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मौसम वैज्ञानिक अल नीनो-आईओडी के खतरनाक कॉम्बिनेशन को लेकर चिंतित, जल संकट, सूखा पड़ने का खतरा

भारत की खेती मानसून पर सर्वाधिक निर्भर मानी जाती है. देश की लगभग 70 फीसदी बारिश दक्षिण-पश्चिम मानसून परनिर्भर है. ऐसे में अगर अल नीनो और आईओडी के कॉम्बिनेशन की वजह से मानसून कमजोर पड़ता है, तो कई राज्यों में बारिश सामान्य से काफी कम होगी.
 

 New Delhi : गर्मी आने वाले समय में खतरनाक रूप ले सकती है. लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की चिंता इससे अलग है.  उनकी चिंता बढ़ते तापमान से इतर अल नीनो और आईओडी (इंडियन ओशन डायपोल) के एक खतरनाक कॉम्बिनेशन को लेकर है. यह भारत के मानसून पर बड़ा हमला कर सकता है.  

 

मौसम वैज्ञानिकों  ने इशारा किया है कि अगर इस साल मानसून कमजोर पड़ा, तो देश के कई हिस्सों में सूखा, लू, पानी की कमी और खेती का संकट दस्तक देने लगेगा. पानी की कमी से धान, दाल, सब्जियां गन्ना आदि फसलों का उत्पादन घट जायेगा.जलाशयों का स्तर गिरने से पानी-बिजली का संकट भी गहराने की संभावना है. 

 

विशेषज्ञों के अनुसार अगर अल नीनो के साथ नेगेटिव आईओडी सक्रिय हुआ, तो हालात इस साल और गंभीर हो सकते हैं. मौसम  की दोहरी मार तापमान तो बढ़ायेगी ही, महंगाई और आर्थिक दबाव भी लोगों की जिंदगी में असर डालेंगे.

 

जब प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है, तो अल नीनो बनता है. इस कारण मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और देश में बारिश कम होने  की संभावना बलवती हो जाती है. इससे अलग हिंद महासागर में बनने वाला इंडियन ओशन डायपोल (आईओडी) कई बार राहत भी देता है.

 

पॉजिटिव आईओडी बारिश बढ़ाने में मददगार होता  है,  लेकिन नेगेटिव आईओडी सक्रिय हो जाये, तो हालात और बिगड़ सकते हैं. भीषण गर्मी, लंबी लू और सूखे का खतरा तेजी से बढ़ जाता 

 

भारत की खेती मानसून पर सर्वाधिक निर्भर मानी जाती है. देश की लगभग70 फीसदी बारिश दक्षिण-पश्चिम मानसून परनिर्भर है. ऐसे में अगर अल नीनो और आईओडी के कॉम्बिनेशन की वजह से मानसून कमजोर पड़ता है, तो कई राज्यों में बारिश सामान्य से काफी कम होगी.

 

कम बारिश का सर्वाधिक असर खरीफ फसलों पर पड़ेगा. अगर बारिश समय पर नहीं हुई या कम हुई, तो धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और दाल जैसी फसलों की बुवाई प्रभावित हो जाती है.  

 

धान की पैदावार 30 से 40 फीसदी तक गिर सकती है.  मौसम विशेषज्ञों के अनुसार कमजोर मानसून का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा. इसका असर गांवों की अर्थव्यवस्था, पेयजल,  बिजली सप्लाई पर भी पड़ेगा.    

 


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