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ममता, केजरीवाल के क्रेडिट कार्ड लैप्स

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बैजनाथ मिश्र

 

अपने देश में दो ऐसे नेता हैं जो धूमकेतु स्वभाव के कारण छा गये थे. इनमें से एक ने बड़ी पार्टी में राजनीति का ककहरा सीखा, बाद में दूसरे गंठबंधन में शामिल होकर अपने तेवर दिखाये और फिर खुद की पार्टी बनाकर अहं ब्रह्मास्मि का लाबादा ओढ़ लिया. दूसरे की स्पीड ज्यादा तेज थी. उसने बेहद शातिराना तरीके से एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से बने माहौल को पार्टी का मास्क ओढ़ा दिया और पहले ही राउंड में एक जमी-जमायी पार्टी को सत्ता से उखाड़ फेंका. यह करतब पहले वाले ने भी किया, लेकिन उसे संघर्ष करना पड़ा, दूसरे वाले का रंग बिना हर्रे फिटकिरी के चोखा हो गया. 

 

इस दूसरे वाले ने कमाये धोतीवाला और खायें टोपीवाला की कहावत को हकीकत में बदल दिया. इन दोनों ने अपनी क्षमता के प्रदर्शन से तब चौंकाया जब कांग्रेस का सूर्य अस्ताचलगामी हो गया था और भाजपा नये नेतृत्व के साथ मुकाबले के लिए खुद को तैयार कर रही थी. परिणाम यह हुआ कि अपनी चमक से राजनीतिक क्षेत्र को चकाचौंध करने वाले नेताओं के सामने उसने अपने एक मॉडलधारी नेता को उतार दिया. पहले वाले दोनों नेता थे ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल तो भाजपा ने नरेंद्र मोदी को गुजरात से लाकर राष्ट्रीय फलक पर उतार दिया. 

 

ममता भाजपा के साथ गंठबंधन में बतौर केंद्रीय मंत्री काम कर चुकी थी. इसलिए उन्होंने बंगाल से बाहर पैर पसारने में हड़बड़ी नहीं दिखायी. लेकिन कांग्रेस से दिल्ली की सत्ता छीनकर बावले- मतवाले हुए केजरीवाल पहले ही झटके में भाजपा के सेनापति से भिड़ने वाराणसी पहुंच गये. नारा लगा पहले शीला हारी है अब मोदी की बारी है. शीला दीक्षित तीन टर्म दिल्ली की मुख्यमंत्री थी, लेकिन पूरी कांग्रेस पार्टी और शीला दीक्षित को भ्रष्ट साबित कर केजरीवाल ने अपनी फितरती राजनीति का लोहा मनवा दिया. लेकिन वह भूल गये कि जिस अन्ना आंदोलन की आंच पर वह अपनी सियासत की रोटियां सेंक रहे थे, उस आंदोलन को ईंधन देने से लेकर उसे प्रभावकारी बनाने के पीछे संघ का भी हाथ था. अन्यथा वहां रामदेव और रविशंकर क्यों जाते. 

 

खैर, वाराणसी से केजरीवाल लहूलुहान होकर लौटे और दिल्ली की सभी सीटों पर खेत रहे. उसके बाद केजरीवाल मोदी के खिलाफ पर्सनल हो गये. कांग्रेस से पंजाब छीनने और गुजरात में कुछ फीसदी वोट बटोरकर अपने दल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाने के बाद तो वह "प्यादा से फर्जी भयो टेढ़ो-टेढ़ो जाय" की कहावत चरितार्थ करने लगे. लेकिन इसी बीच उनकी सीरत-सूरत दोनों बदल गयी. उनके कारनामों की फाइलें खुलने लगीं. राजनीति के हर देवस्थान पर वह पेशाब कर चुके थे. कहीं से आशिष नहीं मिल रही थी. वह अपने कई संगी-साथियों के साथ जेल चले गये. इससे पहले वह मोदी विरोधी मोर्चा यानी विपक्षी गंठबंधन के साथ हो लिये. जिन्हें पानी पी पीकर गरियाते थे, उनकी प्रशंसा करने लगे. कांग्रेस बड़े दुश्मन को हराने के लिए छोटे दुश्मन को साथ लेकर चल रही थी. लेकिन उसे केजरीवाल के दिए घावों की टीस हमेशा सालती रहती थी. जैसे ही दिल्ली विधानसभा का चुनाव आया, कांग्रेस ने अकेले लड़ने की घोषणा कर दी. 

 

उधर चुनाव के कारण सुप्रीम कोर्ट से जमानत पर छूटे केजरीवाल सन्निपात के रोगी की तरह बड़बड़ाने लगे "मोदी इस जन्म में दिल्ली में मुझे नहीं हरा सकते." वह भूल गये थे कि उनकी ईमानदारी, सादगी और फरेब की कलई उतर चुकी है. शीश महल में रहने वाले बिना तौलिया लपेटे कपड़े बदलेंगे तो लोग थूकेंगे या हंसेंगे ही. वह न देख पाये, न समझ पाये कि उन्हें हराने के लिए गोटियां बैठायी जा चुकी है. वह खुद तो हारे ही उनके कई चहेते हार गये. अब वह जजों से लड़ रहे हैं. मुकदमों का गठ्ठर सिर पर लदा है. पंजाब सहारा दिये हुए है. वहां भी मंत्री जेल यात्री बन रहे हैं. राज्य सभा के सात सदस्य भाजपा में चले गये हैं. ये सभी मिलकर उन्हें पंजाब में हरायेंगे. अगले साल चुनाव है. उन्हें हराने की व्यवस्था में कांग्रेस भी लगी है और भाजपा ने भी जाल बिछाना शुरु कर दिया है. पंजाब हारने के बाद केजरी एंड कंपनी सड़क पर आ जाएगी. 

