
बैजनाथ मिश्र
यकीन मानिए, अब मुठभेड़ की राजनीति होगी. ऐसा लग रहा था कि विपक्ष के कोहराम से भाजपा सकते में या बैकफुट पर है. लेकिन रिजीम चेंज के शिगूफे के बाद पहले राजनाथ सिंह फिर अमित शाह और अब प्रधानमंत्री ने जिस लहजे में जवाब दिया है, उससे साफ हो गया है कि भाजपा बेमुरव्वत जवाब देने के मूड में है.
शायद पार्टी प्रवक्ताओं से भी कह दिया गया है कि वे लिहाज का लिहाफ उतार फेंके और कांग्रेस को उसी की भाषा-शैली में उत्तर दें. तभी तो गौरव भाटिया ने राहुल गांधी को गद्दार कहने में तनिक भी संकोच नहीं किया. राजनाथ सिंह के बयान में तल्खी कम थी, लेकिन जब अमित शाह कह रहे हैं कि अगले तीस साल तक कांग्रेस को सत्ता नसीब नहीं होगी तो वह या तो ललकार रहे हैं या चिढ़ा रहे हैं.
नरेंद्र मोदी ने तो मानो राहुल गांधी पर फायर झोंक दिया. उन्होंने कहा है कि दुनिया “न्यू आर्डर” की तलाश में है तो कुछ लोग “डिसऑर्डर” का सपना देख रहे हैं. यह भी कि श्रीहरिकोटा से एक साल में जितने रॉकेट लांच नहीं होते, उससे ज्यादा बार कांग्रेस अपने “फेल्ड प्रोडक्ट” को लांच करने की नाकाम कोशिश कर रही है. जो नक्सली कभी जंगलों में विनाशलीला करते थे वे कांग्रेस को अपनी गिरफ्त में लेकर देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश में लगे हैं.
इस बीच भाजपा की प्रदेश इकाइयों को निर्देश दिया गया है कि गांव-गांव में लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ अभियान चलायें. अब तक विपक्ष वोट चोरी के शोर-शराबे के साथ एकतरफा बैटिंग कर रहा था, लेकिन अब भाजपा भी मैदान में उतरेगी. इसलिए दीपावली से पहले ही मुठभेड़ की इस राजनीति का बिम्ब-प्रतिबिम्ब दिखने लगेगा.
कांग्रेस ने अभी सिर्फ इतना ही कहा है कि मोदी कांग्रेस फोबिया से ग्रस्त हैं और वह कांग्रेस टॉक्सिक के भी शिकार हैं. लेकिन राहुल की सूची में केवल ज्ञानेश कुमार ही नहीं हैं, मोदी-शाह और आरएसएस भी है. यानी जिस तरह की तैयारियां दोनों तरफ से हो रही हैं, उससे ऐसा लगता है कि किसी नये राजनीतिक महाभारत की पटकथा लिख दी गई है. संभव है कि संसद के शीतकालीन सत्र में इस महाभारत का कोलाहल ऐसी तपिश पैदा कर दे कि सारा कामकाज ठप पड़ जाये.
तिलचट्टा गिरोह के शिथिल पड़ जाने के बाद विपक्ष यह समझ गया है कि सरकार विरोधी आंदोलन की आंच तेज करने के बदले इसे सुलगाये रखने में ही भलाई है. संभव है हालात और सरकार की गफलत कुछ दूसरे मुद्दे भी विपक्ष को परोस दे. इसलिए विपक्ष शायद “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय” की राह पर चलने की योजना बना रहा हो.
बहरहाल, विपक्ष वोट चोरी पर राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर फंस गया है. राहुल गांधी कह चुके हैं कि राष्ट्रपति ने सबूत मांगा है और विपक्ष सबूत देगा. लेकिन कब देगा? विपक्ष राष्ट्रपति से नौ अक्टूबर को मिला था. करीब एक महीने में सबूत तो छोड़िए, विपक्ष राष्ट्रपति से यह भी नहीं कह पाया है कि सबूत जुटाने में थोड़ा और वक्त लगेगा. तो क्या इससे यह साबित नहीं हो रहा है कि विपक्ष सिर्फ प्रदर्शनों की आंधी से एक संवैधानिक संस्था को हिलाने का प्रयास कर रहा है?
ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति को ज्ञापन देने का निर्णय हड़बड़ी में लिया गया था और उसका मकसद केवल सुर्खियां बटोरना था. इस संबंध में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि विपक्ष ने अभी तक यह भी साफ नहीं किया है कि यदि उसे सत्ता मिली तो वह चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में मुख्य न्यायधीश को तो शामिल करेगा हीं, चुनाव आयुक्तों को आजीवन मिलने वाला वैधानिक संरक्षण खत्म कर देगा. कांग्रेस ने अपने जमाने में कैसे और कैसे-कैसे चुनाव आयुक्तों को बैठाया और उन्हें पुरस्कृत किया, इसे जानने के लिए गूगल महाराज से पूछ लीजिए.
नीट पेपर लीक से शुरु हुए सरकार विरोधी आंदोलन ने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो ले लिया, कुछ अधिकारी-कर्मचारी भी हटा दिये गए और नंदन नीलकणि को कमान भी दिला दी, लेकिन क्या विपक्ष ने कोई सुझाव दिया कि भविष्य में नीट जैसी परीक्षाओं के संचालन में क्या-क्या करना चाहिए ताकि पर्चा लीक न हो?
इसी प्रकार भाजपा कह रही है कि वर्तमान कोलाहल के पीछे विदेशी साजिश है. लेकिन सरकार कर क्या रही है? उसने इस साजिश में शामिल कितने लोगों को गिरफ्तार किया है? उसे ऐसे साजिशकर्ताओं की गिरफ्तारी से रोक कौन रहा है? सरकार बताती क्यों नहीं कि अब तक कितने मनी ट्रेल पकड़े गये हैं? जवाब है निल बटा सन्नाटा. यानी जिस प्रकार विपक्ष का वोट चोरी का आरोप बेबुनियाद है, उसी प्रकार विदेशी साजिश भी हवा-हवाई लगती है.
मजेदार बात यह है कि दोनों पक्ष लोकतंत्र बचाने के लिए सड़क पर निकल रहे हैं. मानो लोकतंत्र खतरे में पड़ गया है. अगर ऐसा ही है तो रैलियां और प्रदर्शन हो कैसे रहे हैं? इन दोनों गिरोहों को यह बात ठीक से समझ लेनी चाहिए कि हमारा लोकतंत्र किसी कमजोर की जोरू नहीं है जो खतरे में पड़ जाये. इसकी जड़ें गहरी हैं जिसे मौसमी हवाएं हिला तक नहीं सकती है. यह इमरजेंसी के झंझावाती थपेड़ों के बावजूद आज भी हरा-भरा है तो राजनीतिक दलों की चिंता या कृपा से नहीं, लोकशक्ति के संबल से.
इन दोनों समूहों से यह पूछने का समय है जिस एसआईआर को लेकर बवाल मचा है, उसे ठीक कराने, गलतियां सुधरवाने और मतदाताओं की सहायता के लिए उन्होंने बीएलओ के साथ कितने बीएलए लगाये हैं? दरअसल, पेंच यही है और इसे ठीक करने का उत्साह और सामर्थ्य किसी दल में नहीं है. बीएलए पार्टियों के पोलिंग बूथ एजेंट होते हैं. वे सक्रिय रहें तो किसी भी बूथ पर कोई भी अधिकारी-कर्मचारी किसी जेनुइन वोटर का नाम कैसे काट सकता है? तो क्या पार्टियों के ही पास सक्रिय बीएलए नहीं हैं? यह एक कटुसत्य है. लेकिन कोई इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है.
दरअसल, ये बीएलए केवल चुनावों के समय पैसा और अन्य सुविधाओं के बूते बनाये जाते हैं. जब नेताओं का ही स्थायी ठिकाना नहीं है, वे कपड़े की तरह दल बदलते है तो भला बूथ एजेंटों की प्रतिबद्धता की बात करना बेमानी है. अधिकतर बूथ एजेंट मौसमी ही होते हैं, क्योंकि यह राजनीतिक संस्कृति के क्षरण का दौर है.
झारखंड में भाजपा को ही ले लीजिए. इस समय उसके पास पांच पूर्व मुख्यमंत्री हैं. इनमें दो आयातित हैं और दो का पुनरागमन हुआ है. ये पार्टी के कर्णधार बने हुए हैं तो पुराने कार्यकर्ताओं की पूछ होगी या इनके पिछलग्गुओं की? विधायकों-सांसदों की सूची देख लीजिए. इनमें से कितनों को भाजपा की पंचनिष्ठाओं की जानकारी है? यही हाल सभी दलों का है.
