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भाजपा प्रभारी गजेंद्र पटेल के सामने आदिवासी वोट, क्षेत्रीय असंतुलन, 5 पूर्व सीएम को साधना बड़ी चुनौती

पटेल के लिए झारखंड में अनेक चुनौतियां है क्योंकि भाजपा यहां विपक्ष में है. लगातार दो बार 2019 और 2024 से. 2024 के विधानसभा चुनाव में जेएमएम गठबंधन को 56 सीटें मिलीं, जिसमें जेएमएम को 34, कांग्रेस 16, आरजेडी 4 और सीपीआई(एमएल) 2 सीटें शामिल हैं, लेकिन भाजपा महज 21 और एनडीए कुल 24 पर सिमट गया. वोट प्रतिशत में भाजपा करीब 33 प्रतिशत के साथ सबसे आगे रही, लेकिन सीटें कम आईं. यह अंतर बताता है कि वोट तो हैं, पर उन्हें जीत में बदलने वाला संगठन और गठबंधन समीकरण कमजोर पड़ा.
 
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Avinash

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने मध्य प्रदेश के खरगोन से सांसद और राष्ट्रीय महामंत्री गजेंद्र पटेल को झारखंड के नए प्रभारी के रूप में नियुक्त किया है, उनके साथ सौरभ सिंह और निवेदिता सिंह को सह-प्रभारी बनाया गया हैं.

 

गजेंद्र सिंह पटेल का जन्म 16 फरवरी 1975 को मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में हुआ था,  उनके पिता उमराव सिंह पटेल और माता सुशीला बाई पटेल हैं. उन्होंने बीए और एलएलबी की पढ़ाई की है. पेशे से कृषि से जुड़े गजेंद्र पटेल लंबे समय से सक्रिय राजनीति में हैं और आदिवासी पृष्ठभूमि से आते है.

 

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भाजपा के झारखंड प्रभारी गजेंद्र सिंह पटेल की फाइल फोटो.

 

भाजपा में राज्य प्रभारी, केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश इकाई के बीच पुल होता है, जो प्रभारी होते हैं वो प्रदेश अध्यक्ष, महामंत्री और जिला इकाइयों की बैठकें लेता है, बूथ कमेटियों की रिपोर्ट मांगता है और देखता है कि राज्य में चल रही पार्टी का कोई भी अभियान सिर्फ कागज पर तो नहीं रह गया. वह केंद्र के निर्देश जैसे संगठन विस्तार, मुद्दा आधारित आंदोलन या पार्टी प्रचार करने का तरीका राज्य तक पहुंचाता है और वहां की जमीनी सच्चाई वापस दिल्ली ले जाता है.

 

टिकट वितरण के समय स्थानीय गुटों का दबाव कम करने और सामाजिक समीकरण संतुलित रखने में भी प्रभारी की भूमिका अहम रहती है. पुराने दौर में अनुभवी नेता इस पद पर रहते थे, ताकि राज्य इकाई को रणनीति और अनुशासन दोनों मिल सकें और आज भी मूल काम वही है जैसे कि संगठन की कमजोरी पकड़ना, विपक्ष के खिलाफ मुद्दा और चुनाव के लिए नए नए समीकरण बनाना.

 

पटेल के लिए झारखंड में अनेक चुनौतियां है क्योंकि भाजपा यहां विपक्ष में है. लगातार दो बार 2019 और 2024 से. 2024 के विधानसभा चुनाव में जेएमएम गठबंधन को 56 सीटें मिलीं, जिसमें जेएमएम को 34, कांग्रेस 16, आरजेडी 4 और सीपीआई(एमएल) 2 सीटें शामिल हैं, लेकिन भाजपा महज 21 और एनडीए कुल 24 पर सिमट गया. वोट प्रतिशत में भाजपा करीब 33 प्रतिशत के साथ सबसे आगे रही, लेकिन सीटें कम आईं. यह अंतर बताता है कि वोट तो हैं, पर उन्हें जीत में बदलने वाला संगठन और गठबंधन समीकरण कमजोर पड़ा.

 

सबसे बड़ी चुनौती राज्य के आदिवासी सीटों को लेकर है क्योंकि लोकसभा में भी भाजपा 8 सीट और गठबंधन मिला के 9 सीट ही जीत सका था. सारे 5 आदिवासी सीट हार गए थे और विधानसभा में भी 28 में से 27 आदिवासी सीट भाजपा हार गई थी. सिर्फ एक सरायकेला जीत सका, जहां से चंपई सोरेन चुनाव लड़े थे और वो चुनाव से कुछ महीने पहले ही भाजपा में आए थे.  

