
बैजनाथ मिश्र
नया साल (2026) शुरू हो गया है. इस साल का पहला सूर्योदय हमारे राष्ट्र के लिए दो खुशखबरी लेकर उदित हुआ. पहली यह कि हम विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गए हैं. हमने जापान को पीछे छोड़ दिया है. लेकिन गिरोहबाजों और बौद्धिक जुगाली करने वालों का दिल है कि मानता नहीं. उनका तर्क है कि जापान की प्रति व्यक्ति आय हमसे अधिक है. सही है, लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था के दूसरे पायदान पर खड़ा चीन भी तो प्रति व्यक्ति आय के मामले में जापान से पीछे है. वहां तो किसी ने चिल्लपों नहीं मचाई. सरकार की उपलब्धियों से शाश्वत असंतुष्ट जान बूझकर यह तथ्य गोल कर जाते हैं कि जापान की जनसंख्या जहां तीस करोड़ है, वहीं हम डेढ़ सौ करोड़ के आसपास हैं. यह भी कि विश्व अर्थव्यवस्था की रेटिंग वैश्विक एजेंसियां करती हैं, कोई देश खुद अपनी रेटिंग नहीं बढ़ा सकता हैं.
दूसरी खबर यह कि हमारे डीआरडीओ ने एक ही लांचिंग पैड से दो प्रलय मिसाइलों का सफल प्रक्षेपण कर दुनिया को चौंका दिया है. इन मिसाइलों की खूबी यह है कि प्रत्याक्रमण की स्थिति में ये अपनी राह बदल कर भी लक्ष्य पर अचूक वार करने में सक्षम है. इनकी रेंज पांच सौ किमी से ज्यादा है. यानी आधा पाकिस्तान इनकी जद में होगा.
तो क्या इन दो उपलब्धियों को शगुन मानकर हमें इत्मीनान कर लेना चाहिए कि यह साल उपलब्धियों का वर्ष होगा? कदापि नहीं, क्योंकि हमारे देश में राजनीति ही सर्वोपरि है और उसकी बेढ़ंगी चाल पहले से भी भोड़ी होती दिख रही है. कांग्रेस ने शपथ ली है कि वह मनरेगा की बहाली और ‘जी राम जी’ की वापसी के लिए सरकार को बाध्य कर देगी. इधर, भाजपा ने भी अपने कार्यकर्ताओं को जी राम जी के पक्ष में गांव-देहात में माहौल बनाने का निर्देश दे दिया है. इस द्वंद्व का क्या परिणाम होगा और इसका रूप-रंग कितना घिनौना होगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है.
लेकिन अगले छह महीनों में पूरब-दक्षिण में विधानसभाओं के चुनाव होने हैं और इन चुनावों में इतने कीचड़ उछाले जाएंगे, कालिख पोती जाएगी कि सीरत खो चुके नेताओं की सूरत भी देखने लायक नहीं रह जाएगी. इन विधानसभा चुनावों से पहले इसी जनवरी महीने में महाराष्ट्र की उनतीस महानगरपालिकाओं के चुनाव परिणाम आ जाएंगे. पर्चा दाखिला और स्क्रूटनी का काम पूरा हो चुका है. पंद्रह को वोट पड़ेंगे और सोलह को नतीजे आएंगे. इन महानगरपालिकाओं में बृहन्न मुंबई महा नगरपालिका (बीएमसी) भी है जो उद्धव ठाकरे की पार्टी की प्राण वायु है. इसका सालाना बजट कई राज्यों से अधिक है. इन चुनावों में न राज्य में सत्तारूढ़ गठबंधन (महायुति) एकजुट है, ना ही विपक्षी गठबंधन (महा विकास अघाड़ी).
मुंबई में ही भाजपा और शिंदे की शिवसेना साथ हैं तो उप मुख्यमंत्री अजित पवार अपने चाचा शरद पवार के साथ हो लिए हैं. इसी ग्रुप के रामदास अठावले अलग लड़ रहे हैं. उधर, कांग्रेस अकेले लड़ रही है और उद्धव ने राज ठाकरे से हाथ मिला लिया हैं. पूरे राज्य में यही स्थिति है- कहीं अजित पवार-शिंदे साथ हैं तो भाजपा अलग है. कहीं भाजपा-अजित पवार साथ हैं तो शिंदे अलग हैं. कहीं तीनों अलग-अलग लड़ रहे हैं. यही स्थिति विरोधी खेमे की भी हैं. लेकिन एक तस्वीर साफ दिखती है कि विरासत की सियासत बचाने के लिए उद्धव ठाकरे और शरद पवार हाथ-पांव मार रहे हैं. दिसंबर में नगर परिषद और स्थानीय निकायों के चुनाव परिणामों ने इन दोनों को सकते में डाल दिया है.
