Search

Advertisement
Advertisement
Advertisement

दंगों के बीच खरगोन में नए कैराना की तलाश ?

Advertisement
Advertisement
Shravan Garg  सात करोड़ की आबादी वाले शांतिप्रिय मध्य प्रदेश में भी क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तर्ज़ पर किसी कैराना की तलाश की जा रही है और मीडिया इस काम में विघटनकारी ताक़तों की मदद कर रहा है ?  साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील इंदौर के कुछ हिंदी अख़बारों ने अपने पहले पन्ने पर फ़ोटो के साथ एक समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया कि दंगा-प्रभावित खरगोन (इंदौर से 140 किलो मीटर) के बहुसंख्यक वर्ग के रहवासी इतनी दहशत में हैं कि वे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए अपने आवासों को बेचना चाहते हैं. अख़बारों ने खरगोन से कई परिवारों के पलायन का समाचार भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है. अखबारों ने दी ‘’मकान बिकाऊ है’’ की भ्रामक सूचना : अख़बारों ने खबर के साथ जो चित्र प्रकाशित किया उसमें सरकारी योजना के तहत बने मकान की दीवार पर ‘’यह मकान बिकाऊ है’’ की सूचना के साथ सम्पर्क के लिए एक मोबाइल नम्बर भी मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है. दो प्रतिस्पर्धी अख़बारों ने एक ही मकान पर अंकित सूचना को सम्पर्क के लिए एक ही मोबाइल नम्बर के हवाले से दो अलग-अलग मालिकों के नाम और पतों की जानकारी से प्रकाशित किया है. मोबाइल नम्बर के प्रकाशन ने निश्चित ही देश भर के ख़रीदारों को बिकने के लिए उपलब्ध मकानों की सूचना और मध्य प्रदेश की ताज़ा साम्प्रदायिक स्थिति से अवगत करा दिया होगा. विवरण उसी खरगोन शहर के हालात का है, जिसके ज़िले में देवी अहिल्याबाई होल्कर के जमाने की राजधानी महेश्वर नर्मदा नदी के तट पर स्थित है.  क्या मध्यप्रदेश भी ‘नेस्तनाबूद’ और ‘बुलडोज़र’ की संस्कृति की ओर : वे तमाम लोग जो खरगोन से उठ रहे धुएं के अलग-अलग रंगों का दूर से अध्ययन कर रहे हैं, उन्हें एक नया मध्य प्रदेश आकार लेता नज़र आ रहा है. एक ऐसा मध्य प्रदेश जिसकी अब तक की जानी-पहचानी भाषा और संस्कृति में ‘नेस्तनाबूद’ और ‘बुलडोज़र’ जैसे नए-नए शब्द जुड़ रहे हैं. क़ानून और अदालतों का राज जैसे समाप्त करने की तैयारी चल रही हो. सत्ता में बैठे लोगों के मुंह से निकलने वाले शब्द ही जैसे क़ानून की शक्ल लेने वाले हों ! राजनेताओं और नौकरशाहों की बोलियां जनता को अपरिचित जान पड़ रहीं हैं. उन्हें लग रहा है कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच की भौगोलिक सीमाएं जैसे समाप्त हो गईं हैं और दोनों राज्य एक दूसरे में समाहित हो गए हैं ! खबर छापनेवाले अखबारों से भी पूछा जाना चाहिए सवाल : प्रदेश में तेज़ी से बदलते हुए साम्प्रदायिक घटनाक्रम को लेकर लोग चिंतित हैं और उन्हें डर लग रहा है कि विधान सभा चुनावों (2023) के पहले कहीं कोई कैराना मध्य प्रदेश में भी तो नहीं ढूंढा जा रहा है ! साल 2017 के विधान सभा चुनावों के ठीक पहले यूपी के कैराना से बहुसंख्यक वर्ग के लोगों के पलायन की खबरें जारी हुईं थीं. हाल के यूपी विधान सभा चुनावों के पहले भी कैराना के साम्प्रदायिक भूत को जगा कर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिशें कीं गईं थीं. तेरह अप्रैल (बुधवार) को खरगोन के दहशतज़दा बहुसंख्यक रहवासियों द्वारा अपने मकान बेचने की खबरें अख़बारों में प्रकाशित हुईं. उसके एक दिन पहले (मंगलवार को ) समाचारपत्रों ने प्रकाशित किया कि सौ परिवारों ने खरगोन छोड़ दिया है और उन्होंने दूसरे शहरों में रिश्तेदारों के यहां शरण ले ली है. ( पाठकों द्वारा इन अख़बारों से मांग की जानी चाहिए कि वे खरगोन छोड़ने वाले परिवारों की प्रामाणिक जानकारी प्रकाशित करें.) यूपी में खुल चुका है कैराना की कहानी गढ़ने का राज :  जून 2016 में कैराना से भाजपा सांसद (स्व.) हुकुमसिंह ने एक सूची जारी कर देशव्यापी सनसनी फैला दी थी कि 346 हिंदू परिवार अल्पसंख्यकों की दहशत के कारण कैराना से पलायन कर गए हैं. जारी की गई सूची को लेकर जब देश भर में हल्ला मचा तो पलायन करने वाले परिवारों की संख्या को 63 और स्थान कंधाला बताया गया. जो सूची जारी की गई, उसमें भी कथित तौर पर चार नाम मृतकों के थे और तेरह परिवार कैराना में ही रह रहे थे. पर तब तक खबर को लेकर यूपी के चुनावों पर जो असर होना था, वह हो चुका था. 