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बड़ी बीमारी की छोटी सर्जरी

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बैजनाथ मिश्र

सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिये हैं. समस्या के लिहाज से यह बढ़ोत्तरी मामूली है. लेकिन बीमारी गंभीर है. यह इतनी छोटी सर्जरी से ठीक नहीं होगी. सरकार बड़ी सर्जरी कर नहीं सकती, क्योंकि अगले साल कई राज्यों में चुनाव है. चुनाव जीतना सभी चाहते हैं. यह जीत तभी मिलेगी जब जनता खुश हो. जनता तभी तक खुश रहेगी, जब तक उसकी मुफ्तखोरी चलती रहेगी. सरकार मुफ्त की रेवड़ियां बांटकर ही बनती और चलती हैं. चाहे राज्य सरकारें हों या केंद्र सरकार. नंगे सब हैं, लेकिन चिढ़ाते दूसरों को हैं.

 

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि चुनाव खत्म, वसूली शुरु. उन्होंने कहा तो ठीक ही है, लेकिन वह भला यह क्यों बतायें कि रेवड़ियों के बोझ तले दबे हिमाचल की सरकार पहले ही पेट्रोल पांच रुपये लीटर महंगा कर चुकी है. यह हमारा लोकतंत्र है. हम जैसे हैं, वैसा ही हमारा लोकतंत्र है और वैसी ही सरकारें हैं. विपक्ष यह तो कह नहीं सकता कि जितनी बड़ी बीमारी है उसके निदान के लिए पेट्रोल-डीजल कम से कम दस रुपये प्रति लीटर महंगा होना चाहिए.

 

ऐसा नहीं है कि विपक्ष हकीकत से बाकिफ नहीं है, लेकिन जिसकी जिम्मेदारी है वह जाने. ऐसे ही संकट के समय तो सरकारों की परीक्षा होती है. जब सरकारी पार्टी राजनीति में लगी है तो विपक्ष हमला क्यों न करे. जब 1962 में चीन युद्ध के समय नेहरू जी जनता से सोना मांग रहे थे और जनता दे भी रही थी, तब विपक्ष ने विरोध नहीं किया था. विपक्ष को भी पता था कि हालात बेहद गंभीर है. 1971 में बंग्लादेश युद्ध के समय इंदिरा जी ने भी भारीभरकम अतिरिक्त टैक्स लगाया था, तब जनता कसमसा गयी थी, लेकिन तब विपक्ष ने सरकार का साथ दिया था. तब अटल बिहारी वाजपेयी इंदिरा गांधी का स्तुति गान कर रहे थे. लेकिन वह साल दूसरा था, यह साल दूसरा है.

 

हमारे देश में ऐसे नेताओं का टोटा पड़ गया है जो परिस्थितियों के अनुसार बयान दें या आचरण करें. तब राष्ट्र प्रथम था अब राजनीति प्रथम है. वर्तमान संकट वैश्विक है. दुनिया के सभी देश तबाह हैं. हलकान हैं. इसमें न उनका दोष है न भारत का. यह संकट पैदा हुआ है अमेरिका-ईरान के कारण. सभी देशों में उर्जा संकट पैदा हो गया है. हमारा संकट बड़ा है क्योंकि हमारी आबादी बड़ी है. हमारा खर्च ज्यादा है. हम अपनी जरूरत का करीब 87 फीसदी तेल आयात करते हैं.

 

पश्चिम एशिया में तनाव के कारण परंपरागत समुद्री मार्ग अवरूद्ध हो गया है. जहां से तेल खरीद की नयी व्यवस्था की गयी है, उनका परिवहन भाड़ा महंगा है. हालांकि भारत ने ऊर्जा आयात के स्रोतों को चालीस देशों तक विस्तारित कर दिया है. फिर भी परिवहन लागत और मूल्य वृद्धि के कारण खजाना खाली हो रहा है. यानी दिन प्रतिदिन विदेशी मुद्रा भंडार क्षीण होता जा रहा है. नये व्यापारिक गलियारों के निर्माण के जरिये स्थिति सुधारने की कोशिश भी हो रही है लेकिन इसमें समय लगेगा. इसलिए प्रधानमंत्री ने संकट के बीच मितव्ययिता की अपील की है. उन्होंने अनावश्यक ईंधन खपत कम करने, सोने की गैर जरूरी खरीद टालने, देश में ही पर्यटन और डेस्टिनेशन शादियों को बढ़ावा देने औऱ जहां तक संभव हो वर्क फ्रॉम होम अपनाने का आग्रह किया है.

