भारत के चैनलों के शोर और यूट्यूबर्स के घर बैठे प्रायोजित वीडियो के बीच एक नया पत्रकार उभरा है. नाम है–सार्थक सिद्धांत. सार्थक कोई पत्रकार नहीं, लेकिन पत्रकार से भी ऊपर है. वह कंप्यूटर और कोडिंग का खिलाड़ी है. सॉफ्टवेयर का मास्टर.

दरअसल, सार्थक ने ही सीबीएसई के OSM घोटाले की पोल खोली है. वैसे भी प्रायोजित, सुपारी और रील पत्रकारिता के लिए किसी डिग्री की आजकल जरूरत नहीं है. बस, शोर मचाना, झूठ बोलना, अफवाह फैलाना आना चाहिए. काटना नहीं.
सिद्धांत ने अपने शोध से देश के सड़े हुए सिस्टम की जानकारी के कारण बीजेपी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को झुकने पर मजबूर कर दिया. उसने दिखा दिया कि किस तरह CBSE बोर्ड ने तेलंगाना की COEMPT कंपनी को इस घपले में लाने के लिए ठेके की शर्तें बार–बार बदलीं.

अब, जबकि सारा खेल उजागर हो गया है तो सीबीएसई और बीजेपी चुप है. बाहर सिर्फ भौंकने का शोर है. भाजपा के धर्मेंद्र प्रधान की शिक्षा मंत्रालय ने 17.5 लाख बच्चों के भविष्य को दांव पर लगाने के बाद कांग्रेस को यह श्रेय देना चाहिए कि वह इस मुद्दे पर घर बैठे राजनीति कर रही है.

जेन जी को खुद पर नाज करना चाहिए कि 40 पार वालों को उनकी रील अच्छी लग रही है. 40 पार वालों को भारत पर रश्क करना चाहिए कि वे अपने बच्चों की रील देखकर सुख पा रहे हैं. वहीं, इस सिस्टम को लोकचंद्र पर गर्व करना चाहिए कि उनकी रील से देश चल रहा है.
मुंह में कांग्रेस/बीजेपी की पेडिग्री दबाये श्वानों को जनता का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उनके भौंकने पर अभी भी लोगों को यकीन है. सिद्धांत को कौन पूछता है? लेकिन उसके सार्थक शोध पर सिस्टम जरूर हिलता है.



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