यों में कई शीर्ष नक्सलियों ने किया सरेंडर
हालांकि झारखंड की तुलना में दूसरे राज्यों की तस्वीर कुछ अलग नजर आती है. छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में कई शीर्ष नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. खासकर छत्तीसगढ़ में एक पत्रकार की पहल इतनी प्रभावी रही कि उसके प्रयासों से सैकड़ों नक्सलियों ने हथियारों के साथ सरेंडर किया. इन राज्यों में सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने में अहम रही है.
पुलिसिया दबाव नहीं, प्रभावशाली संवाद जरूरी
दरअसल, किसी नक्सली को आत्मसमर्पण के लिए तैयार करना सिर्फ पुलिस के दबाव का नतीजा नहीं होता. इसके लिए भरोसे का माहौल बनाना पड़ता है. नक्सलियों के परिवारों, उनके करीबी लोगों और समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ संवाद स्थापित करना जरूरी होता है. जब नक्सलियों को यह भरोसा होता है कि मुख्यधारा में लौटने के बाद उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा, तभी वे सरेंडर का फैसला लेते हैं.
झारखंड में कहां कमजोर पड़ रही है कड़ी
झारखंड में नक्सलियों के सरेंडर के मामले में यही कड़ी कमजोर नजर आती है. कुछ जिलों में एसपी स्तर पर जरूर पहल दिखाई देती है. लेकिन यह प्रयास पूरे राज्य में एक समान नहीं है. दूसरी ओर सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच संघर्ष अभी भी जारी है.
हाल ही में सारंडा इलाके में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के जवान नक्सलियों द्वारा बिछाए गए आईईडी विस्फोट की चपेट में आए थे, जिसमें कई जवान घायल हुए थे. इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि जमीन पर संघर्ष अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
सामूहिक सरेंडर की योजना क्यों अटकी?
सूत्रों के अनुसार, झारखंड में सक्रिय एक नक्सली संगठन के शीर्ष नेता ने कुछ समय पहले सरेंडर करने की इच्छा जताई थी. उसने अपने संगठन के अन्य नेताओं से भी इस पर बातचीत की और तत्कालीन डीजीपी के माध्यम से सरकार तक यह प्रस्ताव पहुंचाया.
बताया जाता है कि इस योजना के तहत सैकड़ों नक्सलियों के सामूहिक सरेंडर की संभावना थी. लेकिन सरकारी स्तर पर अपेक्षित रुचि नहीं दिखने के कारण यह योजना केवल बातचीत तक ही सीमित रह गई.
झारखंड की टीम गई है ओडिशा
सरकार अपनी सरेंडर नीति में बदलाव की कोशिश कर रही है. इसके लिए आईपीएस अधिकारियों की एक टीम ओडिशा भी गई है, ताकि वहां की सरेंडर और पुनर्वास नीति का अध्ययन कर झारखंड की नीति में सुधार किया जा सके.
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को अपनी पुरानी सरेंडर नीति की भी समीक्षा करनी चाहिए. यह समझना जरूरी है कि आखिर किन कारणों से नक्सली सरेंडर करने से हिचकते हैं. इसका सबसे बेहतर जवाब वे लोग दे सकते हैं, जो पहले ही आत्मसमर्पण कर चुके हैं.
ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या सरेंडर कर चुके नक्सलियों को नीति के अनुरूप सभी सुविधाएं मिलीं? क्या उन्हें पुनर्वास और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिले? और क्या वे अपने पुराने साथियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित कर सकते हैं?
सरेंडर कर चुके नक्सली बन सकते हैं ब्रांड एंबेसडर
अगर सरकार सरेंडर कर चुके नक्सलियों को “ब्रांड एंबेसडर” बनाकर उनकी सफलता की कहानियां सामने लाए, तो इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है. जो लोग कभी बंदूक के रास्ते पर थे और आज सामान्य जीवन जी रहे हैं, उनकी कहानी बाकी नक्सलियों के लिए भरोसे का संदेश बन सकती है.
मुख्यधारा में लौटाने के लिए तैयार करनी होगी रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को मजबूत इच्छाशक्ति के साथ पुलिस, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर एक व्यापक रणनीति बनानी होगी. अगर ऐसा होता है तो नक्सली मुख्यधारा में लौट सकते हैं और और वर्षों से चला आ रहा यह संघर्ष खत्म होने की दिशा में आगे बढ़ सकता है.
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