 

जल-जंगल-जमीन और सरना पहचान का भावुक जुड़ाव अभी भी जेएमएम के पक्ष में जाता है तो नए प्रभारी को आदिवासी इलाकों में बूथ स्तर पर अलग रणनीति बनानी होगी. साथ ही केवल नारों और सोशल मीडिया पर पार्टी को मजबूत नहीं बनना पड़ेगा. स्थानीय मुद्दे और स्थानीय चेहरों को पार्टी के साथ जोड़ कर जमीन पर कार्य भी करना होगा.

 

वर्तमान में  संगठन की आंतरिक स्थिति भी बहुत नाजुक है. प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी दोनों महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अलग-अलग भूमिका में. साथ ही झारखंड भाजपा में 5 पूर्व मुख्यमंत्री है और उन्हें एक साथ लाना भी बड़ा जिम्मेदारी भरा कार्य होगा. 

 

पहले भी झारखंड भाजपा में अलग-अलग गुट और क्षेत्रीय असंतुलन हैं, इसलिए प्रभारी को इनके बीच तालमेल बनाना होगा, नहीं तो पार्टी जमीनी स्तर पर कभी भी मजबूत नहीं हो पाएगी और इसका असर पार्टी के ग्राफ पर दिखेगा. जिला अध्यक्षों की नई सूची और सभी मोर्चा में नियुक्तियां हो चुकी हैं, अब उन्हें सक्रिय करना प्रभारी का काम है.

 

परीक्षा घोटाले का आंदोलन भी एक बड़ी चुनौती है. क्योंकि जेपीएससी और जेएसएससी में पेपर लीक व अनियमितता के आरोप पर छात्र महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं, भाजपा ने सीबीआई जांच और छात्रों पर दर्ज मुकदमों की वापसी की मांग की, जिलों में घेराव भी किया, लेकिन इसका कोई खास असर सरकार पर नहीं दिखा नहीं. फायदा भाजपा के पक्ष में भी कुछ ख़ास नहीं मिलता दिख रहा है.

 

भाजपा इस मुद्दे पर बहुत हमलावर होके सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर दे ऐसा कुछ नहीं हुआ और सरकार इसे युवाओं का “राजनीतिक इस्तेमाल” कहकर कटती रही, तो प्रभारी को ये भी देखना होगा कि इस मुद्दे को पार्टी के पक्ष में कैसे भुनाया जा सके. ताकि आंदोलन में छात्रों का हक भी रहे साथ ही साथ पार्टी का बैनर भी पीछे-पीछे रहे.

 

यहां झारखंड सरकार के गठबंधन में जो महीन दरार बनता हुआ दिख रहा है, उसका इस्तेमाल कैसे करना है अपने पक्ष में इसके लिए भी समीकरण बनाना प्रभारी के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहेगा. 

 

राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के बाद कांग्रेस और सहयोगियों में आरोप-प्रत्यारोप चले. भाजपा इसे “लूट और भ्रष्टाचार का साझा कार्यक्रम” कहती रही, लेकिन विपक्ष में रहते हुए केवल आरोप काफी नहीं होते, जमीनी स्तर पर उसका प्रभाव पड़े इस पर भी कार्य करना होता है. बेरोजगारी, माइनिंग माफिया, कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लगातार जमीन पर काम दिखाना होगा, ताकि जनता को पार्टी पर भरोसा बढ़े और 2029 के मिशन ने पार्टी सफलता पूर्वक आगे बढ़ सके.

 

गजेंद्र पटेल मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र से आते हैं, इसलिए झारखंड के आदिवासी इलाकों के कुछ सांस्कृतिक समझ उनके पक्ष में जा सकती है. फिर भी झारखंड की बनावट अलग है, यहां पांच प्रमंडल है और सबके अपने अपने भाषा और सांस्कृतिक विरासत है. यहां प्रभारी और सह-प्रभारियों के साथ नियमित दौरा, बूथ रिपोर्ट और स्थानीय नेताओं से सीधा संवाद ही सफलता की कुंजी बनेगा. अगर संगठन बूथ तक एकजुट हुआ और आदिवासी सीटों पर वास्तविक पैठ बढ़ी, तभी वोट प्रतिशत सीटों में बदलेगा वरना प्रभारी पद मात्र कागजी जिम्मेदारी बनकर रह जाएगा.

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