सवाल उठना लाजिमी है...
- क्रूड ऑयल सस्ता होने की वजह से जब तेल कंपनियों को भारी मुनाफा हो रहा था, तब उसका लाभ जनता को क्यों नहीं दिया गया?
- यू्क्रेन युद्ध के कारण जब रूस से सस्ता क्रूड ऑयल (डिस्काउंट पर) मिल रहा था, तब क्यों नहीं जनता को भी डिस्काउंट पर तेल दिया गया?
- जब तेल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया गया, तब इससे होने वाली लाभ की हिस्सेदारी जनता के बीच क्यों नहीं बांटा गया?
इन तथ्यों को समझना जरूरी है
साल 2014, जब भाजपा सत्ता में आयी. विकास के रथ पर सवार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. उस वक्त क्रूड ऑयल की कीमत 100-107 डॉलर प्रति बैरल (भारतीय बास्केट) थी. तब देश में पेट्रोल की कीमत 71 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत 56-57 रुपये प्रति लीटर थी.
साल 2015 में क्रूड ऑयल की कीमत में कमी आयी. याद कीजिये, तब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मेरी किस्मत से अगर ऑयल सस्ता हो गया है, तो इससे किसी को क्या दिक्कत हो सकती है. अगर मेरी किस्मत से देश को फायदा मिल रहा है, तो किसी को क्या दिक्कत हो सकती है. किसी को से उनका मतलब विपक्ष था.
रुस-यूक्रेन युद्ध के दौरान प्रतिबंधों की वजह से भारत को क्रूड ऑयल 55-60 डॉलर प्रति बैरल पर मिलता रहा. इससे तेल कंपनियों को भारी मुनाफा हुआ. लेकिन पेट्रोल डीजल के दाम में कभी कमी नहीं की गई.
आज का हाल क्या है. 13 मई को क्रूड ऑयल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 102-104 डॉलर प्रति बैरल है और पेट्रोल-डीजल की कीमत 93 से 100 के बीच (अलग-अलग राज्यों में) है. यह कीमत हाल के वर्षों की तूलना में ज्यादा है.
मार्केट एनालिस्ट ज्ञानेंद्र अवस्थी लिखते हैं,जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं, तो उसका लाभ आम आदमी की जेब तक पहुंचने के बजाय सरकारी तिजोरी और तेल कंपनियों के 'बैलेंस शीट' की शोभा बढ़ाता है. यह केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ की गई एक सुनियोजित धूर्तता है.
रिकॉर्ड मुनाफा: देश की सबसे बड़ी तेल रिटेल कंपनी ने FY24 से अब तक 82,000 करोड़ से अधिक का सामूहिक शुद्ध लाभ (Net Profit) कमाया है. अकेले मार्च 2024 में शुद्ध लाभ 43,161 करोड़ था, जो इस 'वसूली तंत्र' की सफलता का प्रमाण है.
एकतरफा त्याग: सरकार ने पिछले तीन वर्षों में गिरते तेल दामों का लाभ उपभोक्ताओं को कभी नहीं दिया. जनता ने 'महंगाई' झेली ताकि ये कंपनियां और सरकार अपना खजाना भर सकें.
नैतिक जिम्मेदारी: अब जब परिस्थितियाँ कठिन हैं, तो सारा बोझ फिर से 'त्याग' के नाम पर जनता पर डालना अनैतिक है. जिस तंत्र ने कम कीमतों के समय मुनाफाखोरी की, आज उसे ही यह घाटा (Hit) सहना चाहिए.
जनता को 'किफायत' का प्रवचन देना और खुद हज़ारों करोड़ के मुनाफे पर कुंडली मारकर बैठना किसी 'आर्थिक पाखंड' से कम नहीं है. विकास की नींव जनता की कमर तोड़कर नहीं, बल्कि सत्ता और निगमों की जवाबदेही से बननी चाहि.
ऐसे में सवाल यह कैसी देशभक्ति है. जब सस्ता क्रूड ऑयल मिल रहा था, तब इसका मुनाफा कंपनियों को मिल रहा था. सरकार चुप थी. और अब जब क्रूड ऑयल महंगा हो गया, तो आम लोगों से देशभक्ति के नाम पर कुर्बानी मांगी जा रही है.
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