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मोमिन कॉन्फ्रेंस, मोमिन तंजीम और तहरीक भारत की आजादी के दर्शन की यादगार है

Rehan Ahmed Ranchi: जंगे आज़ादी में मोमिनों का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है. मोमिन बिरादरी भारतीय सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है. अंग्रेजों ने सबसे पहले भारतीय आर्थिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने की शुरुआत की, और उनकी पहली चोट मोमिनों को ही लगी. उन्होंने हथकरघा उद्योग को तबाह कर दिया, जिससे बुनकरों, जो विश्वभर में अपने उत्कृष्ट मलमल के लिए प्रसिद्ध थे, को भारी नुकसान हुआ. 1857 की स्वतंत्रता संग्राम में पूरे देश के मोमिनों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, और झारखंड में मोमिनों की अगुवाई में शेख भिखारी, अमानत अली, सलामत अली, शेख हारू आदि ने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया. 1911 में पहली बार मोमिनों को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट करने की कोशिश की गई, जिसमें मौलाना आसिम बिहारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही. इस प्रयास के तहत 1911 में मोमिन नौजवानों ने `जमीयतुल मोमिनीन` नामक संस्था का गठन किया और इस संगठन के माध्यम से जन जागरूकता फैलाते हुए अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष जारी रखा. 1914 से 1917 के बीच रांची में मौलाना आज़ाद से मुलाकात कर मोमिनों ने आज़ादी की मुहिम को पूरी ताकत से आगे बढ़ाया. झारखंड प्रदेश मोमिन कॉन्फ्रेंस के प्रदेश अध्यक्ष आबिद अली ने कहा कि `जमीयतुल मोमिनीन` का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन 10 मार्च 1920 को कोलकाता में हुआ. अप्रैल 1921 में मौलाना आसिम बिहारी ने दिवाली अखबार `अल मोमिनीन` की परंपरा शुरू की, जो बाद में एक पत्रिका के रूप में प्रकाशित होने लगी. 10 दिसंबर 1921 को कोलकाता के तांतीबाग में आयोजित अधिवेशन में महात्मा गांधी भी उपस्थित थे. जब अंग्रेज़ी हुकूमत ने मौलाना अबुल कलाम आजाद को चार वर्षों (1914-1917) के लिए रांची में नजरबंद किया, तो जमीयतुल मोमिनीन के सदस्य हाजी इमाम अली, शेख अली जान, इशहाक अंसारी, इस्माइल सरदार आदि लगातार उनसे मिलते रहे और उनकी प्रेरणा से आज़ादी की मुहिम को और भी जोश से चलाया. राष्ट्रीय स्तर पर मोमिनों की पहली कॉन्फ्रेंस 1 मार्च 1925 को कोलकाता के टाउन हॉल में आयोजित की गई और `जमीयतुल मोमिनीन` का नाम बदलकर `ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस` रखा गया. मोमिन कॉन्फ्रेंस ने 8 दिसंबर 1939 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में आनंद भवन, इलाहाबाद में क्रिप्स मिशन से मुलाकात की और यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस केवल हिंदुओं की पार्टी नहीं, बल्कि इस देश के पांच करोड़ मोमिन भी उसके साथ हैं. 1942 में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस में भी मोमिन कॉन्फ्रेंस के संघर्ष को सराहा गया. मोमिन कॉन्फ्रेंस ने हमेशा सामाजिक सुधार और राजनीति में समान महत्व दिया. इसके अलावा, हिंदू-मुस्लिम एकता, अलगाववाद और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में भी मोमिन कॉन्फ्रेंस ने अहम भूमिका निभाई.

आज़ादी के बाद मोमिन कॉन्फ्रेंस का योगदान

आज़ादी के बाद मोमिन कॉन्फ्रेंस ने झारखंड आंदोलन में भी सक्रिय भाग लिया. 1937 में मोमिन कॉन्फ्रेंस के सदस्य आर अली ने मुस्लिम लीग के उम्मीदवार को हराकर बिहार विधानसभा के सदस्य के रूप में जीत हासिल की. 1946 में जब मुस्लिम लीग ने झारखंड क्षेत्र में चुनाव प्रचार किया, तो मोमिन कॉन्फ्रेंस ने अब्दुल कयूम अंसारी के नेतृत्व में चुनाव में सफलता प्राप्त की. स्वतंत्रता संग्राम के बाद भी मोमिन कॉन्फ्रेंस ने झारखंड राज्य के गठन के लिए जोरदार समर्थन दिया.

झारखंड राज्य गठन की मांग

1912 में असमत अली ने अलग झारखंड राज्य की मांग उठाई थी. इसके बाद चिराग अली और कई अन्य मुस्लिम नेताओं ने झारखंड आंदोलन को आगे बढ़ाया. 1980-2000 के दशक में मोमिन कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने झारखंड के गठन की मांग को समर्थन दिया और यह मुद्दा सामाजिक और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बन गया. निष्कर्ष मोमिनों की भूमिका स्वतंत्रता संग्राम और झारखंड राज्य आंदोलन में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है. हालांकि, राज्य सरकार की उपेक्षा और अधिकारियों की अनदेखी के कारण मोमिन समाज आज भी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ा हुआ है. इसे भी पढ़ें - केजरीवाल">https://lagatar.in/order-to-file-fir-against-bjp-candidate-contesting-against-kejriwal-parvesh-verma-accused-of-distributing-shoes-to-women/">केजरीवाल

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