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ऊपर से तो दिल मिला भीतर फांके तीन

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बैजनाथ मिश्र

पिछले छह महीने से आभासी दुनिया के लाल बुझक्कड़ झारखंड में तख्ता पलट करा रहे हैं. 18 जून से इस अटकलबाजी की रफ्तार तेज हो गयी है. इसकी वजह है राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की पराजय. जाहिर है यह पराजय सत्तारूढ़ गंठबंधन के विधायकों की दगाबाजी की वजह से हुई है. प्रणव झा कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं में शुमार हैं. वह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कार्यालय संभालते हैं. उनको हारना नहीं चाहिए था क्योंकि सरकारी पक्ष के पास राज्य की दोनों सीटें जीतने के लिए आवश्यक संख्या बल था. 

 

सरकार के मुखिया की पार्टी तो ताव में छप्पन के बदले इकसठ विधायकों के समर्थन का दावा कर रही थी. इसी दावे के आधार पर आभासी दुनिया में यह कहानी परोसी जाने लगी कि एनडीए में टूट पड़ गयी है. लेकिन परिणाम आया तो यह कयासबाज गिरोह पलटी मार गया और पुरानी कथा में नयी कल्पना की छौंक लगाकर सरकार का रुप-रंग बदलने की खबरें परोसी जाने लगीं. 

 

यह अनुमानी खबर तब भी चलायी जा रही जब कांग्रेस विधायकों ने सामूहिक रुप से घोषणा कर दी कि वे विष पीने को तैयार हैं. इसका निहितार्थ यह था कि कांग्रेस पराजय की मर्मांतक पीड़ा सहन करते हुए भी सरकार से समर्थन वापसी की हद तक आगे नहीं बढ़ेगी. कांग्रेस नेता भलीभांति जानते हैं कि झामुमो के साथ रहने में ही उनकी भलाई है. इसलिए अपमान का घूंट पीकर भी सत्ता की चाशनी में डूबने-उतराने का मौका मिलता रहे तो पराक्रम का प्रदर्शन नादानी ही होगा. 

 

कांग्रेस के नेताओं ने अपने प्रभारी के. राजू की प्रतिक्रिया को पराजय की व्यथा से पीड़ित व्यक्ति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बता दिया. इन नेताओं ने राजू के बयान पर राजद और माले की तीखी प्रतिक्रिया का भी उनकी ही भाषा में जवाब नहीं दिया. कांग्रेसी जानते हैं कि जब पुरुषार्थ कमजोर पड़ जाये तब बड़प्पन की दिखावटी चादर ओढ़ लेना ही श्रेयस्कर है. 

 

सही है कि राजू ने राजद, माले को कांग्रेस की पराजय के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराया था. उन्होंने उनके लिए गद्दार शब्द का इस्तेमाल किया था, लेकिन कांग्रेस गांधी जी की नहीं तो गांधी की पार्टी तो है ही. वह इस मामले में दिनकर जी की इस लाइन को आत्मसात कर चुकी है कि "क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो." कांग्रेस चौकीदार चोर है का तो नारा लगवा सकती है, उसकी मौत के तरीके बता सकती है, उसकी कब्र तक खोद सकती है, लेकिन लोकतंत्र संविधान की रक्षा के लिए सेक्युलर फेब्रिक की रक्षा की खातिर किसी के मुंह लगना नहीं चाहेगी. वह भी राजद के, जिसे बिहार के तीन कांग्रेसी विधायकों ने साफ-साफ कह दिया था कि उन्हें राज्यसभा के राजद प्रत्याशी एडी सिंह को समर्थन देने के लिए पार्टी नेतृत्व ने कहा ही नहीं था. अगर राजद एडी सिंह की पराजय का हिसाब कांग्रेस से मांगने लगता तो किसकी फजीहत होती. इसलिए दिनन के फेर पर चुप रह जाने की उक्ति पर अमल कर मामले को नयी आंच देना मुनासिब नहीं समझा गया. 

 

बहरहाल, राजू साहब को पता कैसे चला कि निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी को मिले अतिरिक्त वोट राजद और माले के ही थे? ये वोट झामुमो के क्यों नहीं हो सकते? क्या राजू ने झामुमो विधायकों के मतपत्र वोट डालने के बाद देखे थे? यदि हां, तो उनके वोट कैंसिल होने चाहिए थे, क्योंकि राज्यसभा के मतदाता अपने मतपत्र अपनी पार्टी के ही एजेंट को दिखा सकते हैं. उन्होंने झामुमो को बख्श दिया तो इस भय से कि तब सरकार का शिराजा ही बिखर जाता. इसलिए उन्होंने ठीकरा राजद, माले के सिर फोड़ दिया. लेकिन हकीकत यह है कि नाथवानी निर्दलीय नहीं, सर्वदलीय प्रत्याशी थे. वह दिल्ली में भाजपा आलाकमान को पांच अतिरिक्त वोटों के जुगाड़ की गारंटी देकर पर्चा भरने आये थे. उन्होंने इन पांच विधायकों का नामोल्लेख भी किया था और भाजपा के स्थानीय बड़े नेताओं को भी बताया था. इसलिए एनडीए खेमा बमबम था. 

