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मालेगांव ब्लास्टः प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर फैसले की घड़ी करीब

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Pankaj Chaturvedi
फैसले की घड़ी करीब है. यदि सब कुछ ठीक चला तो अगले दो-चार दिन में पप्पी यानि प्रज्ञा ठाकुर की मालेगांव बम धमाके में भूमिका का फैसला हो जाएगा. प्रज्ञा ठाकुर के बारे में बहुत सारे लोग बहुत कम जानकारी रखते हैं. लिहाजा प्रज्ञा ठाकुर के बारे में जानना सबके लिए जरुरी है. मध्‍यप्रदेश के भिंड जिले के लहार कस्‍बे की प्रज्ञा उन दिनों जिंस टीशर्ट पहन कर मोटर साईकिल चलाने के लिए मशहूर थीं. उनके पिता आरएमपी डाक्‍टर थे व राष्‍ट्रीय स्‍वंय संघ के सक्रिय कार्यकर्ता. भिंड जिले के 50,000 की आबादी वाले इस छोटे से कस्बे में प्रज्ञा सिंह को हर कोई पप्पी के नाम से ही जानता है. 20  साल पहले तक जब वह साध्वी नहीं बनी थी, तब वह इसी गांव की गलियों में पप्पी ठाकुर बनी फिरती थी. 
इस गांव में किसी को भरोसा नहीं होता कि पप्पी ने यहां से जाने के बाद ऐसा कौन सा पाठ पढ़ लिया है कि वह अब साध्वी से आतंकवादी की श्रेणी में आ गई. प्रज्ञा सिंह अपने मां-बाप की चार बेटियों एवं एक बेटे में दूसरे नंबर की संतान है. सबसे बड़ी का नाम बबली है तो प्रज्ञा को सब पप्पी कहते थे.
प्रज्ञा के परिवार को जानने वाले स्थानीय नागरिक सूर्य प्रताप सिंह कहते हैं कि जब पप्पी सूरत से पहली बार मोटरसाइकिल लेकर आई थी तो खूब इठलाती घूमती थी. उसे अपनी मोटरसाइकिल से इतना लगाव था कि छोटे से छोटे काम के लिए भी दिन भर मोटरसाइकिल पर उड़ा करती थी. एक बात यहां और प्रचलित है कि लहार में पहली बार डिश टीवी उसी ने लगवाया था. वह भी तब, जब उसके अपने घर पर टीवी तक नहीं था. लोग चर्चा करते थे कि उसके हाथ आखिर ऐसा कौन सा खजाना लग गया कि उसकी जिन्दगी का अंदाज ही बदल गया. प्रज्ञा की शुरूआती पढ़ाई लहार की प्राथमिक कन्याशाला में हुई. उसे संस्कृत पढ़ना अच्छा लगता था. उसके शिक्षक आरके दीक्षित बताते हैं कि स्कूल में तो वह गांव की एक सीधी-साधी लड़की थी, खूब पढ़ती थी और सलवार सूट पहनती थी, लेकिन स्कूल के बाद उसने कालेज की दहलीज पर कदम रखा तो उसकी तमन्नाओं  को पर लग गए और गांव की यह पप्पी बाल कटवा कर जींस पहनने लगी. उसी दौरान वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से भी जुड़ी. प्रज्ञा की एक खासियत और थी कि उसने लोगों को पछाड़ने के दांव कबड्डी के मैदान में सीखे.
अचानक वह साध्‍वी बन गई व प्रवचन देने लगी. फिर गुजरात के सूरत में एक आश्रम बना लिया व अपने परिवार को भी वहीं बुला लियाा आज भी लहार में सीपी ठाकुर का मकान किराये पर है.
