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कानून का दायरा भूलती हमारी पुलिस और हम

दो दिन पहले की घटना है. बिहार के भोजपुर में भरत तिवारी नामक युवक ने पुलिस पर पिस्तौल ताना. फिर सरेंडर कर दिया. आरोप है कि पुलिस ने सरेंडर करने के बाद उसका एनकाउंटर कर दिया. इसके खिलाफ भोजपुर जल उठा. लोग सड़क पर उतर आये. बिहार सरकार के मंत्री तक ने एनकाउंटर पर सवाल खड़ा किया. अब पूरे मामले की जांच हो रही है.
 

दो दिन पहले की घटना है. बिहार के भोजपुर में भरत तिवारी नामक युवक ने पुलिस पर पिस्तौल ताना. फिर सरेंडर कर दिया. आरोप है कि पुलिस ने सरेंडर करने के बाद उसका एनकाउंटर कर दिया. इसके खिलाफ भोजपुर जल उठा. लोग सड़क पर उतर आये. बिहार सरकार के मंत्री तक ने एनकाउंटर पर सवाल खड़ा किया. अब पूरे मामले की जांच हो रही है.


अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारतीय पुलिस ने खुद को कानून के दायरे से आजाद कर लिया है. लंबी ट्रेनिंग में जिन कानूनों का पालन करने, कानून के दायरे में रह कर अपराधियों को सजा दिलाने का प्रशिक्षण, इन सबसे पुलिस का मोहभंग हो गया है. क्या इसके लिए सिर्फ पुलिस के अधिकारी ही दोषी हैं. बिल्कुल नहीं.


कल्पना करिये, अगर वह तिवारी की जगह कुरैशी होता तो क्या होता. संभव है तत्काल उसे आतंकी संगठन से जोड़ दिया जाता है. पुलिस को वाहवाही मिलती. सस्ती लोकप्रियता, मेडल और पब्लिक का भरपूर सपोर्ट. कोई आश्चर्य नहीं शहर में जगह-जगह उनके सम्मान में दो-चार समारोह हो जाते. मीडिया भी समर्थन करती. ऐसा पहले हुआ है और ऐसा हो भी रहा है. 

 

दरअसल  हमने पुलिस को ऐसा ही बना दिया. हमने एक-दो दुर्दांत के साथ किये गये पुलिस के कृत्य को इतनी तारीफ कर दी कि पुलिस के अधिकारी कानून का दायरा ही भूल गये. जब समाज जाति, धर्म देख कर एनकाउंटर को सही या गलत बताने लगे, तो फिर पुलिस को कोई रोक नहीं सकता. उसके पास हथियार है और चलाने की छूट भी. 


समाज को यह समझना होगा कि अपराधी कोई भी हो, उसे अदालत ही सजा देते तो अच्छा है. सड़क पर न्याय देने का यह सिलसिला बंद होना चाहिए. बात चाहे फर्जी एनकाउंटर की हो या किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के बाद कमर में रस्सा लगाकर सड़क पर घुमाने की. आतंक को आतंक से खत्म करने की नीति बहुत भारी पड़ेगी. याद रखिये, देर-सबेर यह आग आप तक भी जरूर पहुंचेगी.

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