खेमाशुली में सुबह 11 बजे जाम हटा लिया गया
alt="" width="1160" height="868" /> पश्चिम बंगाल के खेमाशुली में चार अप्रैल से जारी नेशनल हाईवे (एनएच) 49 जाम सातवें दिन सोमवार की सुबह 11 बजे हटा लिया गया. एनएच 49 को पश्चिम बंगाल कुड़मी समाज द्वारा जाम किया गया था. इसका नेतृत्व पश्चिम बंगाल कुड़मी समाज के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार महतो कर रहे थे. राजेश कुमार महतो के अनुसार 11 अप्रैल को कोलकाता में राज्य सरकार के साथ उनकी मांगों को लेकर बैठक होगी. बैठक में शामिल होने के लिए राज्य सरकार की ओर से राजेश कुमार महतो को पत्र मिला है. बैठक में कुड़मी समाज की मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो पुनः एनएच 49 जाम कर दिया जाएगा. वाहन चालकों को राहत : इधर, सोमवार की सुबह एनएच जाम की वजह से वाहनों की लंबी कतार बहरागोड़ा के बारासती तक पहुंच गई थी. जाम खुलने के बाद सातवें दिन वाहनों का परिचालन शुरू हो गया. इससे जाम में फंसे चालकों ने राहत की सांस ली है.
घाघर घेरा साइकिल यात्रा भी स्थगित
alt="" width="1280" height="960" /> कुड़मी जनजाति को एसटी में सूचीबद्ध करने की मांग पर कुड़मी सेना की ओर से घाघर घेरा साइकिल यात्रा निकाली गई थी. राज्य सरकार द्वारा वार्ता के लिए बुलाए जाने के बाद इसे स्थागित कर दिया गया है. कुड़मी सेना का एक प्रतिनिधिमंडल सोमवार को राज्य के मुख्य सचिव के साथ वार्ता करने कोलकाता गया है. वार्ता के बाद आगे की रणनीति बनाई जाएगी. कुड़मी सेना का प्रतिनिधिमंडल राज्य सरकार की ओर से केंद्र सरकार को मंतव्य के साथ भेजी जाने वाली सीआरआई जस्टीफिकेशन रिपोर्ट को लेकर मुख्य सचिव के साथ वार्ता करेगी.
एक अप्रैल से शुरू हुई थी साइकिल यात्रा
घाघर घेरा साइकिल यात्रा की शुरुआत एक अप्रैल को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला के झालदा के पंच शहीद मोड़ से हुई थी. नौ अप्रैल की रात को घाघर घेरा साइकिल यात्रा खेमाशोली पहुंची थी. जहां मार्ग अवरूद्ध कर अपनी मांगों को लेकर समाज के लोगों को जागरूक किया गया. इस अभियान में 81 साइकिल यात्री शामिल थे. इसके अलावा विभिन्न प्रकार के वाहनों से भी लोग साथ चल रहे थे. खेमाशोली में घाघर घेरा का अनिश्चितकालीन नाकेबंदी रविवार को नौवें दिन भी जारी था. सोमवार को इसे स्थगित कर दिया गया.ट्रेनों का परिचालन शुरू, स्टेशन पर गहमा-गहमी बढ़ी
कुड़मी समाज को एसटी में शामिल किए जाने को लेकर किए जा रहे आंदोलन थमने के बाद सोमवार से लोगों ने राहत की सांस ली. ट्रेनों का परिचालन शुरू होने से यात्रियों के साथ साथ रेलवे स्टेशन के भीतर,बाहर दुकान लगाने वालों के चेहरे पर रौनक देखी जा रही है.ट्रेनों के नहीं चलने के कारण चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन के बाहर कई दुकानें बंद हो गई थी,जो सोमवार से खुली.हालांकि सोमावर से पूरी तरीके से ट्रेनों का परिचालन सामान्य नहीं होने के कारण चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की ज्यादा भीड़ नहीं रही. जिन्हें भी जानकारी मिली की ट्रेनों का परिचालन शुरू हो गया है, यात्री अपने गंतव्य के लिए स्टेशन पहुंचने लगे थे. चक्रधरपुर पहुंचे रेलवे स्टेशन पर यात्रियों ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि ट्रेनों के चलने से अब राहत मिली है. आंदोलन के कारण यह नहीं पता चल पा रहा था कि कब तक ट्रेनों का परिचालन बंद रहेगा.वहीं रेलवे स्टेशन के बाहर ऑटो, ई रिक्शा रोज की तरह लगने शुरू हो गए हैं.
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alt="" width="150" height="150" /> रेल सेवा शुरू होने के बाद अब भोजनालय भी खुल गए : सुमित
चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन के बाहर भोजनालय दुकान संचालन करता सुमित कुमार ने कहा कि ट्रेनों के बंद रहने के कारण दुकानदारी पर खासा असर पड़ा है. स्टाफ पेमेंट में भी परेशानी हो रही थी,जिसके कारण भोजनालय को बंद करना पड़ा था. ट्रेनों के खुलने की सूचना मिलने के बाद ही सोमवार से भोजनालय खोल दिए गए हैं. alt="" width="150" height="150" />
ट्रेनों के रद्द होने से परेशानियों का सामना करना पड़ा : प्रदीप कुमार
चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन के बाहर चाय और पान की दुकान लगाने वाले प्रदीप कुमार ने कहा कि यात्री ट्रेनों के रद्द रहने के कारण परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था. सुबह से रात तक चलने वाली दुकानें बंद हो गई थी. इसके कारण आर्थिक परेशानियां उठानी पड़ी. सोमवार को पहले दिन ट्रेनों के खुलने के बाद ज्यादा भीड़ नहीं है, लेकिन अब राहत है.सुबह छह से दिन के 2 बजे तक 11 ट्रेनों का हुआ परिचालन
सोमवार सुबह छह बजे से दिन के दो बजे तक 11 ट्रेनों का परिचालन हुआ, जबकि अधिकतर ट्रेनें रद्द रही. सोमवार को 18114 बिलासपुर टाटा, 18477 उत्कल एक्सप्रेस, 12130 आजाद हिंद एक्सप्रेस, 18005 सांबलेश्वरी एक्सप्रेस, 12834 हावड़ा अहमदाबाद सुपर फास्ट एक्सप्रेस, 08107 राउरकेला चक्रधरपुर स्पेशल ट्रेन, 18011 हावड़ा चक्रधरपुर एक्सप्रेस, 08104 चक्रधरपुर टाटा स्पेशल ट्रेन, 18109 टाटा इतवारी एक्सप्रेस, 12871 हावड़ा टिटलागढ़ इस्पात एक्सप्रेस का परिचालन हुआ.जबकि 18478 उत्कल एक्सप्रेस,12129 आजाद हिंद सुपर फास्ट एक्सप्रेस समेत अन्य कई ट्रेनें रद्द रही.alt="" width="150" height="150" />
कुड़मी समाज के लोगों की मांग जायज है : सूरज महतो
सूरज महतो कहते हैं कि आंदोलन कर रहे हैं समाज के लोगों की मांग जायज है क्योंकि झारखंड बंगाल और ओडिशा के कुड़मी खुद को बिहार के कुड़मी से अलग मानते हैं . सूरज बताते हैं कि झारखंड में रह रहे कुडमी छोटानागपुर पठार के मूल वाशिंदे हैं . चूंकि छोटानागपुर में आदिवासियों की आबादी सबसे अधिक है, जिससे आदिवासियों को तो एसटी आरक्षण का लाभ मिल रहा है. लेकिन कुड़मी समाज इस से वंचित है जिसको लेकर समाज एसटी में शामिल करने की मांग एक लंबे अरसे से कर रहा है.alt="" width="150" height="150" />
अधिकार के लिए लंबे समय से लड़ रहे हैं: सुधीर मंगलेश
सुधीर मंगलेश कहते हैं कि आजादी से पहले कुड़मी जाति को एसटी का दर्जा प्राप्त था लेकिन बाद में इसे ओबीसी में डाल दिया गया जिससे समाज के लोगों में काफी रोष है. झारखंड के छोटानागपुर पठार के मूलवासी वाशिंदा होने के बाद भी हमें अपना अधिकार नहीं मिल पा रहा है. झारखंड में आदिवासियों के बाद दूसरा कुड़मी है जो यहां के मूल वाशिंदा हैं. लेकिन एक वाशिंदे को आरक्षण का अधिकार प्राप्त है कुड़मी अपने अधिकार के लिए लंबे समय से लड़ रहा है .alt="" width="150" height="150" />
कुड़मियों की मांग काफी पुरानी है : राज विशिष्ट महतो
