देश में क्षेत्रीय दलों का टूटना जारी है. टूट ही नहीं पार्टी पर कब्जा हो रहा है. क्षेत्रीय दलों की टूट में भाजपा की भूमिका रहती है. लेकिन भाजपा किसी भी पार्टी को अपनी पार्टी में विलय नहीं कराती. टूटे हुए दल भाजपा की सहयोगी पार्टी के रूप में सामने आते हैं. ऐसा लगता है देश में एक तीसरा फ्रंट बन तो रहा है, लेकिन सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि सत्ता के पक्ष में.
बात चाहे महाराष्ट्र की शिव सेना की हो, जो दो बार टूट चुकी है या एनसीपी-टीएमसी में टूट की. जो नया दल बना या जिस नये दल में विलय किया, वह केंद्र में सत्तासीन भाजपा के पक्ष में ही खड़ा है. इन तीनों दलों के टूटने में भाजपा का प्रत्यक्ष सहयोग रहा है. लेकिन भाजपा ने इन्हें अपनी पार्टी में विलय नहीं कराया.
बिहार में जदयू, आरएलडी में औपचारिक रूप से टूट तो नहीं हुई, लेकिन यह बात सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर है कि इन दलों के अधिकतर सांसद या विधायक भाजपा के पक्ष में हैं. एक इशारा मिलते ही वह नया दल बनाकर भाजपा को समर्थन दे देंगे.
उत्तर प्रदेश में जब समाजवादी पार्टी से शिवपाल सिंह यादव ने बगावत की, तो वह भी भाजपा के साथ ही खड़े दिखे. इसी तरह बिहार में जब लोक जनशक्ति पार्टी टूटी, तब चिराग पासवान के चाचा पशुपति कुमार पारस भाजपा के साथ ही खड़े नजर आये. बाद में जब चिराग पासवान ने घुटने टेक दिये, तब पारस को दूर कर दिया गया.
ओडिशा में बीजद के प्रभावशाली नेताओं ने पार्टी तो नहीं तोड़ी पर भाजपा में शामिल होकर पार्टी को कमजोर कर दिया. यही स्थिति दक्षिण में वाईएसआरसीपी, टीआरएस व बीआरएस पार्टी की रही. पार्टी में औपचारिक टूट तो नहीं हुई, लेकिन प्रभावशाली नेताओं का भाजपा में जाने से संगठन कमजोर पड़ा. यूपी में बसपा को तो खत्म ही कर दिया गया.
कुल मिलाकर क्षेत्रीय पार्टियों के दिन खराब चल रहे हैं. पार्टियां बिखर रही हैं. टूट रही हैं. नेता इधर-उधर भाग रहे हैं. इस सबके पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से परदे के पीछे भाजपा ही होती है. पर किसी भी पार्टी को भाजपा ने विलय नहीं कराया. बल्कि समर्थन में खड़ा किया. यानी देश में एक थर्ड फ्रंट बन तो जरूर रहा है, लेकिन वह भाजपा के विरोध में नहीं, बल्कि पक्ष में.
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