Search

Advertisement
Advertisement
Advertisement

राष्ट्रीय शिक्षा नीति पूरी तरह से असंवैधानिक है : गुलाब चंद्र

Advertisement
Advertisement
Bermo: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ऐसे समय में लाया गया, जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी के चपेट में थी. इस विषय पर आम जनता के बीच बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हो सकी और कानून पारित हो गया. वैसे जानकारों का मानना है कि इस नई शिक्षा नीति में कई बंद दरवाजे को खोलती है. लेकिन हज़ारों वर्षों से एक वर्ग जो शिक्षा से मरहूम रहा था, उसके लिए इस नई नीति में प्रावधान नहीं किया गया है. लगातार">https://lagatar.in/">लगातार

मीडिया की टीम ने इसी विषय को लेकर शिक्षाविदों से उनकी राय ली. [caption id="attachment_352546" align="aligncenter" width="500"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/07/11-11.jpg"

alt="" width="500" height="400" /> गुलाब चंद्र[/caption] सामाजिक कार्यकर्ता और दामोदर बचाओ अभियान के प्रदेश संयोजक है गुलाब चंद्र की इस पर अपनी राय है. उनका कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति पूरी तरह से असंवैधानिक है, क्योंकि यह शिक्षा के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय लेने के राज्य सरकारों के अधिकारों को भंग करता है. जबकि शिक्षा भारतीय संविधान की समवर्ती सूची का विषय है. ऐसे विषय पर कोई निर्णय आमतौर पर राज्य सरकारों को ही लेनी चाहिए. केंद्रीय नियामक निकाय, केंद्रीकृत पात्रता व मूल्यांकन परीक्षण और कक्षा 3, 5 और 8 में केंद्रीकृत परीक्षाओं को लागू करके यह नीति जरूरी अकादमिक और शैक्षणिक निर्णय लेने के राज्य सरकारों को संवैधानिक रूप से प्रदत्त संघीय अधिकार को दरकिनार करती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 प्राचीन काल के स्वर्ण युग होने के खारिज किए जा चुके उसी औपनिवेशिक विचार को स्थापित करती है, जिसमें जाति और लिंग आधारित भेदभाव को नजरअंदाज किया गया था. यह गौतम बुद्ध और महावीर के साथ-साथ प्राचीन काल में चार्वाक के दार्शनिक कार्य और मध्यकाल के दौरान सूफी-भक्ति, इस्लामी और सिख परंपराओं के ज्ञान और बहस की गैर-ब्राह्मणवादी धारा के समृद्ध योगदान की पूरी तरह से उपेक्षा करती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 असंवैधानिक है, क्योंकि यह समानता के उस मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है, जिसका पालन राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है. यह नीति देश की 85-90 फीसदी वंचित आबादी के लिए स्कूल परिसर जैसे घटिया शैक्षिक प्रावधान, एकल शिक्षक विद्यालय, घर बैठे शिक्षा, दो स्तर के कोर्स और शिक्षा, डिजिटल ई-विद्या द्वारा एक-पक्षीय डिजिटल शिक्षा और मुक्त विद्यालय जैसे प्रावधान करती है, जो समानता के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथाकथित ‘मेरिट’ की भ्रामक अवधारणा के माध्यम से प्रवेश, भर्ती और पदोन्नति में आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान की और सामाजिक न्याय के अन्य विधिवत प्रावधानों जैसे छात्रवृत्ति, फैलोशिप, हॉस्टल और सबसिडी की अनदेखी करती है. उन्होंने कहा कि इस नीति कुछ अच्छी बातें भी हैं. जिसमें दोपहर के भोजन के अतिरिक्त बच्चो को अब ब्रेकफास्ट भी मिलेगा. शिक्षा के अधिकार का विस्तार करके इसे 1-12वीं तक किया जाएगा. देश भर में लगभग दस लाख शिक्षकों के खाली पड़े पदों को भरा जायगा. सेमेस्टर सिस्टम लागू होगा. 12वीं के बाद बीएड चार साल, बीए के बाद दो साल और एमए के बाद एक वर्ष का होगा. बोर्ड परीक्षा का भय कम किया जाएगा. ऑनलाइन मूल्यांकन और टीचर नियुक्तियों में साक्षात्कार अवश्य लिया जायेगा. प्रमोशन में भी विभागीय परीक्षा, गांव में तैनात शिक्षकों के लिए विशेष भत्ते और शिक्षकों के तबादले बहुत जरूरी होने पर ही होंगे. शिक्षकों के लिए विद्यालय के नजदीक आवास, पूरे देश मे समान पाठ्यक्रम और अध्यापकों के प्रशिक्षण में जोर होगा. इसके अलावा व्यवसायिक शिक्षा पर बल, स्कूली स्तर पर आठवीं के बाद विदेशी भाषा के कोर्स, निजी स्कूलों पर पहले से ज्यादा नियंत्रण और निजी स्कूल के नाम में (पब्लिक) शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. अध्यापक पात्रता परीक्षा के बिना निजी स्कूलों में भी नियुक्त नहीं होंगे शिक्षक. शिक्षा मित्र, पैरा टीचर और गेस्ट टीचरों की नियुक्ति नहीं होगी. गैर शैक्षणिक कार्यों से मुक्ति और स्कूल प्रबंधन समिति अब निजी स्कूलों में भी गठित की जाएगी. राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना, शिक्षा को अनिवार्य और 100% साक्षरता दर हासिल करने का लक्ष्य है. इसके बावजूद भी जो भारत की सामाजिक स्थिति है, उसकी अनदेखी की गई है. [caption id="attachment_352547" align="aligncenter" width="500"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/07/10-7.jpg"

