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Opinion : इंसान का सब्र छुट्टी पर चला गया है

व्हाट्सऐप ने संदेशों की रफ्तार बढ़ा दी, और इंसान का सब्र छुट्टी पर चला गया! इंतजार सहने की औकात खत्म कर दी. एक जमाना था जब कॉलेजों में नोटिस बोर्ड ही हमारी "नोटिफिकेशन" हुआ करता था. बच्चे दिन में एक-दो बार उसे देख लेते थे और फिर आराम से अपनी पढ़ाई में लग जाते थे.
 

Vinay Bharat

 

व्हाट्सऐप ने संदेशों की रफ्तार बढ़ा दी, और इंसान का सब्र छुट्टी पर चला गया! इंतजार सहने की औकात खत्म कर दी. एक जमाना था जब कॉलेजों में नोटिस बोर्ड ही हमारी "नोटिफिकेशन" हुआ करता था. बच्चे दिन में एक-दो बार उसे देख लेते थे और फिर आराम से अपनी पढ़ाई में लग जाते थे. 

 

आज नोटिस बोर्ड भी है, वेबसाइट भी है, लेकिन नवाबों को वो सब नहीं देखना होता. बस, whatsapp!  जैसे बाकी सब तो बस सजावट के लिए रखा हो. एक मैसेज छोड़ दिया. फोन करेंगे तो कम से कम good morning, thank you बोलना पड़ेगा. Whatsapp पर तो वो सब गैर जरूरी है.

 

आज मसला जानकारी का नहीं, इंतजार सहने की औकात का है. मैसेज भेजा नहीं कि उधर से ब्लू टिक चाहिए. ब्लू टिक आया तो जवाब चाहिए. जवाब आया तो तुरंत अगला जवाब चाहिए. जैसे सामने वाले की जिंदगी में कोई और काम है ही नहीं- न परिवार है, न नौकरी है, न ध्यान पूजा है, न किताबें  हैं, न बच्चों की परवरिश है. उसका एक ही धर्म है- व्हाट्सऐप पर आपको सेवा देना.

 

आलम तो यह है कि जनाब गुशलखाने में भी फोन साथ ले जाते हैं. लगता है जैसे अगर पांच मिनट के लिए व्हाट्सऐप से दूर हो गए, तो संयुक्त राष्ट्र की मीटिंग रुक जाएगी. साबुन इंतजार कर सकता है, पानी बहता रह सकता है, लेकिन रिप्लाई लेट नहीं होना चाहिए! अब तो dinning table पर भी पहले मोबाइल बैठता है, इंसान बाद में. और कभी-कभी तो मोबाइल ही ज्यादा शरीफ लगता है. 

 

जरा हम लोगों के नब्बे के दशक को याद कीजिए. खत लिखे जाते थे. पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्र एक शहर से दूसरे शहर पहुंचने में सात दिन लेते थे. जवाब लौटकर आने में फिर सात दिन. एक मुकम्मल बातचीत में पंद्रह दिन निकल जाते थे. मगर तब किसी को दिल का दौरा नहीं पड़ता था कि "अभी तक रिप्लाई क्यों नहीं आया?"

 


दोपहर की खामोशी में डाकिए के गिराए हुए एक लिफाफे की हल्की सी आवाज भी भीतर तक सुनाई दे जाती थी. हम उस आवाज को पहचानते थे, क्योंकि उसमें किसी अपने की आहट होती थी, इंतजार की शिद्द्त थी. आज संदेश सैकंडों में पहुंचते हैं, मगर रिश्ते सैकंडों में चिड़चिड़े हो जाते हैं.

 

तकनीक का इस्तेमाल कीजिए, उसके गुलाम मत बनिए. हर देर, बेरुखी नहीं होती, कभी-कभी सामने वाला बस अपनी जिंदगी जी रहा होता है, जो कि एक बहुत ही अजीब और दुर्लभ काम बन चुका है. हर इंसान की अपनी दिनचर्या होती है, काम, परिवार, किताबें, पूजा-पाठ, सैर, तन्हाई और खुद से मिलने का भी एक वक्त होता है.

 

जरा सब्र रखिए. जवाब थोड़ा देर से आएगा, तो दुनिया नहीं टूटेगी. लेकिन अगर सब्र चला गया, तो समझ लीजिए, आप लाश हैं जिसे इलेक्ट्रॉनिक Roller पर लगा दिया हो, जो हर blue tick पर tick-tick करता हो!

 

डिस्क्लेमर : लेखक डीएसपीएमयू के प्रोफेसर है और ये इनके निजी विचार हैं...

 

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