
बैजनाथ मिश्र
नीट पर्चा लीक मामले पर मचा कोहराम थम गया है. लेकिन इस पूरे प्रकरण में जो सवाल तैर रहे हैं, उनके जवाब मांगे, ढ़ूंढ़े जा रहे हैं. पहला सवाल तो यही है कि भाजपा के आत्ममुग्ध चाणक्य हैं कहां? न तिलचट्टों के उपद्रव के दौरान कहीं कुछ करते दिखाई दिये, ना ही लोकसभा में उस धांसू विधेयक पर बहस के दौरान जिसके बारे में सरकार कह रही है कि अब पर्चा लीक नहीं होगा. इस विधेयक के जरिये ऐसा कठोर कानून बनाया गया है कि धंधेबाजों की रूह कांप जाएगी. अगर ऐसा ही है तो यह कानून पहले क्यों नहीं बना दिया गया?
दूसरी बात यह है कि यदि अपराधी कानून से डरते तो अपराध करते ही क्यों, अदालतों की संख्या हर साल कम क्यों पड़ जाती? हमारे देश में कानून से डरनेवालों की संख्या दिनानुदिन घटती जा रही है. कानून का खौफ खत्म हो गया है. हत्या के मामले में आजीवन कारावास या फांसी से कम की सजा का प्रावधान नहीं है. लेकिन यह सजा मिलती कितने आरोपितों को है? फिर भी सरकार कह रही है कि नये कानून के बाद पर्चा लीक नहीं होगा तो इसके परीक्षण यानी भविष्य की परीक्षाओं तक मान लेना चाहिए.
लेकिन इससे क्या गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली में हुए उपद्रवों की जवाबदेही से बच जायेंगे? दिल्ली की कानून व्यवस्था उनके ही हाथों में है. फिर जंतर-मंतर पर तिलचट्टों से लेकर गुंडों मवालियों की भीड़ जमा कैसे हो गयी? अदालती आदेश के मुताबिक वहां एक हजार से अधिक लोग एक साथ एकत्र नहीं हो सकते. फिर दस हजार की अनियंत्रित नेतृत्वविहीन भीड़ वहां पहुंची कैसे? क्या इतने बड़े जमावड़े की भनक दिल्ली पुलिस और खुफिया महकमे को नहीं लगी?
जब संसद मार्च की घोषणा हो गई, तब भी उनकी नींद क्यों नहीं खुलीं? शाहीनबाग और दिल्ली दंगे जैसी घटनाएं भी अमित शाह के गृह मंत्री रहते ही हुईं. इसके बावजूद उनमें सरकार पटेल की छवि निहारने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है. सही है कि वह चुनाव जिताने के फन में माहिर हैं. इस कला में पारंगत तो धर्मेंद्र प्रधान भी हैं. हरियाणा और बिहार के चुनाव परिणाम प्रधान के चुनाव प्रबंधन के प्रमाण हैं. लेकिन जब पर्चा लीक का ठीकरा उनके सिर फोड़ कर उनसे इस्तीफा इसलिए लिया गया कि वह शिक्षा मंत्री थे तो दिल्ली में तांडव के लिए उत्तरदायी अमित शाह अपनी कुर्सी पर क्यों जमे हुए हैं?
इसलिए यदि राहुल गांधी उनका त्याग पत्र मांग रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? गलत यह है कि राहुल शाह का इस्तीफा इसलिए नहीं मांग रहे हैं कि वह मामले की भयावहता को आंकने और तदनुरूप व्यवस्था करने में विफल रहे. राहुल गृह मंत्री का इस्तीफा इसलिए मांग रहे हैं कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली क्यों चलायी और बर्बरता क्यों की? यदि राहुल छुटभैये नेता होते और ऐसी मांग करते तो उनका दूध-भात मान लिया जाता, लेकिन वह नेता प्रतिपक्ष हैं. उन्हें प्रमाण सहित अपनी बात रखनी चाहिए. वह चाहते तो अमित शाह की काबिलियत पर प्रामाणिक आरोप लगाते हुए इस्तीफा मांग सकते थे. लेकिन वह इस आधार पर इस्तीफा मांग रहे हैं कि प्रदर्शनकारियों पर गोली उनके आदेश से चली जो सरासर झूठ है.
यदि गोली चली और किसी को लगी होती तो सोशल मीडिया के हजारों चमकते कैमरों में वह घटना कैद जरूर होती. कांग्रेस अध्यक्ष खरगे राज्य सभा में यह कह रहे हैं कि अमित शाह को घसीटकर बाहर निकालेंगे. केवल इस भाषा पर गौर कीजिए. हालात समझ जाइएगा. दिल्ली पुलिस ने गोली चालन की घटना से साफ इनकार किया है. यदि मान भी लिया जाये कि पुलिस ने गोलियां चलायी तो उसने गलत क्या किया और यह गृह मंत्री के इस्तीफे का आधार कैसे हो सकता है? देश में ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत है, जो मानते हैं कि संसद की सुरक्षा में लगे सवा सौ जवानों के घायल होने के बाद भी गोली नहीं चली तो वहां तैनात अधिकारियों से जवाब तलब किया जाना चाहिए.
यदि अयोध्या में विवादित ढ़ांचे को बचाने के लिए गोलियां चलाना जायज है और संसद में खम ठोंककर कहा जा सकता है कि जो ऊपर चढ़े वे जीवित नीचे नहीं उतर पाये तो फिर संसद की सुरक्षा के लिए गोलियां चलाना गलत कैसे होता? क्या नवंबर 1966 में संसद में घुसने की कोशिश में उग्र हुए साधुओं-संन्यासियों पर गोलियां नहीं चली थीं? संसद हमारे लोकतंत्र का मंदिर है. इसकी रक्षा हर हाल में होनी ही चाहिए.
