Dr. Mayank Murari आधुनिक लोकतंत्र में समाज निर्माण की महती जिम्मेदारी राजनीतिज्ञ व राजनेताओं ने खुद पर ले ली है. इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए भारतीय राजनीतिज्ञों ने समाज को धर्मनिरपेक्ष और अर्थसापेक्ष बना दिया. संविधान यानी भारतीय चेतना को एक दूसरी पटरी पर ले जाने की कोशिश, जो सैकड़ों सालों की धारा से विपरीत थी. समाज निर्माण एवं देश के विकास की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर चलनेवाली यह राजनीति पिछले 75 सालों में समाज को ही तहस-नहस कर दिये. जिस देश की 70 फीसदी आबादी गांव में रहती है, तो भविष्य का गांव कैसा होगा ? इसका जवाब हमारे राजनीतिज्ञों एवं उसकी शासन व्यवस्था के पास नहीं है. हमारे विशाल ढ़ांचे में भारतीयों के दो वर्ग हैं - उपभोक्ता और नागरिक. उपभोक्ता की संख्या 20 करोड़ है जबकि बाकी देश के नागरिक है. वे बाजार के हाशिये पर है. जिनकी जेब जितनी गहरी और मजबूत है, उसकी ही बाजार में पूछ है. ऐसे में समाज का विकास कैसे होगा ? पिछले पांच सालों में हमारी विकास दर नौ फीसदी रही. इसपर हम गर्व करते हैं और चर्चा भी. लेकिन इस विकास दर की वजह से देश की गरीबी कितनी कम हुई. राजनीति शास्त्र का पूरा तंत्र राज्य के संदर्भ में मानव की विशिष्ट संबंधों को परिभाषित करता है. मानव के अधिकारों, कानूनों, नियमों, विधानों एवं संविधानों के संदर्भ में उस लोक कल्याणकारी राज्य के निर्माण की बात करता है, जो अतीत में न कभी हुआ और न कभी भविष्य में होगा. हां, राज्य को सत्ता, संप्रभुता, क्रांति, शक्ति, दबाव एवं चुनाव के माध्यम से अपने को अभिव्यक्त करने का अवसर जरूर मिलता रहा है. राजनीति एवं राज्य सत्ता के अनुरूप इतिहास, सदैव आदर्श एवं शक्ति प्रयोग के इर्द-गिर्द सिमटा रहा है. कोई भी विचार हो या कोई राज्य सत्ता सभी ने अपनी वैधता को इसी आदर्श के आधार पर साबित की. राजसत्ता को भविष्य में प्राप्त होने वाला यह आदर्श प्रतिमान ही उसे हस्तक्षेप करने तथा बलप्रयोग का अधिकार दिया. यह सब इसलिए किया गया ताकि मनुष्य के जीवन को सफल बनाया जा सके. अपने इस आदर्श की प्राप्ति के लिए तथा हस्तक्षेप के अधिकार के लिए जो वैधता के आधार की खोज की गयी, वह भी लगातार बदलता रहा. राज्य सत्ता की वैधता का मूल स्रोत कभी दैवी शक्ति में खोजा जाता था, बाद में इसे सामाजिक समझौते में खोजा गया. इसे आमजन की इच्छा भी कहा गया. हॉब्स और लॉक के बाद रूसो ने इस सिद्धांत को सामान्य इच्छा बताया, जो फ्रांस की क्रांति का आधार बना. यह सामान्य इच्छा ही राज्य की संप्रभुता की या क्रांति का कारण रही. यह सामान्य इच्छा (जनरल विल) कालक्रम में धीरे-धीरे सिकुड़ती चली गयी. यह सामान्य इच्छा पहले बहुमत प्राप्त दल, बाद में मंत्रिपरिषद और अंत में एक व्यक्ति में (चाहे जो तंत्र या व्यवस्था हो ) सिमट कर रह गया. चाहे वह व्यक्ति कितना भी निरंकुश या पद के लिए अनुपयुक्त क्यों नहीं रहा हो. भविष्य में कभी भी मूर्त रूप नहीं लेने वाले आदर्श के निर्माण के लिए सत्ता की वैधता का खुद ही निर्धारण करना ही राजनीतिक विचारकों की आधारभूत गलती रही. सत्ता की वैधता का निर्धारण बहुमत के चुनाव या दलीय राजनीति या किसी और प्रकार से नहीं हो सकता, बल्कि यह वैधता स्वीकृति से ही प्राप्त हो सकती है. कानून, विधान, शक्ति या आदर्श के आधार पर मनुष्यों से सत्ता की वैधता के निर्धारण में राज्यतंत्र की सफलता निहित नहीं है और न ही यह कभी हो सकता है. इसके लिए व्यक्ति में निष्ठा को स्थापित और संवेदना को अंकुरित करना होगा, ताकि मनुष्य एवं मनुष्य में अलगाव व दूरी नहीं हो. मनुष्य और समाज अपने को एक-दूसरे से अलग नहीं माने बल्कि समाविष्ट समझे और मनुष्य तथा प्रकृति