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महालया के दिन पृथ्वी पर आती हैं मां दुर्गा, इस दिन मूर्तिकार मां की आखें करते हैं तैयार

Mayank Murari LagatarDesk :  महालया अर्थात मां का आवाहन. दुर्गा पूजा में महालया की महत्ता बहुत अधिक है. धार्मिक दृष्टि से भी यह दिन महत्वपूर्ण है. महालया के दिन ही पितृ पक्ष का समापन होता है और इसी के साथ दुर्गा पूजा का शुभारंभ होता है. महालया से देवता फिर अपने स्थान पर वास करने लगते हैं. पितृ पक्ष में 15 दिन देवताओं की नहीं पितरों की पूजा अर्चना होती है. महालया से देवी-देवताओं की पूजा शुरू हो जाती है. माता दुर्गा के इस रूप का अवतरण महालया के दिन ही हुआ था. यही वजह है कि महालया की सुबह पितरों का स्मरण कर उन्हें विदाई दी जाती है और शाम में दुर्गा माता का कैलाश से पृथ्वी पर आने के लिए आह्वाहन किया जाता है.

महालया के दिन हर मूर्तिकार मां दुर्गा की आंखें करता है तैयार 

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alt="" width="1200" height="675" /> नवरात्र और पितृ पक्ष का संधिकाल को महालया कहा जाता है. इस दिन माता दुर्गा की वंदना करके उनसे अपने घर आगमन के लिए प्रार्थना की जाती है और पितरों को जल तिल देकर उन्हें नमन किया जाता है. दुर्गा पूजा के पहले महालया का अपना एक खास महत्व है. महालया के दिन ही हर मूर्तिकार मां दुर्गा की आंखें तैयार करता है. इसके बाद से मां दुर्गा की मूर्तियों को अंतिम रूप दिया जाता है.

नवरात्रि में मायके आती हैं देवी दुर्गा

मां दुर्गा नवरात्रि में पृथ्वी पर आने के लिए महालया के दिन ही कैलास पर्वत से सपरिवार विदा होती हैं. इसलिए महालया के दिन माता की अगवानी में इनकी वंदना की जाती है. मान्यता है कि नवरात्र में देवी पार्वती अपनी शक्तियों और नौ रूपों में पृथ्वी पर आती हैं. इनके साथ इनकी सहचर योगनियां और पुत्र गणेश एवं कार्तिकेय भी पृथ्वी पर पधारते हैं. पृथ्वी को देवी पार्वती का मायका कहा जाता है. माता अपने मायके में आती हैं और नवरात्र के नौ दिनों में पृथ्वी पर वास करते हुए मानवजाति में वास करनेवाली आसुरी शक्तियों का भी नाश करती हैं.

देवी दुर्गा पुत्री और माता के रूप में पूजा जाता

देवी दुर्गा को पुत्री और माता दोनों रूपों में पूजा जाता है. दरअसल माता हिमालय की पुत्री हैं और हिमालय पृथ्वी के राजा थे. इसलिए माता को नवरात्र में पुत्री रूप में भी पूजा जाता है. कन्या भोजन भी उनके पुत्री रूप को ध्यान में रख कर करवाया जाता है. लेकिन जगत के पिता महादेव की पत्नी होने के कारण देवी पार्वती जगत माता के रूप में भी पूजी जाती हैं. इसलिए इन्हें माता कहकर भी बुलाया जाता है.

