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अच्छा लगे या बुरा, कहना पड़ेगा

Sanjay kumar Singh

मुझे लगता है कि लोगों को ऐसा बना दिया गया है, इसके लिए प्रेरित किया गया है कि वे कुछ भी लिखें, बोलें, गलत का भी समर्थन करें. पत्रकारों पर इस बात के लिए दबाव डाला जाता रहा है कि आप आलोचना करते हैं तो प्रशंसा भी कीजिए. इस तरह सरकार ने अर्ध साक्षरों, अज्ञानियों और अपराधियों की फौज खड़ी की जो सोशल मीडिया पर सरकार का समर्थन और विरोधियों का विरोध करते हैं. इस संबंध में पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी की किताब भी है, आई एम अ ट्रोल. 

 

दूसरी ओर सरकार ने मीडिया को नियंत्रित किया और ऊल-जलूल (भी) लिखने के लिए प्रेरित और मजबूर किया. प्रचार, नाम और इनाम के भूखे 272  विशिष्ट नागरिकों और 204 पूर्व नौकरशाहों जैसे लोग हैं जो राहुल गांधी को पप्पू साबित करने के अभियान, मकसद या राजनीति के बारे में नहीं जानते हैं या जानते हुए भी लगभग तानाशाह सरकार का प्रचार और समर्थन करते हैं. 

 

अपनी ओर से सरकार ने न सिर्फ मीडिया को नियंत्रित कर रखा है, डिजिटल मीडिया पर भी नियंत्रण का कानून बना लिया है और उसका भरपूर दुरुपयोग कर रही है. रही-सही कसर किताबों के प्रकाशन पर नियंत्रण करके पूरी कर ली है. पूर्व सेनाध्यक्ष को किताब नहीं लिखने देना और जब उसके अंश कारवां में प्रकाशित हो गए तब भी संसद में उसे नहीं पढ़ने देकर सरकार ने मूल मुद्दा ही खत्म कर दिया कि पूर्व सेनाध्यक्ष ने जो लिखा वह सही है, उनकी राय है और उनका भोगा हुआ यथार्थ है. जो बताता है कि सरकार चुनाव जीतने के अलावा- 'जो उचित समझो, करो' से ज्यादा नहीं है.

 

चुनाव जीतने वाली सरकार कैसे जीत रही है वह सर्वविदित होने के बावजूद मुद्दा नहीं है. नरेंद्र मोदी ने क्या किया और क्या नहीं किया के बावजूद वही सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि तथाकथित बहुमत उनके साथ है, वे प्रधानमंत्री की सम्मानित कुर्सी पर बैठे हैं. इसलिए उनके खिलाफ नहीं बोला जा सकता है. भले उन्होंने देश के आम नागरिकों का जीना मुश्किल बना रखा हो. 

 

विपक्षी मुख्यमंत्रियों, नेताओं, विरोधियों और मुसलमानों ही नहीं सोनम वांगचुक और शंकराचार्य के अलावा कुछेक उद्यमियों और व्यवसायियों ही नहीं, फिल्म अभिनेताओं उनके बच्चों के साथ जो सरकारी ज्यादती की गई है, महीनों जेल में रखा गया है और बाद में पता चला है कि मामला सरकार ने ही वापस ले लिया या था ही नहीं. 

 

ऐसे में वोट चोरी, चुनाव चोरी और निष्पक्ष चुनाव से संबंधित मुख्य चुनाव आयुक्त की चयन प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट वर्षों से फैसला नहीं कर रहा है और हाल में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 2023 के कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, यह कहते हुए कि इसमें हितों का टकराव हो सकता है. 

 

मुझे लगता है कि यह अपने काम से बचना है. ईमानदार और निष्पक्ष निर्णय नहीं कर पाने की ज्ञात स्थिति में ऐसा हो सकता है और जो स्थितियां हैं उससे यही संकेत मिलता है. वरना न्यायपालिका पर दबाव, इनाम और तबादले के मामलों की कमी नहीं है फिर भी मुख्य न्यायाधीश ने आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर अनूठी कार्रवाई की है लेकिन वोट चोरी, एसआईआर की मनमानी को रोकने के उपाय करने से बचते रहे हैं.

 

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय होने तक सदन की कार्यवाही से दूर रहने का नैतिक निर्णय लिया था. 118 विपक्षी सांसदों द्वारा 'पक्षपाती रवैये' के आरोपों के बाद वे अध्यक्ष के रूप में पीठासीन नहीं हुए. अंततः, यह प्रस्ताव संख्या बल के कारण ध्वनिमत से खारिज कर दिया गया. हालांकि प्रधानमंत्री ने सदन में बिरला के धैर्य, निष्पक्षता और सभी को साथ लेकर चलने की शैली की सराहना की. इसमें यह दिलचस्प हुआ कि विपक्ष के जिन सांसदों को पूरे सत्र से बाहर कर दिया गया था वे गेट पर धरना देने जैसी लोकतांत्रिक कार्रवाई कर रहे थे. धरना जहां भी हो, लोग चाय-बिस्किट-नाश्ता करते ही हैं. 

 

चूंकि राहुल गांधी इस निलंबन का विरोध कर रहे थे इसलिए उन्हें बदनाम किया गया, निलंबन (और समय से पहले खत्म किये जाने) की जगह मुद्दा चाय-बिस्किट बन गया. ओम बिरला की वापसी और उनकी प्रशंसा मुद्दा ही नहीं है. जबकि वर्षों से लोकसभा का उपाध्यक्ष नहीं होने और ओम बिरला द्वारा हमेशा सिर्फ विपक्षी सांसदों के खिलाफ कार्रवाई का मुद्दा भी है और उसकी भी चर्चा हुई. 

 

बात सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष की नहीं है. महाभियोग के साये में बंगाल, दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हो रहा है. यहां लोकसभा अध्यक्ष या मुख्य न्यायाधीश जैसे आदर्श की बात नहीं है. तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में महाभियोग का नोटिस 13 मार्च को दिया. 15 मार्च 2026 को चुनाव आयोग ने चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों की घोषणा कर दी. 17 मार्च को पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने किया DGP-IG समेत कई अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया. प्रेस कांफ्रेंस में महाभियोग के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब नहीं दिया. फिर भी सब चंगा सी. 

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