अब लौटते हैं जून तक होने वाले विधानसभा चुनावों की तस्वीर और तासीर पर. सबसे कड़ा और रोचक मुकाबला पश्चिम बंगाल में होगा. उसकी बानगी अभी से दिखाई दे रही है. ममता बनर्जी हर हाल में अपनी कुर्सी बचाने के लिए उद्यत हैं तो भाजपा बाजी पलटने के लिए कुछ भी करने को तैयार है. मर्यादाएं अभी से तार-तार हो रही हैं. जब चुनाव परवान पर होगा तो जुबानी जंग का आलम क्या होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. लेकिन भाजपा पिछले चुनाव में जिस बीहड़ में फंसी थी, वहां से निकलने की राह अभी नहीं बना पाई है. अगर बाबरी मस्जिद के चैंपियन हुमांयू कबीर कुछ इलाकों में ठीक-ठाक वोट निकाल ले गए और कांग्रेस तथा वाममोर्चा ने भी तंद्रा छोड़कर अंगड़ाई लेने वाली लड़ाई लड़ी, तभी भाजपा फैसलाकून नतीजे की ओर बढ़ पायेगी. कांग्रेस और वाम मोर्चा के बुरी तरह पिट जाने से भाजपा हाथ मलते रह जाएगी, क्योंकि इन दोनों पार्टियों के वोट भाजपा के बदले टीएमसी की ओर चले जाते हैं. इसका प्रमाण यह है कि पिछले दो चुनावों में जहां भाजपा का वोट सिर्फ डेढ़ फीसदी बढ़ा है, वहीं टीएमसी तीन फीसदी से ज्यादा वोट बटोर ले गई है.
इसके ठीक उलट केरल का परिदृश्य है. वहां सीधी लड़ाई कांग्रेसनीत यूडीएफ और लेफ्टनीत एलडीएफ के बीच है. यहां कांग्रेस की सत्ता में वापसी की संभावना प्रबल है. लेकिन यह संभावना यथार्थ में तभी बदलेगी जब भाजपा पूरी शिद्दत से लड़े और हिंदुओं का अच्छा खासा वोट हथिया ले. केरल में भाजपा एक नयी सनसनी के रूप में बढ़ रही है. उसका प्रभाव नायर ब्राह्मणों, पिछड़े हिंदुओं में तो बढ़ा ही है, कुछ ईसाई समूह भी उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं. उसने तिरूअनंतपुरम महापालिका जीतकर लेफ्ट की नींद खराब कर दी है. कुछ नगरपालिकाओं में भी उसने फुटकर सफलाएं हासिल की है. कांग्रेस को सबसे अधिक फायदा मुस्लिम लीग के समर्थन का होगा और लेफ्ट के पास इसकी कोई काट नहीं है.
असम में ऊपरी तौर पर भाजपा अपनी सरकार बचाती दिख रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे भिन्न है. कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गगोई ने अपनी रेंज बढ़ा दी है. मुख्यमंत्री हिमंता विस्वा शर्मा डींगे तो बहुत हांक रहे हैं और खुद को योगी आदित्यनाथ से भी बड़ा हिन्दू नेता साबित करने में भी लगे हैं, लेकिन आदिवासी वोटों पर उनकी पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है. अगर भाजपा इस भरोसे में है कि बदरूद्दीन अजमल की पार्टी मुसलमानों का अच्छा-खासा वोट काटकर कांग्रेस का हिसाब-किताब चौपट कर देगी तो वह भ्रम में है. लोकसभा चुनाव में खुद अजमल कांग्रेस के हाथों बुरी तरह पिट चुके हैं. उनकी पराजय से मुसलमानों के बीच कांग्रेस की हैसियत बढ़ी है. भाजपा की दूसरी समस्या अपने साथी दलों को साधने और उन्हें इज्जत देने की है. यहां लड़ाई कांटे की होगी और यदि भाजपा असम में हार जाती है तो उसकी नाक कट जाएगी, क्योंकि वह पराजय का कोई बहाना नहीं ढूंढ़ पाएगी.
जहां तक तमिलनाडु की बात है, यहां न भाजपा का कोई असर है, न कांग्रेस का. कांग्रेस सुर्खरू बनती है डीएमके के साथ रहने से. भाजपा थोड़ा हाथ-पांव तभी मार पाएगी, जब एआईडीएमके से दोस्ती हो जाए. हालांकि एआईडीएमके में एकता हो गई है और यदि वनीयरो के समर्थन वाली पार्टी पीएमके तथा अभिनेता विजयकांत इस समूह के साथ जुड़ जाते हैं तो भाजपा थोड़ा सुकून की सांस ले सकती है. तब दोनों खेमों में मुकाबला थोड़ा रोचक हो जाएगा और स्टालिन पिछली बार की तरह एकतरफा जीत हासिल नहीं कर पाएंगे. अन्नामलाई के कारण भाजपा की सक्रियता तो बढ़ी थी, लेकिन उनके बयानों ने भाजपा को सहयोगियों से अलग कर दिया. अब उन्हें नेपथ्य में डाल दिया गया है. लेकिन अभी गठबंधन की गांठ सुलझी नहीं है.
केंद्र शासित राज्य पुद्दुचेरी का मामला एक पतले धागे पर संतुलन साधने जैसा है. अभी वहां एनडीए सरकार में है, लेकिन बीस लाख की आबादी वाले इस राज्य में कांग्रेस खेल कर सकती है. यदि एनडीए किसी तरह अपनी सरकार बचा भी ले, तो राष्ट्रीय राजनीति पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा.
कुल मिलाकर यदि भाजपा असम बचा लेती है और बंगाल जीत लेती है तो उसका ग्राफ और बढ़ जाएगा. केरल, तमिलनाडु में वह कुछ पाने की हैसियत में नहीं है. लेकिन यदि वह असम हार जाती है और बंगाल में खेत रह जाती है, तो बदलाव की एक बयार बह सकती है जो 2027 से 2028 होते हुए 2029 के आम चुनाव तक कायम रह सकती है बशर्ते विपक्ष फालतू मुद्दों के बदले जनता के मुद्दों के साथ उनके बीच जाये.

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