
श्रीनिवास
प्रसिद्ध संगीतकार एआर रहमान के इस कथन पर कि फिल्म इंडस्ट्री में भेदभाव के चलते उनको पहले की तरह काम नहीं मिल रहा, उनको बहुत गाली पड़ रही है. यह स्वाभाविक ही है. जो मानते हैं कि 2014 के पहले देश में कुछ हुआ ही नहीं था, कि देश तेजी से विश्वगुरु बनने की राह पर है, कि नरेंद्र मोदी ‘अवतार’ हैं, कि ‘सबका विकास, सबका साथ’ नारे में कोई झोल नहीं है, कि हर दरगाह और मसजिद के नीचे मंदिर के प्रमाण खोजना इतिहास को दुरुस्त करने के लिए जरूरी है, कि देश के युवाओं (पढ़ें, हिंदू) को अतीत के अत्याचारों का प्रतिशोध लेने के लिए तैयार रहना चाहिए- उनको रहमान की बात चुभेगी ही.
‘भक्त मंडली’ में शामिल हो चुके हिंदी फिल्म जगत के अनेक कलाकार रहमान पर टूट पड़े हैं. नये नाम गीतकार और कवि मनोज मुंतशिर (शुक्ला) और भजन गायक अनूप जलोटा हैं. ये वही मुंतशिर (शुक्ला) हैं, जो मोदी जी की प्रशस्ति में गीत लिख चुके है! ये वही मुंतशिर (शुक्ला) हैं, जिन्होंने ‘सीता-त्याग’ और शंबूक- वध’ को झुठलाने के लिए दावा कर दिया कि रामायण में ‘अयोध्या कांड’ के बाद सब प्रक्षेपित है.
यह अलग बात है कि आज तक रामकथा पर आधारित कोई ऐसी फिल्म नहीं बनी, सीरियल नहीं बना, किसी ‘रामलीला’ का मंचन नहीं हुआ, जिसमें ये प्रसंग नहीं हों! और किसी धर्माचार्य ने आपत्ति भी नहीं की है. ‘गीता प्रेस’ से प्रकाशित ‘रामायण’ में भी ये प्रसंग विद्यमान हैं!
उन्हीं रामकथा मर्मज्ञ मुंतशिर ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कथित सांप्रदायिक भेदभाव पर एआर रहमान के आरोप को खारिज कर दिया है. हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा- यह एक ऐसा देश है, जिसके सबसे बड़े सुपरस्टार सलमान खान, शाहरुख खान और आमिर खान हैं. इसके सबसे मशहूर लेखकों और कवियों में जावेद अख्तर, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी शामिल हैं. यह एक ऐसा देश भी है, जहां क्रिकेट टीम के कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन थे. मुझे नहीं लगता कि हमारी इंडस्ट्री में कोई भेदभाव है.
मगर मुंतशिर भूल गये या इसे स्वीकार करना नहीं चाहते कि ये सारे नाम भारत को मिली ‘असली’ आजादी के पहले ही नामवर हो चुके थे. नये और असली देशभक्तों को इस बात का रोष और मलाल है कि ‘खान त्रिमूर्ति’ अब भी इतने लोकप्रिय और सुपर स्टार क्यों हैं! वे इन पर हमला बोलने, उनकी फिल्मों का बायकाट करने का बहाना खोजते रहते हैं! जाहिर है कि ऐसा असली हिंदुओं या देशभक्तों की मेहरबानी से नहीं है, इसलिए है कि अब तक हिंदुओं का खून उस हद तक नहीं खौला है!
साहिर, मजरूह, मोहम्मद रफी या अजहरुद्दीन के उदाहरणों से आज का सच झूठ नहीं हो जायेगा. किसे नहीं याद है कि हिंदी फिल्मों के श्रेष्ठ भजनों में से एक ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज..’ के गीतकार, संगीतकार और गायक मुसलमान थे.
एक फिल्म में पृथ्वीराज ने ‘अकबर’ की भूमिका की थी. फिल्म ‘गोपी’ में दिलीप कुमार परदे पर ‘सुख के सब साथी, दुख में न कोई, मेरे राम..’ गाते दिखे थे. और किसी धर्मांध- हिंदू या मुसलमान- ने आपत्ति नहीं की थी. आज तो ‘मुगले आजम’ फिल्म देखने की सलाह देने पर एक प्राचार्य को खरी-खोटी सुननी पड़ गयी. हमें भी याद है कि लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ के संवाद राही मासूम रजा ने लिखे थे. तब तक माहौल इतना विषाक्त नहीं हुआ था, तब भी उनको दोनों तरफ के चिरकुटों ने भला-बुरा कहा था. हालांकि ऐसे लोगों की संख्या तब बहुत कम थी; और उनकी तुलना में राही मासूम रजा को प्रशंसा अधिक मिली थी.
वैसे भजन गायक अनूप जलोटा ने रहमान की आलोचना करते हुए भी यह कह कर कि उनको काम नहीं मिल रहा है, तो फिर से हिंदू बन जाएं- एक तरह से रहमान की पीड़ा पर मुहर लगाते हुए मुंतशिर के कुतर्क का पर्दाफाश ही कर दिया है! उल्लेखनीय है कि एआर रहमान 23 वर्ष की में इस्लाम ग्रहण कर लिया था.
प्रसंगवश, फिल्म ‘गोपी’ का ही मोहम्मद रफी का गाया एक और गाना बहुत हिट हुआ था, जो आज चरितार्थ हो रहा है-‘रामचन्द्र कह गये सिया से ऐसा कलियुग आएगा..धर्म भी होगा, कर्म भी होगा, परंतु शर्म नही होगी..’यह आशंका या भविष्यवाणी आज सही साबित सत्य हो रही है. बहुत बासी गीत अलाप रहे हैं मुंतशिर.
Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें

Leave a Comment