 

राजनीति में छूछा को कोई नहीं पूछता है. ममता बनर्जी की हालत देख लीजिए. चुनाव हारने के पंद्रह बीस दिनों में ही उनकी बुलायी बैठकों में न सभी सांसद जा रहे हैं न सभी विधायक. उनकी गुंडा वाहिनी सकते में है. भ्रष्टाचारियों के हाथ पांव फूल गये हैं. अवैध संपत्तियों की जांच हो रही है. कब्जाये गये दफ्तर तोड़े जा रहे हैं. आरोप-प्रत्यारोप चरम पर पहुंच गया है. उनका घमंड खंड-खंड हो गया है. जांच की आंच उनके परिजनों तक पहुंच गयी है. उनके दफ्तरों पर छापे में आधार कार्ड और वोटर आईडी मिल रहे हैं. जो गृहमंत्री को गालियां दे रहे थे, उनके घर के सामने जमा भीड़ स्वाहा का जाप कर रही है. ममता को खुद चोर-चोर के नारे सुनने पड़ रहे हैं. 

 

लोकतंत्र में चुनाव होते रहते हैं. पार्टियां और नेता हारते-जीतते रहते हैं. लेकिन किसी नेता और पार्टी की पराजय के बाद जैसी जन प्रतिक्रिया बंगाल से आ रही है, वैसी आज तक दिखाई-सुनाई नहीं दी. पार्टी खुद ममता ने बनायी थी. अपने संघर्ष औऱ सादगी (सूती साड़ी और हवाई चप्पल) से उसे आगे बढ़ाया था. उन्होंने वामपंथियों के खूनी पंजे से जीत छीनी थी. लेकिन दूसरे चुनाव 2016 से वह उन्हीं की राह पर चल पड़ीं. यानी उन्हें भी गुंडई-नंगई से जीत की लत पड़ गयी. 2021 में तो उन्होंने अत्याचार की हद पार कर दी. न महिलाओं, बेटियों की इज्जत महफूज रही, न गरीबों की जमीन और आशियाने. धन उगाही के नये-नये हथकंडे अपनाये गये. अदालतों से लताड़ पड़ती रही, लेकिन वह जांच एजेंसियों से लड़ती रही. भय का माहौल कायम किया. 

 

उनके सात खून शायद इसलिए माफ थे कि वह भाजपा के सामने डटी थीं और उसे हरा दिया था. वह राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होना चाहती थीं. इसके लिए उन्होंने कुछ राज्यों में हाथ-पैर भी मारे, लेकिन क्षेत्रीय दलों की समस्या यह है कि वे अपनी सरहदों के आगे चुनावों में हाजिरी तो लगा सकते हैं, कुछ कर-करा नहीं सकते. फिर भी ममता विपक्षी दलों के नेता के रुप में खुद को स्थापित करने के लिए खुटचाल में लगी रहीं. उन्होंने इस तथ्य की भी अनदेखी की कि भाजपा से लड़ने के लिए कांग्रेस का नेतृत्व आवश्यक है. उनकी जिद के कारण ही राहुल गांधी विपक्षी गंठबंधन के नेता घोषित नहीं हो सके. ममता ने अपना ऐसा आभा मंडल तैयार किया था कि गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों के नेता बंगाल में कांग्रेस के बदले टीएमसी के प्रचार के लिए ही गये. 

 

खैर, अब ममता फुंफकारें या भभकें, वह इतिहास होने जा रही हैं. जिस तरह सुवेंदु सरकार फैसले ले रही है और अधिकारी, नेता, भ्रष्टाचारी, अपराधी जेल भेजे जा रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि तृणमूल के फूल और तिनके काल के थपेड़ों से बिखर जायेंगे. यह पार्टी किसी विचारधारा पर आधारित तो है नहीं. ममता के सिवा कोई नेता भी नहीं हैं. मां-माटी-मानुस वाला नारा ढ़कोसला साबित हो चुका है. कोई संगठन है नहीं. यह भी एक जुगाड़ू पार्टी है निखालिस एकेश्वरवादी. बिल्कुल केजरीवाल की पार्टी की तरह. इन दोनों पार्टियों और नेताओं का पुण्य छीज गया है. ये अपनी जमा पूंजी अपनी गलतियों से लुटा चुके हैं. इनके क्रेडिट कार्ड लैप्स हो गये हैं. अब उनके जरिये कोई सियासी लेन-देन या व्यापार संभव नहीं है. इनकी यह स्थिति ठीक तो नहीं लग रही है लेकिन इस स्थिति के लिए ये स्वयं जिम्मेदार हैं. आखिर माझी जब नाव डुबोये तो उसे कौन बचाये?

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