मालेगांव बम धमाके में प्रज्ञा की भूमिका का सबसे बडा आधार घटनास्‍थल पर उस मोटर साईकिल का पाया जाना था जो कि प्रज्ञा के नाम मध्‍य प्रद्रेश में पंजीकृत थी. प्रज्ञा की तरफ से कहा जाता रहा कि वह एलएनएल फ्रीडम मोटर साईकिल को पहले ही अक्‍तूबर 2004 में बेच चुकी थी. प्रज्ञा ठाकुर को 23 अक्टूबर 2008 को गिरफ्तार किया गया था.  साध्वी पर मालेगांव ब्लास्ट के साथ ही साथ सुनील जोशी की हत्या का भी आरोप थे. कहा गया था कि प्रज्ञा ने सुनील जोशी की हत्या इस लिए करवा दी थी क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं वो मालेगांव ब्लास्ट का राज ना खोल दें. NIA की जांच में भी ये बात सामने आया कि सुनील का प्रज्ञा के प्रति आकर्षण ही उनकी हत्या का कारण बना.
बहरहाल सरकार बदलने के साथ जांच की दिशा बदल गई थी और उसे निर्दोष बताया जाने लगा. नई सरकार के साथ आतंक की परिभाषा  बदल गई, देश की सर्वोच्‍च जांच एजेंसी एनआईए ने पिछले दस साल में अपनी जांच व मुकदमो में दिशा बदली और आज वह निर्दोष प्रताड़ित औऱ संत बन गईं.
इस मामले में जब प्रज्ञा ने अदालत में निवेदन किया कि उस पर मामला वापस लिया जाये तो अपने फैसले में सेशन जज वीएस पडलकर ने कहा, सभी आरोपियों पर अभिनव भारत संस्था बनाने और 2008 में मालेगांव धमाका करने का आरोप लगाया जाता है जिसमें 6 लोग मारे गए थे. मध्य प्रदेश सरकार ने भी अपने राज्य में दो मुक़दमों में वांछित दिखा कर प्रज्ञा को मध्य प्रदेश बुलाया, फिर उन्हें अस्पताल के नाम पर राजसी सत्कार दिया और फिर वह सुनील जोशी ह्त्या कांड में बरी हो गईं. यदि कोई सामान्य बुद्धि वाला इंसान भी सुनील जोशी हत्याकांड के फैसले को देखेगा तो कह देगा कि राज्य सरकार ने जानबूझ कर केस हरवाया और मुजरिमों को बरी करवाया. मालेगांव धमाका (2008) की स्पेशल प्रॉसिक्युटर रोहिणी सालियन ने 2015 में आरोप लगाया था कि इस हमले के अभियुक्तों को लेकर नरमी बरतने के लिए उन पर दबाव बनाया गया.
रोहिणी ने एनआईए के एसपी सुहास वर्के पर यह आरोप लगाया था. रोहिणी ने कहा था कि ऐसा केस को कमज़ोर बनाने के लिए किया गया ताकि सभी अभियुक्त बरी हो जाएं. इस ब्लास्ट में भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी अभियुक्त हैं.
रोहिणी ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा था, ``एनडीए सरकार आने के बाद मेरे पास एनआईए के अधिकारियों का फोन आया. जिन मामलों की जांच चल रही थी उनमें हिन्दू अतिवादियों पर आरोप थे. मुझसे कहा गया वो बात करना चाहते हैं. एनआईए के उस अधिकारी ने कहा कि ऊपर से इस मामले में नरमी बरतने के लिए कहा गया है.`` 2016 में एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा का नाम आरोपपत्र में शामिल नहीं करते हुए क्लीन चिट दे दी थी. 2017 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रज्ञा ठाकुर को जमानत दी. इसी साल इस मामले के मुख्य अभियुक्त कर्नल पुरोहित को सुप्रीम कोर्ट से बेल मिली. देखते हैं कि इस हफ्ते मालेगांव की अदालत उस बम कांड में मारे गए लोगों को किस तरह का न्याय देती है. मुंबई बम कांड में शहीद हुए हेमंत करकरे की मेहनत को न्याय मिलता है या नहीं ?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह लेख उनके सोशल मीडिया एकाउंट फेसबुक से लिया गया है)

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