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ओलंपिक: वैश्विक उत्सव का दीर्घकालिक सफर

Ashok Pandey 1896 के साल ओलंपिक्स की आधिकारिक शुरुआत करने वाला फ्रेंच शिक्षाशास्त्री और इतिहासकार पीयर द’कूबेर्तां इन खेलों में महिलाओं की हिस्सेदारी के ज़रा भी पक्ष में नहीं था. मूल परिकल्पना यह  थी कि दुनिया भर में गोरी चमड़ी वाले उच्चकुलीन युवाओं के लिए एक खेल-महोत्सव आयोजित हो. जिन पुरातन ग्रीक महोत्सवों से प्रेरित होकर द’कूबेर्तां ने ओलंपिक्स का खाका बनाया था, उनमें से ज़्यादातर में स्त्रियों का भाग लेना वर्जित था. इसी तर्ज़ पर द’कूबेर्तां चाहता था कि इन खेलों के माध्यम से उनके देश फ्रांस की मिलिटरी सेवा के लिए युवा अफसरों को तैयार किया जा सके, जो आगे जाकर देश की सत्ता और तिजारत को सम्हालने का काम करें. तो पहले ओलंपिक्स में एक भी महिला खिलाड़ी को भाग लेने का मौक़ा न मिला.  द’कूबेर्तां की इस नीति का विरोध हुआ तो अगले ओलंपिक्स में महिलाओं को गोल्फ और टेनिस खेलने का मौक़ा दिया गया. 1904 के पेरिस ओलंपिक्स में कुल 22 औरतों ने हिस्सेदारी की, जिनमें से अधिकतर अमीर घरों की सोशलाईट महिलाएं थीं. अगले दो खेलों में औरतों को तीरंदाजी, स्केटिंग और जिम्नास्टिक्स को शामिल किया गया. इसके बावजूद महिलाएं इन खेलों में साज-सज्जा के सामान से अधिक नहीं समझी जाती थीं. पीयर द’कूबेर्तां किसी भी कीमत पर महिलाओं को मुख्य खेलों का हिस्सा बनाने का हिमायती न था. इस काम में उसकी मदद अमेरिका में रहने वाला उसका दोस्त और एक प्रभावशाली खेल-प्रशासक जेम्स सुलीवान भी करता था, जिसने बहुत चालाकी से कई मर्तबा महिलाओं की प्रतिस्पर्धाओं को एक्जीबीशन श्रेणी में रखने में कामयाबी पाई. 1912 के साल ‘रिव्यू ओलंपिक’ नाम की आधिकारिक पत्रिका में पीयर द’कूबेर्तां का एक लेख छपा जिसमें उसने साफ़ लिखा था कि शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण खेलों में भाग लेने वाली औरतें अपने स्त्रियोचित सौदर्य और कोमलता को तबाह कर लेती हैं. यानी उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. महिलाओं के तीरंदाजी में भाग लेने का विरोध करने वाले पीयर द’कूबेर्तां का मानना था कि ऐसा होने से एक ऐसा महान खेल भ्रष्ट हो जाएगा सदियों से जिस पर यूरोप के कुलीन अमीरों का एकाधिकार था. 1914 में सुलीवान मरा तो पीयर द’कूबेर्तां अकेला पड़ने लगा. तब तक महिलाएं स्वीडन में हुए 1912 ओलंपिक्स में तैराकी में हिस्सा ले चुकी थीं. 1917 में फ्रांस की नेशनल एथलेटिक्स चम्पियनशिप के दौरन द’कूबेर्तां को जीवन का सबसे बड़ा सदमा लगा जब उनके देश की एक बेहद जुझारू महिला एथलीट वायोलेटा मॉरिस ने शॉटपट में अच्छा प्रदर्शन करने की नीयत से अपनी सर्जरी के माध्यम से अपनी छातियाँ निकलवा ली थीं. वायोलेटा मॉरिस न केवल शॉटपट फेंकती थी, वह तैराकी, फुटबॉल, बॉक्सिंग, साइकिलिंग, घुड़सवारी, टेनिस, वेटलिफ्टिंग और कुश्ती जैसे तमाम खेलों में महारत रखती थी. बॉक्सिंग रिंग में उसे अक्सर आदमियों से लड़ना होता क्योंकि दुनिया में गिनती की महिला बॉक्सर थीं. इन टक्करों में अक्सर वायोलेटा को जीत मिलती थी. वायोलेटा और उसके सनसनीखेज़ जीवन पर फिर कभी ! इधर दुनिया भर की  महिला खिलाड़ियों के अधिकारों की पैरवी करने वाले संगठन मजबूत हो रहे थे और बूढ़े हो रहे द’कूबेर्तां की पकड़ कमजोर पड़ रही थी. महिलाओं के लिए अलग से ओलंपिक्स तक आयोजित होने लगे थे. ओलंपिक्स का असल आकर्षण दौड़ में होता है, लेकिन महिलाओं को उनमें हिस्सा लेने के लिए 1928 तक का इंतज़ार करना पड़ा, जब उनके लिए पहली बार 100 मीटर और 800 मीटर की प्रतिस्पर्धाएं आयोजित की गईं. हर ओलंपिक में हर जगह पहुंचने वाला ‘फादर ऑफ़ ओलंपिक गेम्स’ द’कूबेर्तां इन दौड़ों को देखने नहीं गया. 