राज वशिष्ट महतो कहते हैं कि झारखंड बंगाल और ओडिशा के कुड़मियों की यह मांग काफी पुरानी है. हम इस बात की लगातार दावा करते आ रहे हैं कि 1950 से पहले हम अनुसूचित जनजाति में शामिल थे. आजादी के बाद हम लोगों को एसटी से हटाकर ओबीसी में डाल दिया गया. मूल बाशिंदा होने के बावजूद भी झारखंड में हम लोगों को अधिकार नहीं मिल रहे हैं. आदिवासियों को तो एसटी का आरक्षण प्राप्त है, जिससे उन्हें नौकरियों में फायदा मिल रहा है लेकिन हम लोग मूल वाशिंदा होने के बाद भी आरक्षण के लाभ से वंचित हैं. हमें भी हमारा अधिकार मिलना चाहिए. हम भी यहां के मूल वाशिंदे हैं .लंबे समय से चल रहे इस आंदोलन के फैसले का समय अब आ गया है. मांग पर सरकार को जल्द पहल करनी ही पड़ेगी.alt="" width="150" height="150" />
कुड़मी समाज के लोगों में काफी रोष है : समीर महतो
समीर महतो कहते हैं कि बिहार बंगाल और ओडिशा की कुड़मी जाति के लोग लंबे अरसे से अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग पर आंदोलन कर रहे हैं. लेकिन अब तक इस मांग पर सरकार ने कोई निर्णय नहीं दिया. जिससे समाज के लोगों में काफी रोष है आने वाले समय में अगर सरकार इस मांग पर जल्द पहल नहीं किया तो हजारों युवा सड़क पर उतरकर आंदोलन को तेज करेंगे .पूर्वज बताते हैं कि आजादी से पहले कुड़मी जाति को एसटी आरक्षण का दर्जा प्राप्त था. लेकिन आजादी के बाद इसे ओबीसी में डाल दिया गया. हमें भी एसटी आरक्षण का लाभ चाहिए. ताकि हमें भी नौकरियों में ज्यादा से ज्यादा लाभ मिले. मूल वाशिंदा होने के बाद भी हम लोगों को अपना अधिकार नहीं मिल पा रहा है. इसलिए समाज के लोग आंदोलन के लिए बाध्य हैं.alt="" width="150" height="150" />
जिस तरह से आंदोलन चला यह सराहनीय है : चंदन महतो
चंदन महतो, ग्रामीण मुंडा, जामि कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में जिस तरह से कुड़मी समाज ने अपने अधिकार के लिये आंदोलन किया, वह सराहनीय है. कुड़मी अपना अधिकार पाने के लिये यह लड़ाई लड़ रही है. इसका समर्थन हर किसी को करने की जरूरत है. एसटी का अधिकार मिलना चाहिये. आजादी के पहले जब हमलोग एसटी थे, तो हमें एसटी बनाने में आखिर सरकार को परेशानी क्यों हो रही है. सरकार नहीं चाहती की हमें अधिकार मिले.alt="" width="150" height="150" />
इससे आदिवासियों का ही भला होगा : जितेंद्र महतो
कराईकेला के जितेंद्र महतो कहते हैं कि झारखंड में कुछ राजनीतिक दलों को डर है कि यादि कुड़मियों को एसटी का दर्जा मिल गया तो वे सत्ता से बेदखल हो जायेंगे. लोकतंत्र में जनता जिसको चुनेगी वह नेता होगा. इसमें साफ है कि कुड़मी यादि एसटी का दर्जा हासिल कर लेगा, तो आदिवासियों का ही भला होगा. कुड़मी आदिवासी को अलग दृष्टिकोण से कभी नहीं देखती है. रीति रिवाज परंपरा एक जैसा मानती है. सरकार को भी इसे गंभीरता से समझने की जरूरत है.alt="" width="150" height="150" />
सरकार की नींद न खुलना दुर्भाग्यपूर्ण है : जीतन महतो
जीतन महतो (सदस्य, कुड़मी समाज) का कहना है कि लगातार आंदोलन होना और सरकार की नींद नहीं खुलना दुर्भाग्यपूर्ण है. सरकार कुड़मी समुदाय के प्रति संवेदनशील नहीं है. संवैधानिक तरीके से कुड़मी अपना अधिकार मांग रहे हैं. लेकिन इसको नजरअंदाज किया जा रहा है. इससे सरकार की समुदाय के प्रति नराजगी जाहिर हो रही है. आने वाले दिनों में पूरा कुड़मी समुदाय एक होकर आंदोलन करने को तैयार है. सरकार को इसका सामना करने की जरूरत है.