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले मैंने जब कैराना की यात्रा की और लोगों से मिला, तब पता चला कि साम्प्रदायिक विद्वेष को लेकर जितना प्रचारित किया गया था, उसमें काफ़ी कुछ अतिरंजित और चुनावी राजनीति से प्रेरित था. कैराना यात्रा के दौरान मैंने स्व हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह से भी मुलाक़ात की थी. मृगांका सिंह ने भाजपा की ओर से इस बार चुनाव भी लड़ा था. बहुसंख्य आबादी हिन्दुओं की और पलायन भी उन्हीं का ? : यूपी का कैराना तो मुस्लिम बहुल क्षेत्र है पर खरगोन में तो बहुसंख्य आबादी हिंदुओं की है. इसके बावजूद वहां से परिवारों के पलायन की एक जैसी ही खबरें अलग-अलग अख़बारों में क्यों और कैसे आ रहीं हैं ? पूछा जाना चाहिए कि शहर जब कर्फ़्यू की क़ैद में हो, इतनी बड़ी संख्या में परिवारों का पलायन कैसे हो सकता है ? इन परिवारों ने खरगोन छोड़कर किन जगहों पर शरण ली है ? क्या सरकार और ज़िला प्रशासन पलायन करने और मकान बेचने वाले परिवारों को सुरक्षा नहीं प्रदान कर पा रहा है ? क्या प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत निर्मित मकानों को भी बेचा जा सकता है? प्रशासन से सवाल-उपद्रवी तत्व कामयाब कैसे हो गए : खरगोन का इतिहास जानने वाले बताते हैं कि साम्प्रदायिक दृष्टि से शहर और ज़िले के कुछ स्थान हमेशा से संवेदनशील रहे हैं. इन स्थानों पर छिटपुट घटनाएंभी होतीं रहीं हैं. पर इस तरह का तनाव (सम्भवतः) तीन दशकों में पहली बार खरगोन शहर में उत्पन्न हुआ है. ’राम नवमी’ सहित सारे पर्व और त्योहार अभी तक शांतिपूर्ण तरीक़े से मनाए जाते रहे हैं. पूछा जा रहा है कि इस बार ऐसा क्या हो गया कि हिंसा और आगज़नी की घटनाएं इतने व्यापक स्तर पर हो गईं और शासन-प्रशासन को विघ्न-संतोषी तत्वों की गतिविधियों को लेकर कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो पाई ! प्रशासनिक दृष्टि से ताकतवर माने जाने वाले प्रदेश में उपद्रवी तत्व अशांति फैलाने में कैसे सफल हो गए ? क्या इसे जनता के स्तर पर हुई चूक मान लिया जाए? इतनी बड़ी संख्या में गुंडों की पहचान का राज क्या :  कोई सवा लाख की आबादी वाला खरगोन शहर रातों-रात देश भर में सांप्रदायिक सुर्ख़ियों में आ गया. अब सरकार ने अपनी पूरी ताक़त गुंडों और दंगाइयों के ख़िलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई करने में झोंक रखी है. एक छोटे से शहर में जितनी बड़ी संख्या में गुंडों की पहचान की गई है, उससे कल्पना की जा सकती है कि सात करोड़ से ज़्यादा की जनसंख्या वाले प्रदेश में उनकी गिनती क्या होगी और आगे चलकर कितने और मकानों-दुकानों पर सरकार के बुलडोज़र चलने वाले हैं. बताया गया है कि निजी और सरकारी सम्पत्ति को क्षति पहुंचाने वालों से तीन महीनों में नुक़सान की वसूली की जाएगी. दावों की सुनवाई के लिए एक ‘क्लेम ट्रिब्यूनल’ भी गठित किया जाने वाला है.  क्या बुलडोजरों का भय दिखाकर ही चलेगा शासन :  एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार द्वारा अवैध निर्माणों, अतिक्रमणों, गुंडों और दबंगों के ख़िलाफ़ की जा रही ‘बुलडोज़री’ कार्रवाई का हाल-फ़िलहाल यह मानते हुए समर्थन किया जाना चाहिए कि उसके पीछे किसी धर्म विशेष के प्रति साम्प्रदायिक-राजनीतिक विद्वेष की भावना नहीं बरती जा रही है, सभी वर्गों के दोषियों के साथ एक जैसा व्यवहार हो रहा है और सभी आवश्यक क़ानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन किया जा रहा है. खरगोन में शांति की स्थापना के बाद सरकार को निश्चित ही इन सब सवालों के जवाब विधान सभा में भी देने होंगे और जनता की अदालत में भी. सरकार से यह सवाल भी किया जाने वाला है कि क्या अब मध्य प्रदेश में (भी?) शासन बुलडोज़रों का भय दिखाकर ही चलने वाला है ? क़ानून और अदालतों की ज़रूरत में सरकार का यक़ीन कम या समाप्त हो रहा है ? डिस्केलमर : लेखक दैनिक भास्कर के पूर्व समूह संपादक हैं और ये इनके निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]  

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही