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ना खपत बढ़ी, न उत्पादन घटा, फिर भी सब्जियों के दामों में 78% तक का हुआ इजाफा

LagatarDesk :   सब्जियों पर महंगाई की मार देखने को मिल रही है. सितंबर में सब्जियों की थोक महंगाई दर (WPI) 48.73 फीसदी बढ़ गयी है. वहीं आलू और प्याज की कीमतों में 78 फीसदी, जबकि टमाटर की कीमतों में 48 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है. खुदरा महंगाई के आंकड़ों ने भी चिंता बढ़ा दी है. यह रिजर्व बैंक के 5 प्रतिशत की सीमा को पार कर गयी है और सब्जियों की महंगाई लगभग 36% बढ़ी है (अगस्त में यह केवल 10% थी). सितंबर में खाद्य महंगाई दर बढ़कर 9.24% तक पहुंच गयी है, जो अगस्त में 5.66% थी. खुदरा महंगाई के सूचकांक में सब्जियों का योगदान लगभग 7.46% है.

प्याज का सबसे बड़ा और आलू-टमाटर का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है भारत 

आमतौर पर यह माना जाता है कि महंगाई किल्‍लत से बढ़ती है. लेकिन आलू, प्याज, और टमाटर की उपज लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2022 तक पिछले एक दशक में उनकी पैदावार में 63% का इजाफा हुआ है. 2022-23 में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू-टमाटर का उत्पादक है. वहीं भारत प्याज का सबसे बड़ा उत्पादक है. इसके बावजूद सब्जियों पर महंगाई बढ़ती ही जा रही है.

क्या भारतीय उपभोक्ता ज्यादा आलू-प्याज-टमाटर खा रहे हैं?

आंकड़े बताते हैं कि उपभोक्ताओं के मासिक खर्च में सब्जियों का हिस्सा पिछले एक दशक से 3-4% पर स्थिर है. कुल उत्पादन का केवल 8.6% प्याज और 2% आलू-टमाटर निर्यात होता है. इसका मतलब है कि यह पूरी तरह से घरेलू खपत के लिए होते हैं, फिर भी महंगाई क्यों इतनी अधिक है?

हर रुपये के खर्च में किसानों को सिर्फ 33-37 पैसे मिलते

आलू, प्याज, और टमाटर की क्रांति ने किसानों को अमीर नहीं बनाया है. रिजर्व बैंक के अनुसार, उपभोक्ताओं द्वारा हर रुपये के खर्च में किसानों को केवल 33 से 37 पैसे मिलते हैं. थोक व्यापारी भी 32 से 37 पैसे का मुनाफा कमाते हैं और बचे हुए पैसे का हिस्सा रेहड़ी वालों के पास जाता है, जो बड़ी कीमतों को बढ़ाकर बेची न गयी सब्जियों के नुकसान की भरपाई करता है.

किसान और उपभोक्ता दोनों की जेब काट रही सब्जियों की महंगाई

सब्जियों के इस आर्थिक चक्र में मौसम का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है. इसको संभालने के लिए भंडारण और आपूर्ति के नये उपायों की आवश्यकता है. इस स्थिति में सब्जियों की महंगाई किसान और उपभोक्ता दोनों की जेब काट रही है. तो फिर इस स्थिति का लाभ किसे मिल रहा है? खेती पर राजनीतिक भाषणों और वादों का गुणगान अपना ही महत्व रखता है और जब ये टूटते हैं, तब हमें यह समझ में आता है कि ताजा महंगाई वहां से आ रही है, जहां हम आत्मनिर्भर हैं.

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