Search

 
 
 

ओ जेरूसलम!  घर से इतनी दूर भारतीय मजदूर क्यों मर रहा है?

इजरायल जेरूसलम में एक भारतीय घरेलू कामगार की बेरहमी से हत्या- यह सिर्फ एक अपराध की घटना (crime story) नहीं है. यह उस भारत की कहानी है जिसके लाखों लोग अपने परिवार को पालने के लिए अपना घर-गांव छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर निकल रहे हैं. अक्सर ऐसी जगहों पर, जहां युद्ध चल रहा है, मिसाइलें गिर रही हैं और जान की कोई गारंटी नहीं.
 
टिप्पणी

Prakash K Ray

इजरायल जेरूसलम में एक भारतीय घरेलू कामगार की बेरहमी से हत्या- यह सिर्फ एक अपराध की घटना (crime story) नहीं है. यह उस भारत की कहानी है जिसके लाखों लोग अपने परिवार को पालने के लिए अपना घर-गांव छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर निकल रहे हैं. अक्सर ऐसी जगहों पर, जहां युद्ध चल रहा है, मिसाइलें गिर रही हैं और जान की कोई गारंटी नहीं.

 

राजीव आचार्य (40) पश्चिम बंगाल के गोरखा समुदाय से थे. वे इजरायल में एक बुजुर्ग दंपति की देखभाल करते थे. आरोप है कि उसी परिवार के 31 वर्षीय पोते ने 23 जुलाई को धारदार हथियार से उन पर हमला कर दिया. उन्होंने बहुत खून बहने के चलते दम तोड़ दिया. आरोपी पर पूर्व चिन्हित हत्या का मुकदमा चल रहा है.

 

तेल अवीव में गोरखा समुदाय ने मोमबत्ती जलाकर प्रार्थना सभा की. सारा पेरी नाम की एक caregiver-support agency से जुड़ी महिला ने कहा- “जब युद्ध था, आप हमारे साथ खड़े रहे. आपने सुरक्षित देश लौटने की बजाय बूढ़ों की देखभाल के लिए यहीं रहना चुना. अब हमें आपका साथ देना चाहिए.” 

 

राजीव की पत्नी, दो बच्चे और माता-पिता हैं. वे इजरायल में पिछले पांच साल से काम कर रहे थे.

 

यह अकेली कहानी नहीं है. यह सवाल सिर्फ राजीव का नहीं है. इजरायल में 14,000 से 20,000 भारतीय caregivers काम करते हैं. हजारों और हैं जो construction, farming और दूसरे क्षेत्रों में हैं. 

 

और यह सिर्फ इजरायल नहीं. भारत की overseas workforce विशाल है. विश्व बैंक के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत को विदेश में काम कर रहे अपने कामगारों से लगभग $150 बिलियन (करीब ₹13 लाख करोड़) remittances मिले. 

 

भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा remittance पाने वाला देश है. लेकिन इन डॉलरों के पीछे दुबई की 55 डिग्री की गर्मी में खड़ा मजदूर है, सऊदी अरब में कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करता राजमिस्त्री है, कतर में ड्राइवर है, इजरायल में किसी बूढ़े को नहलाता-खिलाता केयरगिवर (caregiver) है.

 

होर्मूज की खाड़ी में खतरा

इसी साल हमने इसका दूसरा चेहरा देखा. होर्मूज (Hormuz) के आसपास इंटरनेशनल शिपिंग (international shipping) पर हमले बढ़े हैं. एक जहाज पर 22 क्रू (crew) में 21 भारतीय थे. IRGC ने उन पर RPG से हमला किया.

 

जुलाई 2026 में 30 भारतीय सीफेयर्स (seafarers) वाले दो जहाजों पर हमला हुआ. एक भारतीय की मौत हो गई, कई घायल हुए. इसके बाद भारत सरकार को सलाह (advisories) जारी करनी पड़ी कि भारतीय सीफेरर्स (Indian seafarers) को होर्मूज (Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर तैनाती (deploy) न किया जाए. 15,000 से ज्यादा भारतीय seafarers Strait के पश्चिम में फंसे बताए गए.

 

भारत दुनिया के सबसे बड़े seafarer-supplying देशों में है. तीन लाख से ज्यादा भारतीय नाविक दुनिया के समुद्री जहाजों पर काम करते हैं.

 

तो आदमी क्यों जाता है?

क्योंकि बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान या झारखंड के एक आम परिवार के सामने अक्सर चुनाव यह नहीं होता- “भारत में सुरक्षित नौकरी या विदेश में खतरनाक नौकरी.” चुनाव अक्सर यह होता है- यहां  बेरोजगार रहो अथवा बाहर जाकर जोखिम उठाकर इतना कमाओ कि घर बन जाए, बच्चों की फीस भर जाए, बहन की शादी हो जाए, बूढ़े मां-बाप का इलाज हो जाए.

 

इसीलिए युद्ध के बीच भी लोग इजरायल के कंस्ट्रक्शन सेक्टर (construction sector) में जाने को तैयार मिल जाते हैं. इसीलिए होर्मूज (Hormuz) में मिसाइलों के बीच टैंकर (tanker) चलाने वाले जहाज पर भारतीय मिलता है. इसीलिए अरब की तपती दोपहर में स्कैफलोडिंग (scaffolding) पर भारतीय मजदूर मिलता है.

 

$150 बिलियन भेजने वाले की जान की कीमत

यह सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए कि विदेशों से धन (remittance) पर हमें गर्व है तो डॉलर (remittance) भेजने वाले आदमी की जान की कीमत क्या है?

 

जब $150 बिलियन सालाना घर भेजने वाला यह विशाल समुदाय हमारी अर्थव्यवस्था के लिए इतना महत्वपूर्ण है, तो उसकी सुरक्षा विदेश नीति का peripheral consular issue कैसे हो सकती है?

 

राजीव आचार्य की हत्या को इसलिए केवल जेरूसलम में हुई एक हत्या समझकर भूल जाना आसान होगा.  मुश्किल सवाल यह है कि जिस देश की अर्थव्यवस्था को उसके प्रवासी कामगार सालाना लाखों करोड़ रुपये भेज रहे हैं, वहां से इतनी बड़ी संख्या में लोग परिवार से दूर, युद्ध और असुरक्षा के बीच, रोजी कमाने क्यों निकल रहे हैं?

 

मार्क्स और एंगेल्स ने डेढ़ सौ साल पहले लिखा था- "The working men have no country." यानी काम करने वालों मजदूर का कोई देश नहीं होता. आज का भारतीय मजदूर शायद इसका एक नया अर्थ लिख रहा है- देश उसका जरूर है. घर भी उसका है. मां-बाप, पत्नी और बच्चे भी उसके हैं. बस रोजी-रोटी उसके देश में नहीं है.

 

और इसलिए कभी वह दुबई में है, कभी दोहा में, कभी तेल अवीव और जेरूसलम में और कभी होर्मूज की खाड़ी में किसी जहाज के डेक पर आसमान से आती मिसाइल को देख रहा है. उसके भेजे डॉलर हमारे विदेशी मुद्रा खाते में दर्ज हो जाते हैं. उसका डर, उसका अकेलापन और उसकी जान का जोखिम किसी GDP table में दर्ज नहीं होता.

 

डिस्क्लेमरः लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया एकाउंट एक्स से साभार लिया गया है. 

Comments
Leave a Comment
Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही