Gyanendra Awasthi
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की साख आज उस मुकाम पर है जहां "डिनाई, डिफ्लेक्ट और डिले" (नकारना, भटकाना और देरी करना) ही उसकी कार्यप्रणाली बन गई है. यह स्कैम केवल पेपर लीक का मामला नहीं है, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की आत्मा को धीरे-धीरे बेचने का एक व्यवस्थित षड्यंत्र है.
- संगठित अपराध की सप्लाई चेन : चार घातक कदम-यह कोई फोन कॉल पर होने वाला सौदा नहीं है, बल्कि एक अदृश्य और बेहद संगठित इकोसिस्टम है.
- प्रिंटिंग प्रेस नेक्सस : प्रश्नपत्रों की छपाई एक अति-गोपनीय प्रक्रिया होनी चाहिए, लेकिन जांच में बिहार और गुजरात के ऐसे सब-कॉन्ट्रैक्टर्स के नाम सामने आए हैं, जिनके संबंध सीधे परीक्षा माफिया से हैं.
- एग्जामिनेशन सेंटर हब : हजारीबाग, पटना और गोधरा जैसे शहरों के कुछ खास सेंटर 'सेटिंग' के केंद्र बन गए हैं. छात्रों को रणनीतिक रूप से इन्हीं सेंटर्स पर भेजा जाता है, जहां पूरा तंत्र पहले से 'मैनेज' होता है.
- कोचिंग माफिया : यूट्यूब और विज्ञापनों की चमक के पीछे 'शैडो बैच' चलते हैं. यहां 30 लाख से 50 लाख रुपये की फीस में 'गारंटीड सिलेक्शन' का सौदा होता है.
- बिचौलिया अर्थव्यवस्था : यह उन हताश परिवारों को टारगेट करते हैं जो स्टेटस सिंबल के लिए अपने बच्चों को किसी भी कीमत पर डॉक्टर बनाना चाहते हैं.
मोनोपोली और जवाबदेही का अभाव
2013 में सुप्रीम कोर्ट ने जिस 'नीट' को एक पारदर्शी समाधान के रूप में देखा था, 2019 में एनटीए के हाथ में आते ही वह एक 'चोक पाइंट' (Choke Point) बन गया.
- एक एजेंसी, दर्जनों परीक्षा : एनटीए पर काम का बोझ इतना है कि उसकी जवाबदेही (Accountability) शून्य हो गई है.
- सांख्यिकीय असंभवता : जून 2024 के नतीजों में 67 छात्रों का 720 में से 720 अंक लाना गणितीय रूप से लगभग असंभव (Near to Impossible) था, फिर भी एनटीए ने पहले इसे नकार दिया और बाद में अनियमितताओं को स्वीकार किया.
क्या आप 'खरीदे हुए' डॉक्टर से इलाज कराएंगे?
यह केवल परीक्षा में धोखाधड़ी नहीं है, बल्कि यह एक 'सिस्टमिक नरसंहार' (Systemic Genocide) की श्रेणी में आता है. जो आज 30-50 लाख रुपये देकर सीट खरीद रहा है, कल वह ऑपरेशन थिएटर में खड़ा होगा. जैसा कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉक्टर कफील खान कहते हैं, "एक अयोग्य डॉक्टर का गलत निर्णय किसी की जान ले सकता है." यह भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के भविष्य के साथ किया जा रहा एक आपराधिक समझौता है.
सुधार के मॉडल्स : इच्छाशक्ति की कमी
जब आईआईटी (IIT) द्वारा आयोजित GET जैसी परीक्षाएं बिना लीक के कंप्यूटर बेस्ड और डिसेंट्रलाइज्ड तरीके से हो सकती हैं, तो नीट क्यों नहीं?
ग्लोबल मॉडल्स
यूएसए का USMLE (कंप्यूटर एडाप्टिव), यूके का UKCAT (एप्टीट्यूड और एथिक्स टेस्टिंग) और जर्मनी का एनसी सिस्टम (सोशल वर्क और ग्रेड्स का होलिस्टिक वेटेज) ऐसे उदाहरण हैं, जहां पेपर लीक का कॉन्सेप्ट ही खत्म कर दिया गया है.
राधाकृष्णन कमेटी
सरकार ने 2024 में इसरो के पूर्व चेयरमैन की अध्यक्षता में एक पैनल बनाया, जिसने 'डिजिटल लॉकडाउन' और 'डिसेंट्रलाइजेशन' की बात कही, लेकिन 2026 में फिर से पेपर लीक होना यह बताता है कि कार्यान्वयन (Implementation) शून्य है.
एनटीए अकेला विलेन नहीं है. विलेन वह समाज भी है, जो डॉक्टर की डिग्री को स्टेटस सिंबल मानता है और वे माता-पिता भी जो 30 लाख की रिश्वत देने की क्षमता रखते हैं. सीबीआई जांच और कुछ गिरफ्तारियां केवल 'न्यूज साइकिल' को शांत करने का तरीका है. जब तक ढांचागत सुधार (Structural Overhaul) नहीं होगा, यह लूप हर साल दोहराया जाएगा.
भारत का भविष्य चोरी किया जा रहा है. याद रखिएगा, इस बीमारी का इलाज कोई कमेटी नहीं, बल्कि आपकी आवाज और आपका सवाल है, "हर साल यह परीक्षा क्यों नहीं हो पा रही है?
डिस्क्लेमर : लेखक मार्केट एनालिस्ट और टिप्पणीकार हैं और यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया से साभार लिया गया है.
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