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बिहार में सबसे बड़े नीतीश थोड़े बौने हो गए

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बैजनाथ मिश्र

नीतीश कुमार अब बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे. वह राज्य सभा जा रहे हैं. शायद यह उनकी तमन्ना थी. उनके ट्वीट से तो यही लगता है. मुख्यमंत्री की जो कुर्सी उनसे हमेशा चिपकी रहती थी, चाहे वे जहां जायें साथ नहीं छोड़ती थी, सीटें घटे या बढ़े, वही कुर्सी नीतीश ने छोड़ दी है. लेकिन नीतीश राज्य सभा तो कभी भी जा सकते थे. अपने किसी सदस्य को इस्तीफा दिलवाकर जा सकते थे. फिर अचानक होली की उमंग में राज्य सभा जाने की हुड़दंग दिमाग में तारी क्यों हो गयी? अभी तो तीन चार महीने पहले ही महागंठबंधन के अरमानों की मिट्टी पलीद कर दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. 

 

दरअसल, वह शारीरिक और मानसिक रुप से कमजोर हो गये हैं. उनके समर्थक और अंधभक्त लाख छिपायें, लेकिन उनके हाव-भाव और भाषा शैली ही गवाह हैं कि अब वह अक्षम, असमर्थ हो गये हैं. ऐसे में बिहार जैसे बड़े और समस्याग्रस्त राज्य की बागडोर ठीक से संभाल पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा था. लेकिन ऐसी स्थिति में वह राज्य सभा में क्या कर लेंगे? अब नब्बे के दशक वाले नीतीश नहीं हैं जो लोकसभा में अपनी वक्तृत्व शैली से अपने विरोधियों को चुप करा देते थे. लेकिन आज वह किसी गंभीर मुद्दे पर प्रसंगानुकूल दस-पंद्रह मिनट भी धारा प्रवाह बोल पाने की स्थिति में नहीं हैं. 

 

पिछले विधानसभा चुनाव से पहले ही उनकी स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी. विपक्ष उनकी इस कमजोरी को लेकर हमलावर था. भाजपा भी उनकी हकीकत से वाकिफ थी, लेकिन उसे यह भय सता रहा था कि यदि नीतीश के चेहरे के बदले सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया तो पराजय का सामना करना पड़ सकता है. नीतीश ने गैर यादव पिछड़ों, दलितों, अति पिछड़ों और महिलाओं के बीच अपना अच्छा-खासा वोट बैंक बना रखा है. यह उनकी राजनीतिक कमाई है. इसलिए नारा लगाया गया पच्चीस से तीस फिर से नीतीश. लेकिन छब्बीस शुरु होते ही यह नारा या तो बोझ बन गया या निरर्थक लगने लगा. 

 

कहा जा सकता है कि यह भाजपा की खुराफात है जो अपने नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए नीतीश पर तोहमत लगाकर उन्हें हटा रही है. हो सकता है कि यह आरोप सही हो, क्योंकि भाजपा कोई संन्यासियों की टोली तो है नहीं जो मोह माया से दूर है. फिर उसे यह कसक भी साल रही होगी कि पूरी हिंदी पट्टी में बिहार ही ऐसा राज्य है जहां वह अपने नेतृत्व में सरकार नहीं बना सकी है. नीतीश के राज्य सभा जाने के बाद उसका यह मनोरथ पूरा हो सकता है. लेकिन क्या भाजपा की यह खुटचाल नीतीश की भूजा पार्टी के सदस्य और दूसरे सलाहकार नहीं समझ रहे थे जो उन्होंने हथियार डाल दिये? 

 

नीतीश की पहल का विरोध करने वाले जद(यू) नेताओं-कार्यकर्ताओं ने भी यह आरोप नहीं लगाया है कि इस षड्यंत्र के पीछे भाजपा का हाथ है. आरोप तो यही लग रहा है कि ललन सिंह, संजय झा और ललन सर्राफ आदि ने ही अपनी गुगली और चुगली से नीतीश का मन-मिजाज बदल दिया है. तो क्या नीतीश अपना और अपनी पार्टी का भला-बुरा नहीं समझ पा रहे हैं? यदि हां तो फिर भाजपा पर दोष मढ़ने की क्या जरूरत है और यदि नहीं, तो फिर मान लीजिए कि यह नीतीश का निजी फैसला है और सोच विचार कर लिया गया है. 

 

वैसे तथ्य यह भी है कि जद(यू) में दो तरह के नेता हैं एक भाजपा परस्त और दूसरे भाजपा से संत्रस्त. भाजपा परस्त वे हैं जो जानते हैं कि भाजपा के बगैर उनकी चुनावी राजनीति खाई में गिर सकती है. भाजपा संत्रस्त वे हैं जो जानते हैं भाजपा के विस्तार से उनकी राजनीति खटाई में पड़ सकती है. एक समय था जब नीतीश ही बिहार भाजपा के नेता बन गये थे. उन्हें कुछ भी कराना होता था को सीधे अटल-आडवाणी और जेटली-बैंकैया आदि को फोन लगा देते थे और अपनी अर्जी पर भाजपा की मर्जी की मुहर लगवा लेते थे. 

