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झारखंड में पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के लाखों आवेदन महीनों से लंबितः बाबूलाल

Ranchi : नेता प्रतिपक्ष  बाबूलाल मरांडी ने छात्रवृत्ति को लेकर सवाल खड़े किए हैं. कहा है कि झारखंड में पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के लाखों आवेदन महीनों से लंबित पड़े हैं.

 

गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे फीस जमा करने, किताबें खरीदने और हॉस्टल खर्च उठाने में असमर्थ हो रहे हैं. कई माता-पिता मजबूर होकर कर्ज लेकर अपने बच्चों का नामांकन करा रहे हैं, ताकि उनकी पढ़ाई बीच में न रुक जाए. 

 

दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी हमारे झारखंड के युवाओं को आंदोलन का सहारा लेना पड़ रहा है. छात्रवृत्ति, जो विद्यार्थियों के सपनों को पंख देने का साधन होनी चाहिए, आज उनकी सबसे बड़ी चिंता बन गई है.

 

यह स्थिति राज्य की शिक्षा व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाती है. सीएम से कहा कि छात्रों की इस पीड़ा को समझे और यथाशीघ्र छात्रवृत्ति भुगतान सुनिश्चित करे.

 

घंटों तक एंबुलेंस का इंतजार करते लोग तड़प-तड़प कर मर जाते हैं

नेता प्रतिपक्ष ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा है कि घंटों तक एंबुलेंस का इंतजार करते लोग तड़प-तड़प कर मर जाते हैं. कल भी किसी की मृत्यु हुई थी, आज भी किसी की जान गई है और कल किसी और की जिंदगी निगल जाएगी यह निकम्मी सरकार. इस सरकार द्वारा किया जा रहा भ्रष्टाचार वही गेंहू है जिसके साथ आम लोग घुन की तरह पिस रहे हैं.

 

गुमला के सदर अस्पताल में एक महिला तड़प-तड़प कर मर गई

गुमला के सदर अस्पताल में एक महिला तड़प-तड़प कर मर गई, सिर्फ इसलिए कि पांच घंटे इंतजार करने के बाद भी एंबुलेंस नहीं आई. यदि समय पर पहुंच जाती, तो महिला को बचाया जा सकता था. 

 

स्वास्थ्य व्यवस्था की ऐसी दर्दनाक और शर्मनाक तस्वीरें हर रोज अखबारों में छपती हैं. जिस तरह झारखंड में बच्चे, महिलाएं, मरीज एंबुलेंस के अभाव में जान गंवा रहे हैं, ये घटनाएं बहुत व्यथित कर देती हैं. हेमंत सरकार ने जैसे आम जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया है, आधारभूत स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रखा हुआ है, वह अमानवीय है.

 

डीसी को 12 बार फोन किया

वहां की जिला उपायुक्त को भी महिला के परिजनों ने 12 बार फोन किया, लेकिन मदद तो दूर, फोन तक नहीं उठाया गया. ये एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी का बर्ताव है? अब वक्त आ गया है कि झारखंड की सरकार और स्वास्थ्य विभाग को आईना दिखाया जाए, जहां एंबुलेंस और वेंटिलेटर के अभाव में हुई हर मौत उस व्यवस्था पर लगा कलंक है, जिसे बचाने की जिम्मेदारी उस विभाग की थी.

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