alt="" width="500" height="400" /> योगो पूर्ति[/caption] इस संबंध निजी स्कूल निदेशक और सामाजिक कार्यकर्ता योगों पूर्ति ने कहा कि नई शिक्षा नीति में ‘मेरिट’ को शिक्षकों की योग्यता और पात्रता शर्तों के रूप में नहीं बल्कि, ‘संस्था और समाज के प्रति प्रतिबद्धता और नेतृत्व गुणों को दिखाने’ के रूप में समझा गया है. इससे ‘राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध’ व्यक्तियों को शैक्षणिक संस्थानों में प्रशासनिक व दूसरे ऊंचे पदों पर लाने की गुंजाइश बनती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भेदभाव से पीड़ित अनुसूचित जाति/जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/विकलांग और अन्य वंचित वर्गों को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान का कोई उल्लेख नहीं है. नीति जानबूझ कर ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘समाजवाद’ शब्द की अनदेखी करती है, जो आजादी की लड़ाई की विरासत का हिस्सा है. इसमें कहीं भी सभी बच्चों के लिए या वंचित वर्गों के लिए ‘मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा’ के संवैधानिक जनादेश का उल्लेख नहीं है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 हमारे 85 प्रतिशत से 90 प्रतिशत बच्चों और युवाओं को पूर्णकालिक औपचारिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से बाहर कर देगा. उन्हें घटिया और प्रतिगामी शिक्षा की तरफ खदेड़ देगा. उन्हें कम वेतन वाले बाल श्रम या पारिवारिक व्यवसायों की ओर धकेल देगा, जिससे जाति व्यवस्था सुदृढ़ होगी. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषाओं की भूमिका को कम करती है. जहां शिक्षा अधिकार कानून में आठवीं कक्षा तक की शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषाओं के इस्तेमाल का प्रावधान था. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसे केवल 5वीं तक सीमित कर देती है. पुराने कानून की तरह इसमें भी ‘जहां तक संभव हो’ जैसी शर्त रखी गई है. जिससे यह सीमित प्रावधान भी अमल में लाने की संभावना कम हो जाए. यह नीति एकरूपता और केंद्रीकरण की प्रक्रियाओं को बढ़ाती है. जो अनिवार्य रूप से मातृभाषाओं, क्षेत्रीय और स्थानीय भाषाओं और ज्ञान की विविधता और प्रगति की विरोधी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 उर्दू के बारे में कुछ नहीं बोलती है. संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध होने के बावजूद इसके उलट, यह शिक्षा के हर स्तर पर संस्कृत को थोपने का प्रयास करती है. यह पूर्व-माध्यमिक शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान नहीं करती है. तीसरी कक्षा के बाद PARAKH के जरिए केंद्रीकृत परीक्षाएं आयोजित करवाकर यह नीति शिक्षा अधिकार कानून की ‘नो-डिटेंशन पॉलिसी’ को कमजोर करती है. इसकी वजह से वंचित वर्ग (बहुजन आवाम) तालीम से भारी संख्या में बाहर किया जाएगा. यह नीति शिक्षा के व्यवसायीकरण को बढ़ावा देती है. परोपकारी संस्थानों की स्थापना के नाम पर बिना किसी भी प्रभावी तंत्र की स्थापना के सेल्फ फाइनेन्सिंग