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alt="" width="150" height="150" />संवैधानिक तरीक से हमारा आंदोलन चल रहा है : अनिल
अनिल महतो, अधिवक्ता, चाईबासा का कहना है कि संवैधानिक तरीक से हमारा आंदोलन चल रहा है. इसमें किसी तरह की परेशानी होने की जरूरत सरकार को नहीं है. कुड़मी समुदाय वर्षों से एसटी के श्रेणी में आते थे, लेकिन आजादी के बाद सरकार इसको षडयंत्र के तहत हटा दिया ताकि झारखंड में बसे कुड़मियों का जमीन को फैक्ट्री के लिये उपयोग में लाया जा सकें. अब यह साजिश नहीं होने दी जाएगी. जब तक हमारी मांग पूरी नहीं होती है तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा.
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alt="" width="150" height="150" />समाजिक लड़ाई में काफी परेशानी होती ही है : डॉ अनिल महतो
डॉ अनिल महतो, मनोहरपुर का कहना है कि समाजिक लड़ाई में काफी परेशानी होती है. जिसका सामना कुड़मी समुदाय को करना पड़ रहा है. लगातार आंदोलन होने के बावजूद भी सरकार किसी तरह का निर्णय नहीं लिया है यह एक दुर्भाग्यपूर्ण है. सरकार को गंभीरता से इसे लेने की जरूरत है. जिस तरह का समझौता हुआ है, यह समझौता कुड़मी समाज मानने को तैयार नहीं है. अब आंदोलन आगे भी जारी रहेगा. जबतक हमारा आंदोलन सफल नहीं होता है तब तक आंदोलन जारी रहेगा. आदिवासी का दर्जा देना सरकार के अधिकार में है.
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alt="" width="150" height="150" />हमारे कुड़मी समाज की लड़ाई जायज है : भुवनेश्वर महतो
भुवनेश्वर महतो, सदस्य, कुड़मी समाज का कहना है कि कुड़मी समाज की लड़ाई जायज है. इसे सरकार को मानना ही होगा. जबतक सरकार हमें एसटी का दर्जा नहीं देती है तबतक आंदोलन जारी रहेगा. यह एक दिन का आंदोलन नहीं है. वर्षों से यह आंदोलन चल रहा है. राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार हम सब कुड़मियों के साथ धोखा देने का काम कर रहा है. लेकिन सरकार आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया है. आज भी ग्रामीण क्षेत्र में कुड़मियों का हाल आदिवासी की तरह है. रहन सहन आदिवासी जैसा ही है. अपनी भाषा अपनी परंपरा सादियों से चलता आ रहा है. alt="" width="150" height="150" />
आदिवासी समुदाय को कुड़मियों ने बराबर साथ दिया : अभिजीत महतो
अभिजीत महतो (पार्षद वार्ड 2) का कहना है कि झारखंड आंदोलन हो या भाषाई आंदोलन दोनों में आदिवासी समुदाय को कुडमियों ने बराबर साथ दिया, तब कुड़मी खुद को आदिवासी समझ रहे थे, लेकिन जब अलग झारखंड बन गया और संथाली भाषा आठवीं अनुसूची में शामिल हो गई तो कुडमियों और उनकी भाषा को आदिवासी समुदाय खुद से अलग कर दिया है. यह झारखंड और इसके पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के कुडमियों के लिए चिंता की बात है. यही वजह है कि आज दोनों राज्य के कुड़मी एक मंच पर आकर आंदोलन कर रहे हैं.alt="" width="150" height="150" />
कुड़मियों की मांग जायज है सरकार ध्यान दे : बिशु महतो
बिशु महतो (भाजपा नेता) का कहना है कि झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुडमियों के द्वारा कुड़मी जाति को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने और उनकी भाषा कुड़माली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की जा रही है वह जायज है. झारखंड सरकार ने जब इससे संबंधित प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेज दिया है, तो केंद्र सरकार को भी मामले को लटकाने के बजाय शीघ्र निर्णय लेना चाहिए. देर की वजह से ही कुड़मी समाज आंदोलन को उतारू हो रहा है.alt="" width="150" height="150" />
