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'एक देश एक चुनाव' : मास्टर स्ट्रोक बनाम सियासत

Nishikant Thakur अब तो सच में ऐसा लगने लगा है कि संसद में और उसके प्रचार में भाजपा का जो नारा था `चार सौ पार` वह तो नहीं हो सका, लेकिन इतना तो संकेत मिलने लगा है कि संविधान में किसी न किसी प्रकार से संशोधन अवश्य किया जाएगा. क्योंकि, संसद के आगामी सत्र के लिए सरकार द्वारा यह निर्णय ले लिया गया है और जिसे मोदी कैबिनेट ने पास भी कर दिया है कि `एक देश एक चुनाव` के विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया जाएगा. फिर संसद से पास कराने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा. लेकिन, पेंच यह है कि संसद के दोनों सदनों में भाजपा या सत्तारूढ़ दल के पास इतना बहुमत है कि यह विधेयक `एक देश एक चुनाव` का पास होकर कानून बन जाए? हां, ऐसा आपने देश में आजादी के बाद पहले चुनाव के बाद बहुत दिनों तक `एक देश एक चुनाव` होता रहा, लेकिन लोकसभा और विधानसभा बीच में भंग हो जाने के कारण यह क्रम टूट गया. फिर प्रतिवर्ष देशभर में चुनाव होते रहे, जिसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता रहा. एक बात यहां जान लेना आवश्यक है कि उस समय देश की आबादी 38 करोड़ ही थी, जिनमें अधिकाश अपना नाम भी नहीं लिख सकते थे. पं. जवाहरलाल नेहरू ने चाहा था कि अगले वर्ष बसंत तक चुनाव करा लिए जाएं, लेकिन देश में एकमुश्त चुनाव कराने के लिए किसे इसकी जिम्मेदारी सौंपी जाए. फिर बंगाल कैडर के आईसीएस सुकुमार सेन पर इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई. इस दुरूह कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने के लिए सुकुमार सेन को पद्मभूषण से सम्मानित किया. देश का पहला चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से फरवरी 1952 के बीच सम्पन्न हुआ. आज भी देश में बहुत कम लोगों को मालूम होगा देश का पहला चुनाव किस चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में संपन्न कराया गया था. पिछले दिनों मीडिया को जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री अश्वनी वैष्णव ने कहा कि संसद के शीतकालीन सत्र में यह `एक देश एक चुनाव` विधेयक लाया जाएगा, लेकिन इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा. अभी अगले कुछ महीनों के दौरान किस तरह से इस विधेयक को लागू किया जाए, इस पर देशभर में इसके उपायों पर चर्चा होगी. उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ गठबंधन के 32 पार्टियां इसके पक्ष में हैं, जबकि विपक्ष के 15 दल भरी समर्थन में हैं. यह ठीक है कि पूर्व राष्ट्रपति द्वारा दी गई रिपोर्ट में एक साथ चुनाव के विभिन्न गुण—दोषों पर चर्चा की गई होगी, लेकिन आज जब एक वर्ष में देश के कई राज्यों में चुनाव होते रहते हैं, फिर यह कैसे होगा. तो क्या विधानसभा या लोकसभा का चुनाव तब तक लटका रहेगा, जब तक कि देश में एक साथ चुनाव कराने की मियाद पूरी नहीं हो जाती! यदि किसी राज्य का विधानसभा किसी कारण से भंग हो जाता है, तो फिर ऐसी स्थिति में क्या होगा, यह प्रश्न बड़ा ही उलझाने वाला है. क्या इतने समय तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू रहेगा? आज तक जो लागू संविधान है, उसके अनुसार छह महीने के अंदर अंदर चुनाव करा लिए जाते हैं, तो इस नियम का क्या होगा? डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि इस समय की विशेषता यह भी है कि देश के महत्वाकांक्षी मध्य वर्ग के बीच लोकतंत्र के प्रति घृणा कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है. वैसे तो इस तबके के कुछ लोग हमेशा से ही भारत में कड़े मिलिट्री शासन की फैंटेसी पालते रहे हैं, लेकिन पिछले दो तीन दशक में ऐसे लोगों की तादात ही नहीं, ताकत में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. लोकतंत्र को देश के विकास में बाधक मानने की सोच तेजी से फैली है. जैसा कि अज्ञान और मूर्खता से उत्पन्न आत्मविशास के हर संस्करण के साथ होता है, ऐसी सोच और सच्चाइयों को सुविधानुसार आंखे मूंदी रहती है. इस बात को भुला देने कि पुरजोर कोशिश की जा रही है कि लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि संस्थाओं, मर्यादाओं और परंपराओं के आधार पर चलने वाली व्यवस्था है. यह अल्पमत के साथ सम्मानपूर्वक संवाद करने वाली व्यवस्था है. बहुमत को मनमानी की छूट देनेवाली का साधन-संपन्न लोगों के मनोरंजननार्थ चलने वाली डिबेटिंग सोसाइटी नहीं.अब इसमें संदेह नहीं कि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हजारों पन्नों की रिपोर्ट सौंपी है, उसमें एक साथ सभी चुनाव कराने के गुण-दोषों पर बात नहीं की गई है. लेकिन, विपक्षियों द्वारा सरकार द्वारा फैलाया गया मुद्दा केवल सत्तारूढ़ द्वारा उछाला गया महज एक शिगूफा है, जो देश में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सके. यह आरोप विपक्ष इस आधार पर लगा रहा है, क्योंकि सत्तारूढ़ दल को अपने खुफिया सूत्रों से जानकारी मिल चुकी है कि आगामी विधानसभा चुनावों में उसकी हार होने जा रही है, इसलिए वहां की जनता के मन में सत्तारूढ़ के प्रति सहानभूति जागे और वे उनके पक्ष में मतदान करे. वैसे, विपक्ष यह कह रहा है कि जब लोकसभा और राज्यसभा में उनका बहुमत है ही नहीं, फिर सत्तारूढ़ दल किस प्रकार अधिनियम लाकर उसे पास कराकर कानून बनाने की सिफारिश कर सकेगा! इसलिए भाजपा का यह कहना संविधान में संशोधन करके कानून बनाकर `एक देश एक चुनाव` को कैसे मूर्त रूप दे सकेगा! क्योंकि, विपक्ष का आज भी यही कहना है कि भाजपा की शुरू से ही झूठ बोलकर समाज को गुमराह करने की आदत रही है, इसलिए इस बार भी नए जुमले के साथ जनता की सोच को भ्रमित करने के लिए `एक देश एक चुनाव` का नारा दिया जा रहा है और कहा जा रहा कि शीतकालीन सत्र के दौरान इस विधेयक को लेकर संविधान में संशोधन किया जाएगा. अब देश की जनता को यह देखना है कि इस पर सत्ताधारी भाजपा को जीत मिलती है या फिर विपक्ष अपनी रणनीति के तहत इस अधिनियम को लागू होने को रोक पाता है. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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