अगर अपवाद हैं तो वामपंथी, लेकिन उनकी दुकान का शटर हर जगह गिर गया है. यानी जब नेता ही परमानेंट नहीं हैं तो बीएलए परमानेंट कैसे रहेंगे? इसलिए वोट चोरी पर विपक्ष भ्रम जाल फैलाये हुए है और भाजपा इस जाल को पुख्ता प्रमाणों के साथ काट नहीं पा रही है.
खैर, कांग्रेस को पता नहीं क्यों अपनों से ज्यादा दूसरों पर भरोसा है जबकि हकीकत यह है कि कांग्रेस के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग-समर्थन के बिना सरकार विरोधी कोई भी आंदोलन परवान नहीं चढ़ सकता. रिजीम चेंज जैसी घोषणा से ही भाजपा को आक्रामक होने का अवसर मिला है.
दूसरी बात यह है कि यदि महंगाई, बेरोजगारी चरम पर है तो कांग्रेस को इसके समाधान का तरीका देश के सामने रखना चाहिए. उसे बताना चाहिए कि रुपये की गिरती वैल्यू नहीं थाम पाने के लिए सरकार की कौन सी नीति जिम्मेदार है. उसे बताना चाहिए कि विदेशी निवेशक किन वजहों से भाग रहे हैं. यानी सरकार की खामियां गिनाते समय विकल्प भी पेश करना चाहिए. केवल आरोपों, नारों और विमर्श से जंग नहीं जीती जा सकती. सत्ता परिवर्तन का नारा वैकल्पिक मॉडल के अभाव में परवान नहीं चढ़ सकता.
अगर विपक्ष यह सोच रहा है कि युवा वर्ग इस सरकार से नाराज है और इसीलिए वह मजबूती के साथ खड़ा रहेगा तो वह मुगालते में है. उसे समझना चाहिए कि युवा निराश हैं. वह वहीं जाएगा जहां आशा की किरण दिखाई देगी. अन्यथा वह सरकार से नाराजगी के बावजूद घर बैठ जाएगा.
कांग्रेस के बचे-खुचे परिपक्व नेताओं को शायद यह मालूम होगा कि भारतीय मतदाता किसी नेता के प्रति बनी लोकप्रिय धारणा के आधार पर भी वोट करते हैं. इस समय नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आसपास भी राहुल की लोकप्रियता नहीं है और यह तब तक नहीं बढ़ेगी जब तक वह देश के बहुसंख्यक समाज को हिकारत की नजर से देखते रहेंगे और बात-बेबात उसकी तौहीन करते रहेंगे.
जब तक भाजपा के कोर वोट बैंक में बिखराव नहीं होगा, तब तक चाहे जितने विमर्श गढ़ लिये जायें, बड़ा से बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया जाये, सफलता कहीं दूर खड़ी चिढ़ाती रहेगी.
पुनः लौटते हैं लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की और आंदोलन की आजादी पर. अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे पहले पंख कतरा था जवाहरलाल नेहरु ने. उन्होंने पहला संविधान संशोधन किया था. उन्हें हिटलर कहने वाले मजरूह सुल्तानपुरी को जेल की हवा उन्होंने ही खिलाई थी. लेकिन विपक्ष को कितनी आजादी चाहिए कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष कह रहा है कि मोदी ही नहीं, उनके बाप को भी हटना होगा.
ध्यान रहे कोई भी अधिकार लोकशाही में असीम नहीं होता है. आप सुबह-शाम टहलने समय छड़ी तो घुमा सकते हैं लेकिन वह छड़ी किसी की नाक से दूर ही होनी चाहिए. पुरानी कहावत है पानी पीयें छानकर, बानी बोलें जानकर. आंदोलन का अधिकार तो संविधान ने दिया है, लेकिन ट्रेन जलाने, बस जलाने, दुकानें लूटने और पत्थरबाजी का अधिकार किसने दिया है? सड़कें-चौराहे रोककर आम जनता को तकलीफ देने और पुलिस पर हमले का अधिकार किस संविधान ने दिया है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कर्तव्य रुपी वृक्ष से ही अधिकार रुपी फल की प्राप्ति होती है.