
श्रीनिवास
जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व में गंठबंधन सरकार है, उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री हैं. मगर कहने भर को. शासन 'दिल्ली' से संचालित होता है, वाया उप राज्यपाल. इसका मुजाहिरा कल एक बार फिर हुआ! पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाये जाने की सातवीं सालगिरह थी.
एनडीटीवी की खबर है कि इस मौके पर सिर्फ भाजपा ने जश्न मनाया, बल्कि सिर्फ भाजपा को ही प्रदर्शन की अनुमति मिली. नेशनल कांफ्रेंस सहित अन्य दल 5 अगस्त को 'काला दिवस' के तौर पर मनाते हैं. कथित सत्तारूढ़ दल नेशनल कांफ्रेंस को जुलूस निकालने की इजाजत नहीं मिली.
भाजपा 'स्वाभाविक' ही अनुच्छेद 370 हटने के बाद के सात वर्षों को जम्मू-कश्मीर में शांति और विकास का दौर मानती है. राज्य (जिसका राज्य का दर्जा निरस्त कर दिया गया है) की अधिसंख्य आबादी जो भी मानती हो.
'जो सत्तर सालों में नहीं हुआ’ वह सब करने का दावा करने वालों ने एक और खास काम कश्मीर में किया. आजादी के बाद अनेक नये राज्य बने. कुछ राज्यों को विभाजित कर अलग राज्य बनाया गया. किसी केंद्र शासित राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला. मगर ऐसा पहली बार हुआ कि एक पूर्ण राज्य (जम्मू- कश्मीर) को विभाजित कर दो टुकड़े किये गये!
लद्दाख को केंद्र शासित इकाई बना दिया गया, जहां कोई स्थानीय चुनाव भी नहीं होता, शासन एलजी के माध्यम से केंद्र के अधीन! जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित राज्य बना दिया गया! इस तरह वह अब भी 'राज्य' तो कहलाता है, चुनाव भी होते हैं! स्थानीय लोग और दल पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करते रहे हैं. केंद्र ‘जल्द’ ही ऐसा करने का वादा भी करता रहा है, मगर इंतजार अंतहीन साबित हो रहा है!
पिछले चुनावों में नेशनल कांफ्रेंस की सरकार बनी, मगर वास्तविक सत्ता उप-राज्यपाल में निहित है. इसी कारण यह संभव हुआ कि पांच अगस्त को विपक्षी दल भाजपा को 'जश्न' मनाने के लिए प्रदर्शन की अनुमति मिली, मगर 'सत्ताधारी' नेशनल कांफ्रेंस को श्रीनगर में अपने पार्टी हेडक्वार्टर से विरोध मार्च निकालने की इजाजत नहीं दी गयी! खबरों के मुताबिक, पार्टी नेताओं और विधायकों ने पार्टी ऑफिस के अंदर ही धरना दिया, क्योंकि पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स ने सुबह ही पार्टी मुख्यालय का मुख्य गेट बंद कर दिया था.
जम्मू-कश्मीर के 'मुख्यमंत्री' की हैसियत क्या है, यह एक वर्ष पहले भी दिखा था, जब उमर अब्दुल्ला को अपने आवास से निकलने नहीं दिया गया था! 13 जुलाई 2025 को ‘शहीद दिवस’ (जो 1931 में डोगरा सेना की गोली से मारे गये 22 कश्मीरियों को श्रद्धांजलि देने के लिए मनाया जाता रहा है) के मौके पर उमर अब्दुल्ला और नेशनल कांफ्रेंस व पीडीपी के कई नेता श्रीनगर के ‘नक्शबंद साहिब मजार-ए-शुहदा’ कब्रिस्तान जाना चाहते थे. एलजी मनोज सिन्हा के प्रशासन ने पुलिस के जरिए उमर अब्दुल्ला, कैबिनेट मंत्रियों और महबूबा मुफ्ती के घरों के गेट ताले लगा कर बंद कर दिये! उमर अब्दुल्ला ने बाद में बताया कि कंट्रोल रूम को बताने के कुछ मिनट बाद ही उनके आवास के बाहर कंटीले तार और सीआरपीएफ बंकर लगा दिये गये!
अगले दिन 14 जुलाई 2025 को उमर अब्दुल्ला ने बिना किसी को बताये निकलने का फैसला किया. वे अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ पैदल गये. कब्रिस्तान का गेट बंद मिला तो उमर, उप मुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी और अन्य नेताओं ने दीवार फांद कर अंदर प्रवेश किया. पुलिस से हल्की झड़प भी हुई. उमर अब्दुल्ला ने वीडियो शेयर करके पूछा : "ये 'कानून के रक्षक' बताएं कि किस कानून के तहत हमें फातिहा पढ़ने से रोका जा रहा था?"
यह भी जान लें कि 13 जुलाई को पहले जम्मू-कश्मीर में राजकीय अवकाश होता था. 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद इसे सरकारी छुट्टियों की लिस्ट से हटा दिया गया. 2020 से ही एलजी प्रशासन नेताओं को वहां जाने से रोक रहा है.
विरोधी दलों के सांसदों-विधायकों को किसी तरह तोड़ कर खरीद कर उन राज्यों, जहां अपना आधार नहीं है या अपेक्षा के अनुरूप नहीं है, की सत्ता को नियंत्रित करने में महारत हासिल कर चुकी भाजपा को अभी तक कश्मीर में पूरी सफलता नहीं मिली है! तो इसका उपाय शायद यह निकाला गया है कि भले ही सरकार किसी की हो, होगा वही, जो हम चाहते हैं! खुद सरकार का दावा है कि अब कश्मीर अलगाववाद और आतंकी हिंसा की समस्या से मुक्त हो चुका है, फिर भी बहाना शायद यही होगा- खतरा बरकरार है! तो फिर जश्न किस बात का मना रहे हैं!
कश्मीर से धारा 370 जनसंघ के समय से इनका प्रमुख मुद्दा रहा है. यह उसे पूरा करने की खुशी है, यह तो समझ में आता है. मगर लगभग ऐसे ही विशेष प्रावधान अनुच्छेद 371 के तहत अनेक राज्यों में लागू है. पूर्वोत्तर के शायद ही किसी राज्य में शेष भारत का कोई नागरिक जमीन खरीद सकता है. नागालैंड जाने के लिए तो पूर्व अनुमति देनी पड़ती है. 2005 में मुझे लेनी पड़ी थी, अभी की स्थिति नहीं जानता! अरुणाचल प्रदेश के चीन से लगती सीमा के क्षेत्रों जाने के लिए प्रशासन की अनुमति चाहिए. पर उन राज्यों में जारी ऐसी पाबंदियां भाजपा के लिए मुद्दा नहीं हैं! तो क्या यह सिर्फ ‘अब्दुल को टाइट’ करने का जश्न था?
जो भी हो, यह समझ से परे है कि उमर अब्दुल्ला अब भी 'मुख्यमंत्री' पद से किस मोह में और क्यों चिपके हुए हैं?
डिस्क्लेमर : यह लेखक के निजी विचार हैं...
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