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काश ! LIC, IOCL, ONGC, BHEL को अच्छे हालात में रहने देते, तो आज वो मदद को आगे आते

S Rohit
आज से 7 साल पहले का काल होता तो LIC, IOCL, ONGC, BHEL जैसी PSU मदद को आगे बढ़े होते. जैसा कि हमेशा करते आये थे. सरकार की इस मुश्किल घड़ी में संबल देते. ऐसे ही आपात समय के लिए FCI के गोदाम भरे रखते थे. ऐसे ही आपात स्थिति के लिए RBI के पास Contigency फंड होता थाः कि देश पर विपत्ति हो तो निश्वार्थ हाथ बढ़ाने वाला कोई हो. था, इसलिए क्योंकि वो सब हमने बेच खाया है पिछले 7 सालों में.
आज इस देश मे विश्व का अमीरतम आदमीयों में से एक है. लाखों करोड़ है उसके पास. पर वो आपको एक दवाई नहीं ख़रीद के दे सकता. अस्पताल में एक BED नहीं दिलवा सकता. क्योंकि वो आपका नहीं है, देश का नहीं है, सरकार का नहीं है. मेडिकल के नाम पर जो भी तुम उम्मीद कर रहे स्वप्न में भी, वो सब पिछले 70 सालों की ही देन है. सब सरकारी ही है लगभग.

जब Lockdown हुआ तो पूरे देश से मजदूर परदेश छोड़कर क्यों भाग पाए अपने गांव ? क्योंकि वहां बाप दादाओं की बनाई मिट्टी का ही सही, घर उन्होंने बेचा नहीं था. नदी से हर साल काट दिया जाने वाला अपने हिस्से का खेत अभी भी भाई जोत रहा था. उन्हें मालूम था कि चाहे जितना गया गुजरा हो, सिर को आसरा और पेट को रोटी बाप दादा दे ही देंगे. जिनके पास ये भी नहीं था वो चाचा, मामा, दादा, भाभी के भरोसे आए, क्योंकि उन्हीं ने परदेश में रहते हुए भी छठ में हर साल अपने गांव माथा टेकना नहीं भूले थे. वो फोन पे ही सही कुशल छेम पूछना नहीं भूले थे.

ये सब समझदार लोग थे, जानते थे कि जो दशकों में बनता है, उसकी जड़ें गहरी होती हैं. दूसरी ओर वो लोग भी होंगे जो बाप दादा की कमाई जमीन, उनकी छाई मड़ैया बेच खाये होंगे. भाई के पास रखीं कांसे की कठौती बांट ले गए होंगे. ये कहते हुए कि भैया, व्यापार हमारे खून में है. वो बर्बाद हो गए. बर्बाद खुद हुए, साथ में जिन्हें पालने की जिम्मेदारी थी, उसे भी भूखे मार ले गया.

सरकारी इसीलिए होता है, सरकारी मतलब आपका, हम सब का. सरकारी कंपनियां, सरकारी वित्तीय - प्रशासनिक संस्थाएं. आपके गांव में छोड़ आया वो घर खेत है, जो ऐसे किसी सनकी (समय) की कारगुजारियों पे आपकी उंगली थामता है. पर हाय, ऐसा कंगाल, भिखारी के हाथ थमा दिया कि पुरखों का कमाया सब कि थाली वर्तन सब पहले ही बेच खाया. संबंधों का तो पूछो मत. सत्तर सालों को कोसते-कोसते 70 सालों के बराबर से ज्यादा कर्ज खुद ही ले कर घी पी गए. अंतिम उपाय होता है जनता का भरोसा, सरकार पर, जिसके कारण वो मदद को आगे बढ़ती है, उन सब जनता को भी बर्बाद कर दिया.

अब आगे खड़ा है एक अभूतपूर्व वित्तीय संकट, एक वित्तीय आपातकाल, अभूतपूर्व महंगाई, अभूतपूर्व बेरोजगारी, अभुतपूर्व भुखमरी. क्या हो सकता है, ये सोच के सिहर जाता है मन.
देश कर्ज में इतना डूब जाएगा कि सांस भी अमेरिका चीन की मर्जी से लेना पड़ेगा. ऐसा न हों कि गए दुबे गए चीन लेने कुछ और सौंप के आये. बैंकों में रखे तुम्हारे पैसे पे तुम्हारी मर्जी नहीं चलेगी. सरकारी कर्मचारियों को सैलरी देना बाध्यता नहीं रहेगी. आपको ये डरा नहीं रहा हूं, बस होने ही वाला है. पर प्रार्थना कीजिये कि मैं गलत होऊं. मैँ भी यही चाहता हूं. 7 साल पहले क्या कोई सोच सकता था ये दिन ? जो लोग कहते हैं कि आजादी के समय नेहरू के बजाय किसी धर्मांध, किसी कट्टर हिन्दू, किसी दाढ़ी वाले हिन्दू संत शिरोमणि सत्ता पे बैठता तो हिंदुत्व विश्व भर में लहराता. तो जान लो कि तब तुम शायद ये कहने के लिये होते भी नहीं. खैर जो तब न हो सका, वो अब मुबारक हो. बड़े बुजुर्ग कह गए गए हैं न.

“पूत कपूत तो धन काहे संचय
पूत सपूत तो धन काहे संचय”
और यहां तो पूत कपूत ही नहीं व्यापारी खून वाला भी है.
बधाई वर्तमान के लिए और शुभकामनाएं भविष्य के लिए. बड़े बुजुर्ग कह गए हैं: “कभी मुंह में अपषकुन वाली बातें मत लाओ, मरने वगैरह की बातें न करो.” पता नहीं किस समय जिह्वा में सरस्वती बैठी हों. पर हमने तो इसी वादे पे उनको चुना है कि हर गांव में शमशान बनना चाहिए. भगवान कृपा करें. भूल-चूक माफ करें.
डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं.

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