कुड़मियों के त्योहार प्रकृति आधारित हैं : धीरेन महतो
धीरेन महतो (पार्षद वार्ड 25) का कहना है कि कुड़मी जाति का जो इतिहास है उससे प्रतीत होता है कि वे वर्षों से यहां जंगलों में रहकर वनवासी जीवन जीया है. उनके त्योहार प्रकृति आधारित हैं, रहन सहन सभी आदिवासी समुदाय की तरह है. साथ ही हमारे परदादा आदिवासी थे. इस बात का सबूत भी है तो फिर अब हमलोग आदिवासी क्यों नहीं हैं. इसमें आदिवासी समुदाय के नेता कुडमियों के साथ साजिश कर रही है. मैं इस आंदोलन का पूर्ण समर्थन करता हूं.alt="" width="150" height="150" />
पर्व त्योहार भी आदिवासियों से मिलते जुलते हैं : राजरानी महतो
राजरानी महतो (पार्षद वार्ड 16) कहते हैं कि कुडमियों की संस्कृति आदिवासी से मिलती जुलती है. पर्व त्योहार भी आदिवासियों से मिलते जुलते हैं, हमारे पूर्वज आदिवासी थे, तो फिर हमलोग आदिवासी कैसे नहीं हैं. अभी जो झारखंड और पश्चिम बंगाल में आंदोलन चल रहा है मैं उसका समर्थन करती हूं. कुडमियों की मांग जायज है. कुडमियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करते हुए उनके भाषा को भी आठवीं अनुसूची में शामिल करनी चाहिए. इसमें राज्य और केंद्र सरकार दोनों को पहल करनी चाहिए.समाज वृहद आंदोलन की तैयारी में जुटा
कुर्मी को आदिवासी दर्जा देने की मांग को लेकर झारखंड, बंगाल, ओडिशा के समाज से जुड़े लोग वृहद आंदोलन की तैयारी में लगे हैं. आंदोलनकारियों ने ट्रेन रोकी, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ा. इस आंदोलन से आम जनों सहित कुर्मी समाज के लोगों को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. नेताओं का कहना है कि कुर्मी समाज के साथ अन्याय हो रहा है. इस आंदोलन को अब वृहद रूप देना होगा.
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alt="" width="150" height="150" />विलुप्त करने की रची जा रही साजिश : मंटू
झारखंड आदिवासी कुर्मी मंच धनबाद के संयोजक मंटू महतो ने कहा कि हक की मांग को लेकर आर्थिक नाकेबंदी की जाएगी. आंदोलन और इसके लिए झारखंड, ओड़िशा और बंगाल के लोगों से से बात हो रही है. उन्होंने कहा कि कुर्मी समाज को विलुप्त करने की साजिश रची जा रही है, जिसे बर्दाश्त नहीं करेंगे. सरकार के इस रवैये के कारण यह समाज 72-73 वर्षों में अपनी भाषा और संस्कृति के मामले में भी पिछड़ गया है. alt="" width="150" height="150" />
सूची से हटाने के साथ शुरू हुई साजिश : अरविंद
आदिवासी कुर्मी समाज झारखंड के प्रदेश संयोजक अरविंद पुनअरिआर ने कहा कि हमारी मांगें वर्षो पुरानी है. 1950 में कुर्मी जनजाति को बिना नोटिफिकेशन के सूची से हटा दिया गया. उस वक्त पढ़े लिखे और बुद्धिजीवियों की कमी के कारण लोग इस षड्यंत्र को समझ नहीं सके. लेकिन जब कुर्मी समाज ने अपना इतिहास खंगाला तो पूरा समाज अपनी पुरानी जनजाति पहचान को पाने के लिए आंदोलित हो उठा है .alt="" width="150" height="150" />
मांगें पूरी नहीं होने पर और तेज होगा आंदोलन : चौधरी