 

लेकिन 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में प्रोजेक्ट किये जाने के बाद नीतीश हत्थे से उखड़ गये. उन्होंने न केवल प्रस्तावित भोज रद्द कर दिया, 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा, सिर्फ दो सीटें पाये, मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया और 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद के साथ चले गये. दो साल बाद भाजपा की ओर लौटे तो वहां परिदृश्य बदल चुका था. अब बिहार भाजपा पर उनका कोई अंकुश नहीं था. बीस के विधानसभा चुनाव के बाद वह फिर भागे, लेकिन जल्दी ही लौट आये. उसके बाद वह पलटू चाचा हो गये और हर मंच पर कहने लगे कि अब वहां नहीं जायेंगे, जो गलती हो गयी, उसे नहीं दोहरायेंगे. पच्चीस आते-आते वह भाजपा के अनुयायी जैसे हो गये. तभी तो चुनाव बाद जब उनसे गृह विभाग छोड़ने के लिए कहा गया तो वह ना-नुकुर नहीं कर पाये. 

 

बहरहाल, नीतीश बिहार के एक मात्र नेता हैं जो बीस साल मुख्यमंत्री रहे. उन्होंने लालू प्रसाद के जंगलराज से बिहार को मुक्त कराया. राज्य को विकास की राह पर ले गये. बिहार की राजनीति की भाषा-परिभाषा बदल दी. सबसे उल्लेखनीय यह रहा कि बीस साल तक काजल की कोठरी में रहने के बावजूद वह लक-धक सफेद हैं. ऐसा ईमानदार नेता देश में बिरले ही होगा. यह उनकी पूंजी है जो उनके गौरव गान के लिए काफी है. लेकिन इस बार जो डील हुई है या जिसकी चर्चा हो रही है, उससे उनके सिद्धांत की एक थाती लुट गयी है. वह था उनका वंशवाद का विरोध. वह सदन के अंदर और बाहर सब जगह कहते थे कि उन्होंने अपने परिजनों और रिश्तेदारों को कभी आगे नहीं बढ़ाया. यह कह कर वह लालू परिवार पर तीखा हमला बोलते थे. लेकिन अब जबकि उनके पुत्र निशांत कुमार जद(यू) में आ गये हैं, डिप्टी सीएम बनने वाले हैं और वह भी नीतीश कुमार के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते तो क्या यह सवाल नहीं पूछा जाएगा कि नीतीश बाबू आपके वंशवाद विरोधी सिद्धांत को पलीता क्यों लग गया?  

 

यही करना था तो निशांत को पहले ही लोक सभा या राज्य सभा भेजकर केंद्र में मंत्री बनवा देते और बाद में पार्टी की चाबी सौंप देते. लेकिन यह सब अब होनेवाला है जब नीतीश का सितारा गर्दिशों में गुम होने वाला है. उनके खैरख्वाहों का कहना है कि उन्हें सम्मानजनक एग्जिट दिलाने के लिए यह कवायद की गयी है. लेकिन क्या निशांत की इंट्री से पहले नीतीश राजनीति से संन्यास नहीं ले सकते थे? अगर उनके संन्यास के बाद निशांत राजनीति में आते और ऊंचा से ऊंचा मुकाम हासिल करते तो नीतीश का मान-सम्मान बढ़ता. अब निशांत का राजनीतिक पालन-पोषण नीतीश की छत्रछाया में होगा और यह पूरी तरह वंशवाद है. 

 

अब दूसरे सवालों पर गौर करें. क्या नीतीश को कहीं का राज्यपाल बनाकर सम्मान नहीं दिया जा सकता था? यदि वह इसके लिए तैयार नहीं थे तो क्या उन्हें एनडीए के संयोजक पद पर सुशोभित करने का प्रस्ताव नहीं दिया जा सकता था? क्या जद(यू) के रणनीतिकारों ने इस बारे में भाजपा नेतृत्व से बात नहीं की? ऐसा हो जाता तो भी वह सम्मानजनक था. लेकिन वह राज्य सभा में सिर्फ सदस्य ही रहेंगे तो क्या कर लेंगे? यदि उन्हें किसी विभाग का मंत्री बनाया जाता है तो क्या वह कोई विभाग संभाल पाने की स्थिति में हैं? 

 

फिलहाल बिहार की राजनीति से नीतीश युग का अंत हो रहा है. इस युग में बहुत कुछ हुआ जो नीतीश को इतिहास में एक महानायक के रुप में दर्ज कराने के लिए काफी हैं. उन्होंने अपने संघर्षों और कार्यक्रमों से जो लंबी लकीर बिहार में खींची है वह अमिट है. 1995 में आईपीएफ (एक उग्रवादी संगठन) से समझौता कर चुनाव लड़नेवाले नीतीश ने 2005 के बाद से बिहार को अपने हिसाब से चलाया, संवारा और बढ़ाया. अब वह बिहार की गद्दी स्वेच्छा या पुत्र मोह में छोड़ रहे हैं तो अच्छा नहीं लग रहा है. लेकिन फैसला उनका है और परिणाम के उत्तरदायी भी वही होंगे. 

 

अभी तो यह तय होना है कि निशांत केवल सरकार में रहेंगे या संगठन के भी किसी खास ओहदे पर विराजमान होंगे. क्या वह दोनों दायित्व संभाल पायेंगे और यह भी कि क्या जद(यू) को एकजुट रख पायेंगे? अमूमन व्यक्तिवादी दलों में बिखराव की संभावना ज्यादा होती है. कयास लगाया जा रहा है कि नीतीश को भारत रत्न मिलेगा! उन्हें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति बनाया जा सकता है. क्षण-क्षण रंग बदलती सियासत में कुछ भी हो सकता है, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री के रुप में उन्होंने जो कीर्ति अर्जित की है, वही उनके जीवन का पाथेय है. 

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