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संगठनों ने कहा, विश्व आदिवासी दिवस उत्सव के तौर पर नहीं शोक दिवस के रूप में मनाएं

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Ranchi: संयुक्त राष्ट्र संघ ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मान्यता दी है. इसके बाद से इस दिवस को विभिन्न आदिवासी संगठन, सरकारें अपने-अपने अनुसार अलग-अलग तरीके से उत्सव, अधिकार दिवस के रूप में मनाते आए हैं. मगर इसे लेकर एक नया ट्विस्ट सामने आया है. जनजाति सुरक्षा मंच, आदिवासी सरना विकास समिति, राष्ट्रीय आदिवासी मंच, जनजाति धर्म संस्कृति रक्षा मंच ने कहा है कि इस दिवस को उत्सव के रूप में नहीं बल्कि शोक श्रंद्धाजलि एवं शोक दिवस के रूप में मनाना चाहिए. यह बातें आज उपरोक्त आदिवासी संगठनों के द्वार आयोजित एक प्रेस वार्ता में कही गयी. इसे लेकर इन आदिवासी संगठनों ने तर्क भी प्रस्तुत किया.

कोलंबस ने अमेरिका के मूलनिवासियों के साथ क्रूर व्यवहार किया

उन्होंने कहा कि क्रिस्टोफर कोलंबस ने 12 अक्टूबर 1492 के दूसरे सोमवार को पहली बार भारत को खोजने की जगह गलती से अमेरिका के पूर्वी तट पर अपना लंगर डाला. कोलंबस का उद्देश्य अमेरिका में साम्राज्य स्थापित करना और वहां की बहुमूल्य खनिज संपदा, सोना, चांदी को स्पेन ले जाने का था. इसलिए वहां के मूलनिवासियों के साथ बहुत ही क्रूरता किया जाता था. महिला, पुरुष, बच्चे और लड़कियों पर अत्याचार किया जाता था. इन्हें प्रताड़ित कर वहां के लाखों मूल निवासियों (ट्राइब्स) का नरसंहार कराया गया. इसे पढ़ें- CWG:">https://lagatar.in/cwg-nikhat-zareen-wins-gold-in-boxing-defeats-opponent-5-0/">CWG:

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अमेरिकी राष्ट्रपति के कारण कई ट्राइब्स का खात्मा हो गया

उन्होंने बताया कि अमेरिका के राष्ट्रपति एंड जैंक्शन ने सन 1830 इंडियन अमेरिकी ट्राइब्स रिमूवल एक्ट पारित किया. इसका उद्देश्य लाखों लोगों को उनके पैतृक स्थान से मिसीसिपी नदी के पश्चिम की ओर भगाने का था. इस इतिहास में ट्रेल ऑफ टियर्स/आंसुओं की नदी भी कहा जाता है. वहां के (जनजाति) मूल निवासियों को जानवरों की तरह भगाया गया. जिसमें महिला ,पुरुष एवं बच्चे सहित लाखों लोग रास्ते में ही मर गए. इस घटनाक्रम में अमेरिका के कई मूल ट्राइब्स जिसमें चिक्सा,चिकटो, मास्कोगी, क्रिक, सेमिनोल, चिरोकी का उनके ही देश से खत्मा कर दिया गया. वहां के लोग उत्सव मनाने लगे.

नरसंहार पर पर्दा डालने के लिए आदिवासी दिवस की घोषणा

आदिवासी संगठनों ने कहा कि जब संयुक्त राष्ट्र ने 1992 को कोलंबस के आगमन की 500वीं वर्षगांठ मनाने का प्रस्ताव पारित किया गया. तब पूरे विश्व के यूरोपियन मूल के द्वारा नरसंहार झेल चुके लोगों ने लाखों की संख्या में एकत्रित होकर विरोध प्रदर्शन किया. तब जाकर संयुक्त राष्ट्र ने कोलंबस दिन को मनाने का निर्णय बदल दिया. इसे भी पढ़ें- रांची">https://lagatar.in/tribal-adhikar-yatra-will-be-taken-out-in-ranchi-on-august-9-cm-will-be-the-chief-guest/">रांची

में 9 अगस्त को निकाली जाएगी आदिवासी अधिकार यात्रा, सीएम होंगे मुख्य अतिथि
इंडीजीनस लोगों के दबाव में आकर आईएलओ अंतरराष्ट्रीय कानून संगठन एवं ह्यूमन राइट फोरम (मानवाधिकार) संगठन इंडिजिनियस लोगों के लिए घोषणा पत्र बनाने का कार्य सौंपा ताकि दुनिया के सामने यूरोपियन रेस के द्वारा किए गए नरसंहार पर पर्दा डाला जा सके. इसके बाद 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाने की मान्यता यूएनओ ने दिया. इसलिए इतिहास को स्मरण करते हुए 9 अगस्त को उत्सव के रूप में नहीं बल्कि श्रद्धांजलि/ शोक दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए. इस मौके पर संदीप उरांव, मेघा उरांव, सन्नी टोप्पो, नीलम तिर्की, लोरया उरांव, जयमंत्री उरांव, लुथरू उरांव, डॉक्टर बुटन महली, राजू उरांव, बबलू उरांव, सुनील उरांव, बिरसा भगत, रोपनी मिंज, जतरू उरांव, उदय उरांव, लालमणि देवी आदि मौजूद थे. [wpse_comments_template]  
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