अंतर्निहित आसुरी शक्ति का हो संहार

आसुरी शक्तियों हमारे मन, शरीर और विचार में अंतर्निहित होते हैं, जिनसे मुक्ति के लिए नौ दिन-रात तक साधना, प्रार्थना, ध्यान और तपस्या का कर्म चलता है. शक्ति का स्पंदन ही हमारे जीवन का आधार है. यह स्पंदन सकारात्मक हो, तो जीवन में यश, कीर्ति और सुख की प्राप्ति होती है. शक्ति का नकारात्मक स्पंदन ही हमारे जीवन में आसुरी स्वभाव को उत्पन्न करती है. यह किसी व्यक्ति और नस्लीय भाव नहीं है. जब हम पर अहंकार, क्रोध, लालच, ईष्या और वासना का प्रभाव बढ़ता है, तो यह आसुरी मनोवृत्ति होती है. इससे मुक्ति के लिए ही प्रकृति के संक्रमण काल में नौ दिनों की अवधि बनायी गयी है. साल में चार संक्रमण काल आते हैं, जब व्यक्ति अपने जीवन में आसुरी वृत्ति को बढ़ने से रोकने या जीवन में सृजनात्मक संरचना के लिए तप, ध्यान और साधना का कर्म करता है. यह कर्म ही नवरात्र में देवी की आराधना होती है.

आज भी वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में महालया सुनने से होती है दिन की शुरुआत

वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में रिकॉर्ड किया गया 90 मिनट का रेडियो-ड्रामा, मां दुर्गा की आराधना का सबसे विलक्षण पाठ माना जाता है. बंगाली समुदाय महालया के साथ आज भी सबसे पहले इसे ही याद करते हैं. इसे सुने बिना दुर्गापूजा की शुरुआत संभव नहीं. इंटरनेट के जमाने में भी ऐसे लोग मिल जायेंगे जो इसके लिए कई दिन पहले से रेडियो में बैट्री आदि भरकर ठीक कर लेते हैं. अब टीवी पर भी इसकी प्रस्तुति सभी चैनल करते हैं. मोबाइल के जरिए इससे सुनना और भी सहज और सुविधाजनक है. बंगाली समुदाय के लोगों ने साझा किया महालया को लेकर अपना उत्साह और अपनी परंपरा….

रेडियो पर महालया सुनना और कुल्हड़ वाली चाय (रिंकू बनर्जी)

महालया तक बेटी ( देवी दुर्गा ) के घर आगमन की तैयारी पूरी हो जाती है. याद आते हैं बचपन के वे दिन जब देवघर में हम बच्चों को महालया के दिन मां सुबह चार बजे ही उठा देती थी. मां तो नहा लेती थी, पर हम बच्चे गंगाजल छिड़क की शुद्ध वस्त्र पहनकर कंबल पर बैठ जाते थे. रेडियो पर वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में महालया सुनते थे. महालया सुनने के बाद देवघर के देवसंघ दुर्गा मंदिर जाते थे. यह भी अनोखा अनुभव होता था. मां, चाची, बुआ सब साथ होतीं. हम सभी पैदल मंदिर तक जाते थे. वहां मूर्ति निर्माण अपनी अंतिम अवस्था में होता. माता का दर्शन करते. हम बच्चों को चाय पीना मना था. पर महालया के दिन मंदिर के निकट रामचंद्र जी की दुकान में कुल्हड़ वाली चाय पीने की आजादी हमें भी मिल जाती थी. यह दिव्य सुख था उस दौर का. अब भी आज के दिन सीडी/यू ट्यूब पर महालया सुबह सुबह ही उठ कर सुनती हूं. इसके बाद पंडित जी आते हैं और तर्पन करते हैं. कलश स्थापन की तैयारियां होती हैं. बचपन की बहुत सी चीजें अब छूट गई हैं, पर बेटी के घर आने का उत्साह वही पहले सा है.

अब सुविधानुसार सुनती महालया (मौमिता दत्ता)

धनबाद में बिताया बचपन का दिन याद आता है, जब महालया के दिन परिवार के सभी सदस्य सुबह चार बजे उठकर नहा-धो कर महालया सुनने बैठ जाते. अब भी इसदिन महालया सुनते हैं, पर मोबाइल पर अपनी सुविधा के अनुसार दिन के किसी भी समय फुर्सत में महालया सुन लेते हैं. परिवार का सामूहिक उत्साह अब महालया पर नहीं दिखता. बेटी महालया सुनने को लेकर उतनी उत्साहित नहीं रहती, जितना हम बचपन में रहते. लेकिन दुर्गा पूर्जा और मां के आगमन की खुशी वही पहले जैसी है. [wpse_comments_template]

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