के बीच अन्योन्याश्रय संबंध बना रहे. इसके लिए राजनीति तंत्र को और व्यक्ति को एक संपूर्ण व्यक्ति मानने की चुनौती स्वीकार करनी होगी. उसे पहले एक राजनीतिक या सामाजिक या आर्थिक प्राणी नहीं समझना होगा. वह संपूर्ण है और अंतिम भी. न वह साधन है और न साध्य. मानसिक विभाजन के कारण हम केवल अपनी सत्ता को शरीर तक रख पाये, आत्मिक नहीं बना पाये, जहां से व्यक्ति का सृष्टि के साथ जुड़ाव होता है. प्राणी जगत में व्यक्ति अपने को अलग-अलग करके रखा है, इस कारण वह ज्यादा दुखी है. वास्तव में हम अलग दिखते है, लेकिन सभी जीव जगत एक है. इस बात को हम जितना अधिक समझेंगे और पृथकता को दूर करेंगे, हमारा ज्यादा कल्याण होगा. वैचारिक द्वंद्व में व्यक्ति खंडित रह गया है. उसकी उपयोगिता समग्रता में नहीं रह गयी है. राजनीतिक चिंतन की दुनिया में व्यक्ति की स्वतंत्रता खंडित हुई, गरिमा नहीं रही. अब एक व्यक्ति राजनीतिक होगा, लेकिन धार्मिक नहीं कह देने भर से ऐसा संभव नहीं है. व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष बनाने जैसे यूरोपीय चिंतन में विचारोपश्चात वहां के समाज से धर्म को अलग किया गया या धर्म सापेक्ष, अर्थ निरपेक्ष बनाया. जैसा कि प्लेटो अपने समाजवाद में कहता है अर्थसापेक्ष. इससे व्यक्ति खंडित ही रह जायेगा. इसे स्वीकर करना होगा कि एक व्यक्ति एक साथ धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक प्राणी है. ऐसे में उस व्यक्ति का स्वराज और स्वधर्म में कोई अंतर नहीं रह जाता. वहां स्व में व्यक्ति की समस्त निष्ठा और विश्वास एवं कर्मकांड शामिल है- अतः स्वराज ऐसा तंत्र है, जहां मनुष्य सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक प्राणी के रूप में नहीं वरन समग्र मनुष्य की हैसियत से भाग लेता है. राजनीति शास्त्र की सबसे बड़ी चुनौती है कि वह मनुष्य को संपूर्ण व सार्वभौम सत्ता के अवयव के रूप से स्वीकार करे, जो अभी तक नहीं किया गया. यह चुनौती बड़ी है, क्योंकि इसमें व्यक्ति को ‘ मैं ’ की परिभाषा से बाहर निकलकर ‘‘ हम ’’ की परिभाषा में शामिल होना होगा. तब वह अंदर देखेगा. अहं का नाश होगा और आत्मतत्व अपने को समूची सृष्टि से जोड़ सकेगा, जिसमें सभी मनुष्य, पशु-पक्षी या प्राणी की सत्ता है. वृहत्तर सत्ता का अंतर्बोध और उसके अवयवों से लगाव होने पर राज्य सत्ता को अपनी वैधता को स्थापित करने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि उसकी वैधता की स्वीकृति मिल जाती है. इससे व्यक्ति का विकास सर्वांगीण हो पाता है. हालांकि भारतीय चिंतन में सत्ता का वास्तविक केंद्र सत्ता से बाहर रहा है. जो सत्ता में नहीं है, और जो सत्ता से बाहर है, उसे शक्ति का और उसके जागरण व निर्माण का केंद्र माना गया. जो सत्ता में है, उसे तो केवल अपनी कुर्सी या ताज की चिंता रहती है और जो ताजविहीन है, वह ही हमारे चिंतन के केंद्र में भी रहा. तुलसीदास और उनकी रचना रामचरितमानस जीवन के रोम-रोम में समाविष्ट हो गया. भूषण का शौर्याधारित कविताएं नस-नस को रोमांचित कर गया. लेकिन कहां है अकबर और औरंगजेब ? सूर, कबीर, रसखान और मीरा आज भी जीवित है. सत्ता भले ही चंद्र्रगुप्त के पास थी, लेकिन वास्तविक केंद्र तो चाणक्य ही था. अगर सत्ता की वैधता पद से होता, तो शिवाजी अपना मुकुट कभी भी समर्थ गुरू रामदास के समक्ष नहीं रखते. महात्मा गांधी सत्ता से दूर रहकर भी सत्ता को प्रभावित नहीं करते और महात्मा बुद्ध उसी पार्थिव सत्ता को क्योंकर त्याग करते ? डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. 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आधुनिक लोकतंत्र में सत्ता की वैधता
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