800 मीटर की प्रतियोगिता ख़त्म होने के बाद  दुनिया भर के अखबारों में गलत रिपोर्टिंग की गई कि इतनी ‘लम्बी’ रेस के बाद ज्यादातर महिलाएं बेतरह बीमार और पीली पड़ गई थीं. सच यह था कि सभी नौ खिलाड़ियों ने अपनी रेस पूरी की थी और वैसा कुछ नहीं हुआ था. एक बार फिर से द’कूबेर्तां के सिद्धांत को जितवा दिया गया कि औरतें दौड़ों के लिए नहीं बनी हैं. ओलंपिक्स की सूची में से महिलाओं की 100 मीटर दौड़ को छोड़ सारी बाकी रेस हटा दी गईं. कहा गया कि इससे अधिक भागने पर महिला की मौत भी हो सकती है. 1948 में उन्हें 200 मीटर दौड़ने की इजाज़त मिली. 400 और 800 मीटर की दौड़ों तक पहुंचने में तीन-चार ओलंपिक्स और लगे. आप यकीन करेंगे 1972 तक ओलंपिक कमेटी यकीन करती थी कि औरतें 800 मीटर से अधिक भाग सकने में सक्षम नहीं होतीं. उस साल के म्यूनिख ओलंपिक्स में पहली बार उन्होंने 1500 मीटर की रेस दौड़ी, जिसमें सोवियत रूस की लुडमिला ब्रागीना ने सोने का तमगा हासिल किया. यह तब था जब बॉबी गिब और कैथरीन स्वाईटजर जैसी जांबाज़ औरतें दस बरस से मैराथन दौड़ रही थीं और आदमियों को पछाड़ रही थीं. पुरुषों की मैराथन 1896 में शुरू हो गई थी. अठ्ठासी बरस बाद यह दौड़ महिलाओं के लिए 1984 में खोली गई. जिस औरत को पीयर द’कूबेर्तां 100 मीटर दौड़ने के काबिल नहीं समझता था, उसने बयालीस किलोमीटर की दौड़ में कीर्तिमान बनाने शुरू किये. मैराथन से भी लम्बी दूरी की दौड़ों में आज महिलाएं खूब हिस्सा लेती हैं. अमेरिका की कामिल हेरन के नाम ऐसे-ऐसे रेकॉर्ड्स हैं कि आप हैरान रह जाएंगे. उसने पौने ग्यारह घंटे लगातार भागकर 100 मील की रेस में वर्ल्ड रेकॉर्ड बनाया है. 24 घंटे, 48 घंटे और छः दिन वाली अलग-अलग दौड़ों के भी सारे रेकॉर्ड उसी के नाम हैं. इस साल मार्च में उसने 900 किलोमीटर से ज्यादा दौड़ने का कारनामा अंजाम दिया है. इधर कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर पिछले 128 सालों के ओलंपिक इतिहास में महिला खिलाड़ियों की बढ़ती संख्या को दिखा रहा एक ग्राफिक वाइरल है. ग्राफिक बताता है कि जिस पेरिस में 1900 के ओलंपिक खेलों में महिला खिलाड़ियों का प्रतिशत 2 प्रतिशत था, उसी पेरिस में इन दिनों हो रहे खेलों में यह प्रतिशत ठीक 50% हो गया है. इन खेलों में किसी औरत को किसी भी प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेते हुए देखें तो उसकी उन तमाम पुरखिनों को ज़रूर याद करें, जिनकी जिद और अथक श्रम के कारण उन्हें उस मैदान पर कदम रखने का मौक़ा मिला है, जहां उन्हें न उतरने देने के लिए खब्ती बूढ़े मर्द बेसिरपैर के तर्क लाते थे. अगर उनकी कृपा से वे मैदान में पहुंच भी जाती थीं तो उनके लिए यहां तक नियम बनाये जाते थे कि उनकी निक्कर के घुटनों से कितने इंच का कितना हिस्सा ऊपर होते ही वे डिसक्वालीफाई कर दी जाएंगी. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. 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