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आदिवासी बचाओ महारैली में 32 संगठन आए एक मंच पर

Ranchi: रविवार को आदिवासी बचाओ महारैली में कई संगठनों ने ताकत दिखायी. आदिवासी संगठन अपने हक, अधिकार, सीएनटी, एसपीटी, पेशा कानून और सरना कोड लागू कराने को लेकर बड़ी संख्या में मोरहाबादी मैदान में जुटे. महारैली में शामिल हुए हजारों लोगों को संबोधित करते हुए पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव ने कहा कि पांचवी अनुसूची का दर्जा प्राप्त करने के साथ-साथ आदिवासी मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति आदिवासी के बावजूद यह दुर्भाग्य है कि आदिवासियों के हित में जितने भी कानून और प्रारूप बने वह हमारे हित में नहीं बने. क्योंकि 18 साल आदिवासी मुख्यमंत्री रहने के बावजूद यह दुर्दशा आज हमें झेलनी पड़ रही है. भाजपा भी नहीं चाहती कि आदिवासियों का हित हो. अगर बात हेमंत सरकार की करें तो वह भी आदिवासियों के हित में काम नहीं कर रही. देखें वीडियो https://youtu.be/zjkPqaSHnds

आदिवासी नेता प्रेम साही मुंडा ने कहा कि आज इस रैली से हम एक उलगुलान कर रहे हैं. बिना संघर्ष के हमें आज तक कुछ नहीं मिला है. सीएनटी, एसपीटी एक्ट का आंदोलन हो चाहे पेसा कानून या सरना कोड लागू कराने का आंदोलन, हमलोग आंदोलन करते आ रहे हैं, और जब तक हमें हक और अधिकार नहीं मिलता तबतक आंदोलन करते रहेंगे. इसे पढ़ें- विपक्षी">https://lagatar.in/opposition-leaders-wrote-a-letter-to-pm-modi-bjp-said-aam-aadmi-party-is-playing-victim-card/">विपक्षी

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कुर्मी को आदिवासी बनाने का जो एक षड्यंत्र रचा जा रहा है, हम उसका विरोध कर रहे हैं. हम आदिवासी समाज के लोग मजदूर वर्ग का काम करते हैं. जल, जंगल जमीन की सुरक्षा करते हैं, लेकिन कुछ नेता और दलाल मुख्यमंत्री के साथ जो माफिया तत्वों से घिरे लोग हैं उनके इशारों पर काम कर रहे हैं. पूर्व मंत्री देव कुमार धान ने कहा कि 32 सामाजिक संगठन के नेताओं को आज यहां बुलाया गया है, और इस कार्यक्रम के माध्यम से हम एक बिगुल फूंक रहे हैं. चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार या कोई पार्टी हो, जेएमएम, कांग्रेस या बीजेपी जो भी हमारे खिलाफ कानून लाएगा, उसको जवाब देने का काम करेंगे. यहां इतने सारे आदिवासी मुख्यमंत्री रहे, शिबू सोरेन से लेकर अर्जुन मुंडा, बाबूलाल मरांडी, मधु कोड़ा या हेमंत सोरेन किसी सरकार में आदिवासी हितों के लिए काम नहीं किया. मुख्यमंत्री आज 1932 खतियान यात्रा निकालते हैं जो कि एक गुमराह करने वाला विषय है. खुद ही विधानसभा में विरोध करते हैं और खुद ही कानून भी लाते हैं. अभी तक स्थानीय नीति और नियोजन नीति नहीं बना पाई सरकार जबकि 3.5 साल पूरे होने को है. जिस भावना और उद्देश्य से झारखंड राज्य का गठन हुआ कितने लोगों ने कुर्बानी दी. लेकिन वह पूरा नहीं हो पाया. झारखंड बनने के बाद आदिवासियों की जमीन की लूट चारों तरफ हो रही है. यहां तक कि धार्मिक जमीन को भी हम नहीं बचा रहे हैं, आज आदिवासी समाज दुखी है. इसे भी पढ़ें- चाईबासा">https://lagatar.in/chaibasa-holi-market-decorated-with-colorful-pichkari-and-holi-items-waiting-for-buyers/">चाईबासा

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वहीं आदिवासी नेता लक्ष्मीनारायण मुंडा ने कहा कि 1952 के बाद हर चुनाव में प्रधानमंत्री छोड़कर सभी पद पर आदिवासी बैठ चुके हैं, लेकिन फिर भी हमें अपने हक, अधिकार के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है. आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव को देखते हुए हम आदिवासियों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी बढ़े, ज्यादा से ज्यादा आदिवासी समाज के लोग जुड़ें. इस रैली के माध्यम से हम यह मांग करते हैं, चाहे पेसा एक्ट हो या रोजगार सभी में यह वर्ग पीछे हैं. इस आदिवासी बचाओ महारैली के कार्यक्रम के माध्यम से हम समाज को जगाने का काम करेंगे. हमारा सब कुछ छिना जा रहा है. जिसे बचाने के लिए इस रैली से उलगुलान कर रहे हैं. संकल्प ले रहे हैं, झारखंड, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों में आदिवासियों से जाकर संवाद पैदा करेंगे. [wpse_comments_template]  

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