 

इस आग्रह के पीछे मकसद यह है कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए केवल सरकारों और संस्थानों के प्रयास नाकाफी हैं. यह संभव तब हो सकता है जब नागरिक भी इस कोशिश में सहयोगी, सहभागी बनें. तेल के बाद सोना सबसे बड़ी आयातित वस्तु है. पिछले वित्तीय वर्ष में इसका आयात करीब 72 अरब डॉलर पहुंच गया था. बहरहाल वर्तमान संकट पर गहनता से विचार करें तो पायेंगे कि देश के चालू खाते का घाटा बढ़ता गया तो वैश्विक अर्थव्यवस्था का दबाव हमारे देश के किचेन तक पहुंच सकता है. इस घाटे का सीधा असर हमारी मुद्रा यानी रूपये पर पड़ता है. इसलिए सरकार और नागरिक दोनों को किफायतसारी के साथ रहने-जीने की आदत डालनी होगी ताकि विदेशी मुद्रा पर दबाब कम पड़े और हमारा गुणवत्तापूर्ण जीवन भी कुप्रभावित न हो.

 

यह एक तथ्य है कि युद्ध कहीं भी हो उसकी कीमत आम उपभोक्ताओं को ही वहन करनी पड़ती है. हमने युद्ध शुरु नहीं किया था और ना ही हम किसी के पक्ष या विपक्ष में हैं, लेकिन इसकी कीमत तो विश्व के अन्य उपभोक्ताओं की तरह हमें भी चुकानी ही पड़ेगी. यह कीमत जितनी कम होगी, हमारी आगे की राह उतनी ही आसान होगी. इसलिए हमें अपनी फिजूलखर्ची पर तत्काल ब्रेक लगाना होगा. दुनिया भर में सरकारें पहले ही ऊर्जा अनुशासन लागू कर चुकी हैं. बांग्लादेश में ईंधन की राशनिंग चल रही है. श्रीलंका में चार दिन वर्क फ्रॉम होम चल रहा है. फिलीपींस में ऊर्जा आपातकाल लग गया है. दक्षिण कोरिया ने ईंधन की मूल्य सीमा लागू कर दी है. जापान को रणनीतिक भंडार खोलना पड़ा है. यूरोपीय देश भी ऊर्जा बचाने की चेतावनी दे रहे हैं. विश्व के कई बाजारों में पेट्रोल 200 रूपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है.

 

हम अभी भी इस संकट से भयभीत तो हैं, लेकिन सचेत नहीं हैं. हमें यह बात ठीक से समझ लेनी चाहिए कि सस्ती एनर्जी का समय शीघ्र लौटनेवाला नहीं है. हालात यही रहे तो तीन-चार रूपये लीटर की वृद्धि से काम नहीं चलेगा. सर्जरी बड़ी करनी पड़ेगी. यह नौबत न आये इसके लिए हमें अभी से प्रयास शुरु कर देना चाहिए. अभी तक दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला हमारा देश संकट की भयावहता के असर से झुलसा नहीं है तो इसलिए कि सरकार यथासंभव उपायों में लगी है. लेकिन ये उपाय कभी भी कम पड़ सकते हैं.

 

दुनिया भर की सरकारें असमंजस में हैं कि इस संकट को उपभोक्ताओं पर लाद दिया जाय, महंगाई भड़का दी जाय या उसे जहां तक हो सके स्वयं वहन किया जाय. भारत सरकार ने हस्तक्षेप का मार्ग अख्तियार किया है. वह उपभोक्ताओं को महंगाई की आग में झोंकने से बच रही है. इसके लिए जरूरी इंतजाम कर रही है और नागरिकों से सहयोग की अपेक्षा कर रही है तो हमें भी हालात की नजाकत समझते हुए तदनुसार व्यवहार करना चाहिए.

 

सच यह है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बढ़ने से खाद्य पदार्थ महंगे होंगे, विनिर्माण महंगे होंगे, हवाई यात्रा महंगी होगी और अंततः महंगाई हमें झकझोरेगी. यह कम से कम झकझोरे, इसके लिए हमें अपने गैर जरूरी खर्चे कम करने होंगे. युद्ध काल समाप्त होने के बाद भी कीमतें तत्काल सामान्य नहीं होंगी. इसमें हफ्तों-महीने लग सकते हैं. यानी हमें भी एक लंबी लड़ाई के लिए खुद को तैयार करना होगा. रिजर्व बैंक के गवर्नर पहले ही कह चुके थे कि तेल की कीमतें बढ़ाने के अतिरिक्त अब कोई उपाय नहीं है.

 

कई अर्थशास्त्री सुझा रहे थे कि एक ही बार में बड़ी सर्जरी की जानी चाहिए और बीमारी को बढ़ने से रोक देना चाहिए. लेकिन ऐसा होता तो देश में हाहाकार मच गया होता. हालांकि तेल के दाम फिर नहीं बढ़ेंगे, इसकी गारंटी देना मुश्किल है, हम बीमारी बढ़ाने के बदले उसे कम करने में लग जायें तो शायद बड़े ऑपरेशन की जरूरत ही न पड़े. सरकार राजनीतिक कारणों या जरूरत के दबाव में बड़ा ऑपरेशन नहीं करना चाहेगी लेकिन यदि हालात बिगड़ते चले गये तो वह दबाव भी सरकार को आगे बढ़ने से शायद ही रोक पाये. 

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