कोर्स अनुदानों में कमी, छात्र ऋणों और छात्रवृत्ति में कमी को बढ़ावा देती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शैक्षिक संस्थानों के शुल्क और वेतन संरचनाओं को पूरी तरह से समाप्त कर देती है. वे केवल ऑनलाइन पारदर्शी स्व-प्रकटीकरण की आवश्यकता को पूरा करते है. यानी ‘लूट और शोषण करो फिर घोषणा कर दो’ यह नीति राष्ट्रीय प्रत्यायन (Accreditaion) प्रणाली से जुड़ी ग्रेडेड स्वायत्तता की अवधारणा के माध्यम से सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को नष्ट करती है. उच्च शिक्षा संस्थानों के अनुदान को NAC और आउटपुट की गुणवत्ता से जोड़ना यह दर्शाता है कि केवल कुछ बेहतर प्रदर्शन करनेवाले (कुलीन) संस्थानों को ही सरकारी फंडिंग मिल पाएगी. इसमें बहुतेरे संस्थान पीछे रह जाएंगे. सरकारी स्कूलों की भांति बंदी के कगार पर आ जाएंगे. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 चार-वर्षीय स्नातक डिग्री कोर्स की सिफारिश करती है, जबकि दिल्ली यूनिवर्सिटी में इसके खिलाफ संघर्षरत विद्यार्थियों और शिक्षकों की मांग पर खुद भाजपा ने इसे वहां से खत्म किया था. स्नातकोत्तर को 2 वर्ष से घटाकर एकवर्षीय बनाया जाएगा. एमफिल डिग्री को हटा दिया जाएगा. इससे विद्यार्थियों में गुणवत्तापूर्ण शोध की क्षमता प्रभावित होगी. साथ ही विश्वविद्यालय के शिक्षकों के कार्यों में उतार-चढ़ाव आएगा. औपचारिक शिक्षा से बाहर निकलने के कई विकल्प देने के बहाने दरअसल यह नीति ‘ड्रॉपआउट’ या सही शब्दों में कहें तो तालीम से बेदखली को वैधता देती है. इससे आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों और महिलाओं के लिए औपचारिक शिक्षा में वापस लौटना काफी मुश्किल होगा. वैसे तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 उच्च शिक्षा की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था के कठोर होने की आलोचना करती है, लेकिन इसमें प्रस्तावित ‘उच्च शिक्षा आयोग’ (HECI) उसके चार अंगों (NHERC, NAC, HEGC, GEC) की व्यवस्था के चलते उच्च शिक्षा के हर स्तर पर केंद्रीकरण बढ़ जाएगा. इसमें प्रस्तावित ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन’ (NRF) के माध्यम से अकादमिक शोध पर केंद्रीय नियंत्रण स्थापित हो जाएगा. जिससे शोध में पहलकदमी, रचनात्मकता और उत्साह खत्म हो जाएगा. संविधान के अनुच्छेद 246 को नजरअंदाज करते हुए नीति में सभी विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में दाखिले के लिए NTA के माध्यम से केंद्रीकृत परीक्षा की व्यवस्था करती है. ऐसी व्यवस्था से देश के विभिन्न हिस्सों की स्कूली शिक्षा में मौजूद गैर-बराबरियों व विषमताओं का दुष्प्रभाव और बढ़ेगा. इसके अलावा PARAKH और NTA की वजह से न सिर्फ कोचिंग बिजनेस और मूल्यांकन के आउटसोर्सिंग को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि इससे वंचित व दमित जातियों और वर्गों के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना और भी मुश्किल हो जाएगा. [wpse_comments_template]

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही