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मेरी लता, तुम्हारी लता, उनकी लता, हमारी लता

Hemant तथ्य-तर्क : कोरोना-कौवे की कर्कश आवाज कोकिला का स्वर लील गयी लता मंगेशकर कोरोना से जंग हार कर दुनिया को विदा कह गईं. मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में रविवार सुबह 8 बज कर 12 मिनट पर उन्होंने आखिरी सांस ली. उनका अंतिम संस्कार शिवाजी पार्क स्थित श्मशान में किया गया. 92 साल की लता की कोरोना रिपोर्ट 8 जनवरी को पॉजिटिव आयी थी, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था. हालांकि उनके भर्ती होने की खबर दो दिन बाद 10 जनवरी मीडिया में आयी. उन्होंने कोरोना और निमोनिया दोनों से 29 दिनों तक एकसाथ जंग लड़ी. उन्हें ब्रीच कैंडी अस्पताल के आइसीयू में रखा गया था. लंबे समय से लता का इलाज कर रहे डॉ. प्रतीत समधानी की देखरेख में ही डॉक्टर्स की टीम उनका इलाज कर रही थी. इलाज के दौरान उनकी हेल्थ में सुधार भी देखा जा रहा था. उन्हें लगातार ऑब्जर्वेशन में रखा गया. अस्पताल के सूत्रों के मुताबिक़, करीब 5 दिन पहले उनकी सेहत में सुधार होना शुरू हो गया था. ऑक्सीजन निकाल दी गई थी, लेकिन आइसीयू में ही रखा गया, वहीं रविवार सुबह 8.12 बजे उनका निधन हो गया. डॉ. प्रतीत ने कहा – “मल्टी ऑर्गन फेल्योर उनकी मौत की वजह रही.” नवंबर 2019 में भी लता जी को निमोनिया और सांस की तकलीफ के कारण ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया जा चुका था. जहां वे 28 दिन भर्ती रही थीं. नवंबर 2019 के बाद से उनका घर से निकलना भी लगभग बंद हो चुका था. लता मंगेशकर अपनी बहन उषा मंगेशकर और भाई हृदयनाथ मंगेशकर के साथ मुंबई के पेडर रोड स्थित ‘प्रभु कुंज’ के पहले फ्लोर पर रहती थीं. कई सालों से वे यहां रह रही थीं. बहन आशा भोसले यहां से कुछ दूरी पर ही रहती हैं. सालों तक प्रभा कुंज सोसायटी की सुबह लता मंगेशकर के संगीत के रियाज से ही शुरू होती रहीं. खराब सेहत के कारण करीब 4 साल से उनका रियाज लगभग बंद-सा था. 92 साल की लता ने 36 भाषाओं में 50 हजार गाने गाए. करीब 1000 से ज्यादा फिल्मों में उन्होंने अपनी आवाज दी. सन 2000 के बाद से उन्होंने फिल्मों में गाना कम कर दिया और कुछ चुनिंदा फिल्मों में ही गाने गाए. उनका आखिरी गाना 2015 में सुना गया था. करीब 80 साल से संगीत की दुनिया में सक्रिय लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था. 13 साल की छोटी उम्र में 1942 से उन्होंने गाना शुरू कर दिया था. लता जी के पिता पं. दीनानाथ मंगेशकर संगीत की दुनिया और मराठी रंगमंच के जाने पहचाने नाम थे. उन्होंने ही लता जी को संगीत की शिक्षा दी थी. 5 भाई-बहनों में सबसे बड़ी लता जी, तीन बहनें आशा भोसले, उषा मंगेशकर, मीना मंगेशकर और भाई हृदयनाथ मंगेशकर हैं. लता मंगेशकर को 2001 में संगीत की दुनिया में उनके योगदान के लिए भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था. इससे पहले भी उन्हें कई सम्मान दिए गए, जिसमें पद्म विभूषण, पद्म भूषण और दादा साहेब फाल्के सम्मान भी शामिल हैं. लता गायिका के साथ संगीतकार भी थीं और उनका अपना फिल्म प्रोडक्शन भी था, जिसके बैनर तले बनी फिल्म "लेकिन" थी, इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट गायिका का नेशनल अवॉर्ड भी मिला था, 61 साल की उम्र में. फिल्म "लेकिन" को 5 और नेशनल अवॉर्ड मिले थे. सत्य-तर्क : मेरी आवाज़ ही पहचान है 6 फरवरी, 2022, रविवार, 12 बजे – तीसरा प्रहर. लता के निधन से पूरे देश में शोक की लहर है. करोड़ों संगीत प्रेमियों का दिल टूट गया. लेकिन हर दिल में रह-रह कर एक गीत के बोल गूंज उठते हैं - नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज़ ही, पहचान है... यह गीत लता ने 45 साल पहले ‘किनारा’ फिल्म के लिए गाया था. 45 साल पहले यानी 1977 में. आज देश में ‘लता-प्रेमी’ ज़िंदा लोगों की संख्या कितनी है, जो 45 साल पहले जवान थे? यह मुझे मालूम नहीं, लेकिन ऐसे लाखों लोग हैं जिन्हें याद है कि ‘किनारा’ फिल्म 21 मार्च, 1977 में रिलीज हुई थी. उन्हें फिल्म रिलीज होने के साल के साथ महीना और तारीख भी याद है. क्यों? क्योंकि 21 मार्च,1977 के दिन ही देश 19 महीने के कैद से मुक्त हुआ था. उसी दिन ‘इमरजेंसी’  खत्म करने की घोषणा की गयी थी. दिल्ली पर काबिज सत्ता की इस घोषणा को सुनते ही बेजुबान देश आजाद पंछियों-सा चहचहा उठा था. तानाशही की मंझधार में फंसी नैया को पुनः लोकतंत्र का किनारा मिल गया! उस दिन देश के हजारों शहर के सिनेमाघरों में रिलीज हुई ‘किनारा’ फिल्म हाउसफुल रही या नहीं, फिल्म हिट-सुपरहिट साबित हुई या नहीं, यह शायद ही किसी को याद हो. लेकिन लता के निधन से टूटे हर दिल में यह दृश्य आज भी रह-रह कर कौंधता होगा कि सिनेमाघर से निकलते हर दर्शक की जुबान पर गीत के बोल बैठते, फुदकते और फुर्र-से उड़ जाते. गल्प-तर्क : गर याद रहे   6 फरवरी, 2022, रविवार, 2 बजे – चौथा प्रहर. हवाओं के नाम प्रेषित शब्दों ने सूचना दी है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने दिवंगत लता के सम्मान में देश में दो दिन का राष्ट्रीय शोक की घोषणा की. लता के अवसान में 45 साल पहले के किनारे पड़े लाखों दिलों की धड़कन हवाओं में गूंजने लगी– वाह. राष्ट्रीय शोक की घोषणा कर दी? पहले इसकी घोषणा राष्ट्रपति करते थे? लेकिन दूसरे ही पल प्रधानमंत्री मोदी जी घोषित ‘अमृत काल’ में गोता लगाते लता-प्रेमी सत्ता के सूत्रों से प्राप्त विरह-आदेश गूंजने लगा. पहले भी केंद्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति घोषणा करते थे, लेकिन अब राज्य सरकारें भी राजकीय शोक की घोषणा करती हैं. राष्ट्रपति द्वारा घोषणा का पुराना निर्णय तो कब का मृत हो गया. इस अमृत-काल में उस मृतक पर शोक करना सर्वथा अवैध है. सो हर टूटे दिल को सूचना दी जाती है कि लता के सम्मान में राष्ट्रीय शोक के दौरान क्या होगा? राष्ट्रध्वज आधा झुका रहेगा. ‘राष्ट्रीय ध्वज संहिता’ के अनुसार राजकीय शोक के दौरान संसद, सचिवालय, विधानसभा, अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय भवनों या सरकारी कार्यालयों पर लगा राष्ट्रध्वज आधा झुका रहता है. इसके अलावा देश से बाहर स्थित भारतीय दूतावासों पर भी राष्ट्रध्वज आधा झुका रहता है. राष्ट्रीय शोक के दौरान कोई सरकारी या औपचारिक कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया जाता है. बहरहाल,  देश को अब तो लता की याद में जीना है. जो अपने दिल में ‘लता की याद’ को अमर रखना चाहे, तो किनारा के पूरे गीत को कंठस्थ कर ले. तब शायद देश के पांच राज्यों के चुनावी शोर में व्यस्त वोटर-दिलों को भी प्रधानमंत्री द्वारा घोषित ‘अमृत काल’ का असली अर्थ समझ में आयेगा. फिलहाल इस गीत को कंठस्थ करने, घर-घर प्रचार करने या श्मशान-कब्रिस्तान में अकेले या सामूहिक स्वर में गाने पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगा है. वर्तमान अमृत काल में लता की याद को अमरत्व प्रदान करनेवाला पूर्ण गीत इस प्रकार है नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे... वक़्त के सितम, कम हसीं नहीं आज हैं यहां, कल कहीं नहीं वक़्त से परे अगर, मिल गये कहीं मेरी आवाज़ ही ... जो गुज़र गई, कल की बात थी उम्र तो नहीं, एक रात थी रात का सिरा अगर, फिर मिले कहीं मेरी आवाज़ ही ... दिन ढले जहां, रात पास हो ज़िंदगी की लौ, ऊंची कर चलो याद आये गर कभी, जी उदास हो मेरी आवाज़ ही ... ( वरिष्ठ पत्रकार और लेखक) डिस्क्लेमर - ये लेखक के निजी विचार हैं. 

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