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अब इस देश में हर संकट से निपटने के लिए “अभियान” क्यों चलाने पड़ रहे!

Surjit Singh तकरीबन सभी अखबारों में एक खबर प्रमुखता से है. वह यह कि बिजली संकट दूर करने के लिए रेलवे अलर्ट हो गया है. 24 मई तक यात्री ट्रेनों के 670 फेरे रद्द कर दिये गये हैं. इसके बदले ट्रेनों के इंजन में रैक लगाकर कोयले की ढ़ुलाई शुरू की जा रही है,  ताकि पावर प्लांटों तक कोयले को पहुंचाया जा सके और देश भर में आये बिजली संकट को दूर किया जा सके. यानी एक संकट से निपटने के लिए एक बड़ा देशव्यापी अभियान शुरू कर दिया गया है.

कुछ दिनों के बाद ऐसी खबरें पढ़ने को मिलेंगी

“केंद्र ने अभियान चला कर बिजली संकट दूर किया.” “मोदी है तो मुमकिन है.” “अगर मोदी या भाजपा के बदले दूसरे की सरकार होती तो लोग बिजली संकट से जूझते ही रह जाते या बिजली संकट और बड़ा होता.” “राष्ट्रवादी सरकार ने बिजली संकट दूर करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.” आदि-आदि.

देशव्यापी अभियानों की लंबी लिस्ट है

हाल के वर्षों में इस तरह के देशव्यापी अभियानों की लंबी लिस्ट है. पहले उन अभियानों की याद ताजा कर लें. पहली बार वर्ष 2016 में हवाई जहाज से देश भर में नोट पहुंचाये गये, जब मोदी सरकार ने रातों- रात नोटबंदी की घोषणा की. दूसरी बार तब देशव्यापी अभियान चलाया गया, जब अप्रैल 2016 में महाराष्ट्र के लातूर में पानी संकट हुआ. अलग-अलग जगहों से ट्रेनों के जरिए वहां पानी पहुंचाया गया. तीसरी बार वर्ष जुलाई 2016 में देशव्यापी अभियान चलाया गया,  ट्रेनों के जरिए चेन्नई तक पानी पहुंचाने का काम किया गया.

कोरोना में ऑक्सीजन पहुंचाने का देशव्यापी अभियान चला

चौथी बार वर्ष 2021 में ऐसा ही देशव्यापी अभियान तब चला, जब कोरोना की दूसरी लहर आयी. ट्रेनों व हवाई जहाजों से देश के अलग-अलग हिस्सों में ऑक्सीजन पहुंचायी गयी. यह स्थिति तब बनी थी, जब कोरोना की दूसरी लहर, पहली लहर के करीब एक साल बाद आयी थी. अब पावर प्लांटों तक कोयला पहुंचाने के लिए देशव्यापी अभियान शुरु किया गया है. यह पांचवीं घटना है. सवाल यह उठता है कि क्या अब इस देश में हर संकट से निपटने के लिए देशव्यापी अभियान चलेगा. आखिर ऐसी स्थिति ही क्यों उत्पन्न हो रही है कि सरकारें कुआं खोदना तब शुरू करती है, जब लोगों को प्यास लगती है ? या यूं कहें कि आखिर क्यों देश में ऐसी स्थिति बन गई है कि हम भोज के वक्त कोहड़ा की खेती शुरू करते हैं.

विफल सलाहकार-रणनीतिकारों की भीड़ जिम्मेदार 

अगर गौर करेंगे, तो पाएंगे कि इस हालात के पीछे की वजह कुछ और है. इन परिस्थितियों के लिए अदूरदर्शी सरकारें, अक्षम अधिकारियों का हुजूम और विफल सलाहकार-रणनीतिकारों की भीड़ ही जिम्मेदार है. पावर प्लांटों में कोयला संकट की बात करें, तो यह पिछले साल अक्टूबर महीने से ही है. फिर सरकार ने इस ओर  ध्यान क्यों नहीं दिया?  क्यों नहीं पहले से ही बिजली उत्पादन के लिए ज्यादा से ज्यादा कोयला पावर प्लांटों तक पहुंचाने की शुरुआत की गई.

केंद्र सरकार में हर मामले में देर से जगने की प्रवृत्ति बढ़ चली है!

क्या केंद्र सरकार में हर मामले में “देर से जगने” की प्रवृत्ति बढ़ चली है या क्या सरकार इस योजना के तहत हर काम करने लगी है कि पहले संकट को नजरअंदाज करो, फिर उससे निपटने के लिए अभियान चलाओ और उनके प्रचार अभियान को अलग अंदाज में पेश करके सरकार की मार्केटिंग करो ?  बहरहाल, यह स्थिति एक देश, राज्य या एक सरकार के लिए शर्मनाक है. [wpse_comments_template]

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