 

भाजपा चाहती थी कि नाथवानी पार्टी प्रत्याशी के रुप में लड़ें, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि दलीय प्रत्याशी होने पर उन्हें दूसरे दलों के वोट खींचने में मुश्किल होगी. नाथवानी ने फिलहाल बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चौथी बार राज्यसभा चुनाव जीत कर एक नया कीर्तिमान रच दिया है. सही है कि इस बार भी हार्स ट्रेडिंग हुई है. जब घोड़े बाजार में बिकने को तैयार होंगे तो सौदागर खरीदेगा ही. तो क्या 2008 में यह ट्रेडिंग नहीं हुई थी जब कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव और भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी उनके साथ थे. तब दोनों की पार्टी झाविमो थी और नाथवानी ने आरके आनंद को शिकस्त दी थी और वह भी द्वितीय वरीयता के वोट से. 

 

इस बार तो अभी यही साफ नहीं हुआ है कि जो तीन वोट अवैध घोषित किये गये हैं, वे किसके थे. इतना तो तय है कि वे होंगे सरकारी गंठबंधन के ही विधायकों के. यदि विपक्षी विधायकों के वोट अमान्य होते तो नाथवानी को अट्ठाईस वोट मिलते कैसे? समझ में नहीं आता कि जब माननीयों से तीन-तीन, चार-चार बार मॉक पोल कराया गया तब भी वोट अमान्य कैसे हो गये? इसलिए ऐसा हो सकता है कि एक सुविचारित रणनीति के तहत यह किया गया होगा. बताया जा रहा है कि दो वोट नाथवानी के ही कैंसिल हुए हैं. यदि ये कैंसिल नहीं होते और उन्हें भी तीस वोट मिल जाते जो झामुमो के बैजनाथ राम को मिले वोटों के बराबर होते. 

 

वैसे झामुमो भी कांग्रेस के रवैये से नाखुश है. एक तो बिहार विधानसभा चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं दी गयी. असम में भी उसे ठेंगा दिखा दिया गया. इससे तिलमिलाये झामुमो ने करीब एक दर्जन सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिये. ये प्रत्याशी आधा दर्जन सीटों पर कांग्रेस की हार के कारक-कारण बन गये. राज्यसभा चुनाव में भी झामुमो दोनों सीटों पर लड़ना चाहता था. लेकिन कांग्रेस एक सीट पर अड़ गई. यहां तक तो फिर भी ठीक था. परंतु उसने झामुमो से विचार-विमर्श किये बिना दिल्ली से प्रत्याशी भेज दिया. यदि ऐसा करना ही था तो पहले हेमंत सोरेन से बात करने में हर्ज क्या था? जो पर्यवेक्षक बाद में भेजे गये वे पहले आ गये होते और आम सहमति से कांग्रेस प्रत्याशी उतारती तो शायद यह छीछालेदर नहीं होती. 

 

लेकिन तब कांग्रेस यह मान कर चल रही थी कि उसके प्रत्याशी को जिताने के लिए साथी दल मजबूर हैं और वह यहीं गच्चा खा गई. विधायकों को लगा कि कांग्रेस अपनी सुपरमेसी दिखा रही है. कुछ विधायकों को कांग्रेस से हिसाब चुकता करना था. एक मंत्री के पुत्र को हराने में खुद प्रणव झा और झारखंड की एक मंत्री की भूमिका बतायी जाती है. अगर कमान हेमंत सोरेन को सौंप दी गयी होती तब उनकी जिम्मेदारी बढ़ जाती और वह संभावित टूट रोकने का उपाय जरूर करते. लेकिन कांग्रेस अपनी डफली बजाते हुए अपना ही राग गाने लगी और मौके की हलचल भांप सहयोगी विधायकों ने नया गुल खिला दिया. 

 

फिलहाल अब सवाल यह है कि क्या सरकार का कलेवर बदलेगा और कांग्रेस अलग हो जाएगी? ऐसा सोचना दूर की कौड़ी लाने जैसा है. हेमंत सोरेन अब परिपक्व हो गये हैं, वे जानते हैं कि सरकार का रुप बदलने का मतलब उसे एक खाई के मुहाने पर खड़ा करने जैसा होगा और जब कांग्रेस जहर खाने की हद तक जाकर सरकार में बने रहने को तैयार है तो फिर पूरी नजाकत के साथ हेमंत सियासत क्यों नहीं करेंगे? हेमंत इतना तो जानते ही होंगे कि कांग्रेस के अलग होने से एक खास वोट बैंक में बिखराव होगा. इसलिए वह कांग्रेस को ही गलती करने का मौका देंगे, स्वयं कोई विघटनकारी कदम नहीं उठायेंगे. फिर भी इस गंठबंधन के सभी दोस्त खीरे की तरह हैं जो ऊपर से तो मिले हुए हैं, परंतु छिलका उतरते हीं इनके फांके साफ दिखाई देते हैं. ऐसी ही परिस्थिति पर रहीम ने लिखा है- "रहिमन प्रीत न कीजिए जस खीरा ने कीन, ऊपर से तो दिल मिला भीतर फांके तीन." लेकिन झारखंड में यह तीन फांकों वाली गंठबंधन सरकार तब तक चलेगी जब तक कोई बड़ी घटना से इसके छिलके न उतर जायें. 

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