वृहद झारखंड आदिवासी कुर्मी मंच के संयोजक चौधरी चरण महतो ने कहा कि झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा के लोग विगत 72वर्षों से अपने हक, अधिकार, अस्त्तिव और पहचान की लड़ाई लड़ हैं. सरकार को हर हाल में हमारी मांगें माननी पड़ेगी, क्योकि हमलोग तथ्यात्मक लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि मांगें पूरी नहीं होने पर आंदोलन और तेज होगा. इसकी तैयारी चल रही है .alt="" width="150" height="150" />
अब सामान्य हो रहे हैं हालात : विनय मिश्रा
जुगसलाई गाढ़ाबासा के निवासी सह टाटानगर स्टेशन बुक स्टॉल के स्टाफ विनय कुमार मिश्रा ने बताया कि रेल रोको आंदोलन के कारण स्टेशन पर सन्नाटा पसरा हुआ था. जो अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है. यात्रियों की आवाजाही शुरू होने से स्टॉल पर बिक्री भी शुरू हो गई है. उन्होंने उम्मीद जतायी की सभी ट्रेनों का परिचालन शुरु होने से मंदी की स्थिति समाप्त हो जाएगी.alt="" width="150" height="150" />
खत्म हो रहा है मंदी का दौर : सुदामा कुमार
टाटानगर स्टेशन पर मिल्क पार्लर (स्टॉल) के संचालक सुदामा कुमार ने बताया कि कुड़मी समाज के रेल रोको आंदोलन के कारण टाटानगर स्टेशन वीरान हो गया था. यात्री नहीं रहने के कारण सामान की बिक्री पूरी तरह प्रभावित हो गई थी. लेकिन सोमवार की सुबह से स्टेशन पर चहल-पहल बढ़ने से बिक्री शुरु हुई है. हालांकि पहले की तरह अभी दुकानदारी नहीं है.alt="" width="150" height="150" />
ट्रेन से आने-जाने में सुविधा होती है: मुन्ना मैती
ओडिशा के कटक निवासी मुन्ना मैती ने बताया कि ट्रेन सेवा बहाल होने से काफी राहत मिली है. उन्होंने कहा कि जमशेदपुर में निजी काम से वे बस से यहां आए थे. लेकिन जब मालूम चला कि ट्रेन शुरु हो रही है, तो ट्रेन परिचालन की जानकारी लेने के लिए स्टेशन आया. उन्होंने कहा कि ट्रेन में बस के मुकाबले कम भाड़ा लगता है.ट्रेन सेवा बहाल होने राहत मिली है: संजय
परसूडीह के रहने वाले संजय यादव ने बताया कि वे टेम्पो चलाकर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. ज्यादातर वे टाटानगर स्टेशन से यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाते हैं. पांच-छह दिन तक स्टेशन से सवारी मिलना मुश्किल हो गया था. जिसके कारण मुश्किल से दाल-रोटी का जुगाड़ हो पाया.alt="" width="150" height="150" />
अधिकार के लिए तो लड़ना होगा : बालकुमार महतो
चुरचू प्रखंड के 20 सूत्री अध्यक्ष बालकुमार महतो कहते हैं कि अधिकार के लिए लड़ाई तो लड़नी होगी. कुड़मी समाज की मांग जायज है. इसे अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करना ही चाहिए. सरकार इस मामले को गंभीरता से समझे. वर्ष 1891 में इसीलिए जनजाति यानी ट्राइब स्टेट्स दिया गया, कास्ट नहीं. 1908 में उनकी जमीन सीएनटी एक्ट के तहत संरक्षित की गई.
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alt="" width="150" height="150" />कुड़मी भी प्रकृति के उपासक ही हैं : ब्रजकिशोर महतो
केरेडारी के ब्रजकिशोर महतो ने कहा कि कुड़मी भी आदिवासियों की तरह प्रकृति उपासक हैं. फिर कुड़मी को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने में कहां परेशानी है. छोटानागपुर पठार आदिकाल से आदिवासियों का निवास स्थान रहा है. यहां हो, मुंडा, संथाल, उरांव आदि जनजातियों के साथ कुरमी/कुड़मी जन जाति भी आदि काल से साथ साथ रहते आ रहे हैं. alt="" width="150" height="150" />

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