मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने परिसीमन के मुद्दे को लेकर बीजेपी पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि परिसीमन सिर्फ विधानसभा और लोकसभा की सीटों का मामला नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में आदिवासी समाज की राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उसकी आवाज को तय करेगा.
शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि आज की इस सभा को दिल्ली से भी लोग देख रहे हैं. उन्होंने बारिश के बीच सभा में पहुंचे लोगों का अभिवादन करते हुए कहा कि दूर-दराज से झारखंड के सभी 24 जिलों से आए माता-पिता, भाई-बहनों और गणमान्य अतिथियों को उनकी ओर से जोहार है.
उन्होंने कहा कि ये परिसीमन केवल कोई चुनावी मुद्दा नहीं है. ये सिर्फ विधानसभा और लोकसभा की सीटों की बात नहीं है. परिसीमन तय करेगा कि आने वाले नए भारत में आदिवासी समाज कितना मजबूत होगा. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपनी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ताकत का हिसाब दिल्ली में बैठे लोगों को तय नहीं करने देगा. समाज खुद तय करेगा कि उसका प्रतिनिधित्व कितना होना चाहिए.
2007 के परिसीमन का जिक्र कर बीजेपी पर हमला
शिल्पी नेहा तिर्की ने अपने संबोधन में 2007 के परिसीमन का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उस समय आदिवासी समाज की सीटें घटने की बात सामने आई थी और कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में बैठकर परिसीमन को रोकने का काम किया था.
उन्होंने लोगों से अपील की कि गांव-घर लौटने के बाद वे इस बात को लोगों तक पहुंचाएं और बीजेपी के उन सवालों का जवाब दें, जिसमें कांग्रेस से आदिवासियों के लिए किए गए काम का हिसाब पूछा जाता है.
आदिवासियों की संख्या कम होने की जिम्मेदारी आदिवासियों की नहीं
उन्होंने कहा कि झारखंड में आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए सीएनटी कानून, एसपीटी कानून और पांचवीं अनुसूची जैसे कई प्रावधान हैं. इसके बावजूद अगर आदिवासियों की जमीन लूटी गई, परिवारों का विस्थापन हुआ, लोगों को पलायन करना पड़ा और आदिवासी आबादी कम हुई तो इसके लिए आदिवासी समाज को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
अगर आदिवासियों का विस्थापन हुआ है, आदिवासियों की जनसंख्या कम हुई है तो इसके लिए आदिवासी जिम्मेवार नहीं हैं. इसलिए आदिवासियों से इसका हिसाब नहीं लिया जाना चाहिए.
जयपाल सिंह मुंडा के विचारों का किया उल्लेख
अपने संबोधन में शिल्पी नेहा तिर्की ने संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा द्वारा आदिवासी समाज के अधिकारों को लेकर उठाए गए सवालों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि जिस समाज को इतिहास में कभी उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, आज उसी की संख्या के आधार पर उसकी राजनीतिक आवाज और प्रतिनिधित्व तय करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी.
उन्होंने कहा कि झारखंड बनने के बाद दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में लोग नौकरी और रोजगार के लिए यहां आए. समय के साथ कई लोग परिवार के साथ यहां बस गए और जमीन लेकर घर भी बनाए. उन्होंने कहा कि आज गांवों और शहरों में जाकर यह देखना होगा कि स्थानीय लोगों के बीच किस तरह जनसांख्यिकीय बदलाव हुआ है.
सड़क से सदन और सदन से दिल्ली तक लड़ेंगे
शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि आज के महाजुटान से जिस विरोध का आगाज हुआ है, उसे आगे सड़क से सदन और सदन से दिल्ली तक ले जाया जाएगा. उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी एक समाज की नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी-मूलवासी समाज की लड़ाई होनी चाहिए.
उन्होंने अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समाज के अधिकार और प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने की बात कहते हुए लोगों से एकजुट रहने की अपील की.