राहुल गांधी और दूसरे नेता वस्तुतः भावना के खिलाफ बोल रहे हैं. उनकी चिंता यह है कि जो मोर्चा उन्होंने खोला था उस पर विजयी झंडा तिलचट्टों ने फहरा दिया है और वह भी केजरीवाल के सहयोग से. सच कहें तो इसमें केंद्र सरकार भी मददगार रही है. वह चाहती तो ठप्प पड़ी संसद के सुचारू संचालन के लिए विपक्षी नेताओं की बैठक बुलाती और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करवा देती. लेकिन हमारी संसदीय परंपरा का दुर्भाग्य है कि सरकार विपक्ष के आगे झुकने से इनकार करती है और तिलचट्टों को तेल लगाती है.
सरकार विपक्ष को क्रेडिट देना ही नहीं चाहती है और विपक्ष सदन में अपने धारदार तर्कों से सरकार को निरूत्तर करने के बदले केवल धूम धड़ाके से स्कोर हासिल करने में विश्वास करता है. पर्चा लीक के खिलाफ विधेयक पर ही बहस के दौरान कांग्रेस, सपा वगैरह के किस वक्ता ने कहा कि इसमें क्या-क्या खामियां हैं और उन्हें कैसे ठीक किया जाना चाहिए. राहुल गांधी ने विधेयक पर बोलते हुए इडियट तक कह दिया. पता नहीं उन्होंने इडियट तिलचट्टों को कहा या प्रधानमंत्री को या उन 23 करोड़ वोटरों को जिन्होंने मोदी को वोट दिया. लेकिन पता नहीं क्यों वे जब भी बोलते हैं सब गुड़ गोबर कर देते हैं.
बहरहाल अब बात ठहर गयी है कि प्रदर्शन के दौरान उत्पात मचानेवालों पर से मुकदमे वापस होंगे या नहीं? इस बारे में शीर्ष अदालत का कहना है कि जिनके खिलाफ पहले से आपराधिक मामले हैं, उनके विरूद्ध मुकदमा चलेगा. तिलचट्टे कह रहे हैं कि सभी मुकदमे वापस होने चाहिए. सरकार ने भी ऐसा आश्वासन दिया है. अब इस तिलचट्टा गिरोह को कौन समझाए कि बिना न्यायिक समीक्षा के मुकदमे वापस नहीं होते.
जिन जवानों के सिर फटे हैं, हाथ टूटे हैं, उनके परिजनों ने भी अदालत में अर्जी लगायी है. क्या वे देश के नागरिक नहीं हैं और उन्हें कानूनी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए? फिर वे संसद की सुरक्षा के क्रम में घायल हुए हैं, अपनी ड्यूटी निभाते हुए. तिलचट्टों के प्रवक्ता को सुप्रीम कोर्ट का आदेश मंजूर नहीं है. उसके मुंह खून लग गया है. अब तिलचट्टे कह रहे हैं कि वे फिर धरना प्रदर्शन करेंगे. करें, उन्हें अधिकार है, लेकिन काठ की हांड़ी दुबारा नहीं चढ़ती है और सरकार की ढ़ील या शाह की शह पाकर वे जो कुछ कर चुके हैं, वह सहूलियत उन्हें नहीं मिलने वाली है.
जहां तक सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की बात है, वह काबिल-ए-गौर है. क्या इस निर्देश के आधार पर पहली बार अपराध करने वालों पर मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए? क्या एक बार अपराध करने की छूट सभी नागरिकों को है? पता नहीं क्यों न्याय के मंदिर में बैठे देवता संविधान की व्याख्या करते-करते संविधान भी लिखने लगते हैं. किसी भी मुकदमे का फैसला न्यायिक नजरिये से सबूतों के आधार पर होना चाहिए, न कि भावनाओं के आधार पर.
यह तिलचट्टा पार्टी भी मुख्य न्यायधीश के मुखारविंद से निकले कॉक्रोच शब्द से ही उत्पन्न हुई है. रही बात इस मुद्दे पर विपक्ष के रंग-ढ़ंग की तो वे आतंकवादियों के स्वागत के लिए लाल कालीन बिछाते रहे हैं, उनके मुकदमे भी वापस लेने की कोशिश करते रहे हैं, शातिर अपराधियों का सहयोग लेते और देते रहे हैं. इसलिए यदि वे जवानों पर पत्थर बरसानेवालों की मुकदमा वापसी की मांग कर रहे हैं तो इसमें आश्चर्यजनक कुछ नहीं है.
सरकार, विपक्ष, न्यायपालिका और प्रदर्शनकारी सब अपने-अपने हिसाब से चालें चल रहे हैं. लोकतंत्र में लक्ष्मण रेखा की चिंता किसी को नहीं है. सब अधिकार चाहते हैं. कर्तव्य का पाठ न किसी ने पढ़ा है, न पढ़ना चाहता है. ऐसा लगता है कि पूरे कुएं में भांग पड़ गयी है और सब अपने में मस्त हैं. शायद इन्हीं हालात पर संत कबीर ने कहा था- "साधो देखो जग बौराना, सांच कहे जग मारन धावै झूठ कहे पतियाना." देखना है कि इस बौराहट की खुमारी टूटती है या नहीं और अभी क्या-क्या होना बाकी है.
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