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जनता के पास एक ही चारा है बगावत ?

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डां संतोष मानव काजू भुने प्लेट में विहस्की गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत इतना असर है खादी के उजले लिबास में ------–---------------- अदम गोंडवी ने हमारे माननीयों को लेकर गजल लिखी. और हम रोज गालियां बकते हैं अकेले में या बतकही में. गालियां न बकें, तो करें क्या? हमने जिन्हें अपना नसीब लिखने देश या राज्य की राजधानियों में भेजा, वे हमारे नसीब के साथ रोज बलात्कार करते हैं, तो बेबस लोग करें क्या, आह ! भरकर गालियां व जीभरकर बद्दुआ देने के अलावा? गजलकार दुष्यंत कुमार लिख भी गए हैं-गिड़गिड़गिड़ाने का असर यहां होता नहीं, आह ! भरकर गालियां दो और जीभरकर बद्दुआ. पर बद्दुआ भी कितनी और किस-किस को दें. अधिकतर मदारी. जादूगर. सत्ता के भोगी. चापलुसों - दलालों से घिरा. योगी कहां ढूंढ़ें? जब तक इनका खेल समझ में आता है, बाजी पलटती है, उनका खेल शुरू हो जाता है. सारी उम्र इसी छलावे में गुजरती है. वे सत्ता का भोग करते हैं, हम छाती पीटते हैं. इसलिए वीर भोग्या वसुंधरा को बदलकर मदारी भोग्या वसुंधरा कर देना चाहिए.

हंगामा है इसलिए बरपा 

मुद्दे की बात करें. झारखंड विधानसभा चार दिनों से बाधित है. कामकाज लगभग ठप है. पेपर फाड़े जा रहे हैं. मार्शल विधायकों को बाहर कर रहे हैं. कौन है दोषी? क्यों हो रहा ऐसा? खबऱों की मानें, तो संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर ढाई लाख रुपए खर्च होता है. यानी घंटे में डेढ़ करोड़. अगर सदन रोज आठ घंटे चले, तो रोज के बारह करोड़. संसद का एक दिन बाधित होना यानी बारह करोड़ की बरबादी. झारखंड विधानसभा की एक दिन की कार्यवाही पर दो करोड़ खर्च मानें, तो चार दिन में आठ करोड़ स्वाहा हो गए. यह पैसा किसका था? मुख्यमंत्री या अपोजिशन के लीडर का ? यह पैसा झारखंडियों का था, जिसे सबने मिल कर `जला` दिए. झारखंड विधानसभा ही नहीं, देश की संसद हो या किसी दूसरे राज्य की विधानसभा, सब जगह एक-सी स्थिति है. कामकाज कम और हंगामा ज्यादा. रोज करोड़ों स्वाहा. माना कि सदन चलाने की जिम्मेदारी सत्तारूढ़ दल की ज्यादा होती है, तो क्या अपोजिशन की कोई जिम्मेदारी नहीं? ऐसा नहीं है. जिम्मेदारी दोनों की है. किसी की कम, किसी की ज्यादा. झारखंड में दोनों तरफ एक-सी स्थिति है. न सत्तारुढ़ दलों में गंभीरता है न अपोजिशन में. सवाल JPSC में खामियों का है. होना यह चाहिए कि सत्ता उन सवालों का बिंदुवार जवाब देती, जो अपोजिशन ने उठाए हैं. अपोजिशन शांति के साथ अपनी बात रखता. लेकिन, दोनों ओर `हेडलाइन` में आने की चिंता ज्यादा है.

 विधानसभा की दीवारों को भी महेंद्र सिंह की याद होगी

मुख्यमंत्री को  सलाहकारों ने बताया होगा कि `मनु` बिकते हैं. बस, एक पंक्ति बोलो और सुर्खियों में आ जाओ. मुख्यमंत्री ने वही किया. हजारीबाग से बीजेपी विधायक मनीष जायसवाल ने वही किया और धनबाद के विधायक राज सिन्हा भी वही कर रहे हैं-हमारी बात नहीं सुनेंगे, तो हम क्या करें. हम तो कागज फाडेंगे. हंगामा करेंगे. शायद, बीजेपी के रणनीतिकारों ने सिन्हा को यही सीख दी होगी. ये हंगामा, ये तोडफोड़, ये बरबादी सदनों का स्थायी भाव हो गया है. कोई नहीं चाहता कि बहस हो. वे दिन हवा हुए, जब सदन गंभीर विचार-विमर्श, तर्क-बहस के केंद्र होते थे. घंटों के अध्ययन और तैयारी के साथ लोग सदन पहुंचते थे. हम दूर की बात क्यों करें, इसी बिहार और झारखंड की विधानसभा की दीवारों को भी महेंद्र सिंह की याद होगी. कितनी तैयारी और तर्क के साथ महेंद्र सिंह विधानसभा पहुंचते थे. उनकी बात सुनने-पढ़ने की इच्छा होती थी. तब लालू यादव जैसे महेंद्र सिंह के विरोधी सदन में कहते थे-ये सब चुप बैठो, सुनो महेंद्र जी का बोल रहे हैं. झारखंड-बिहार में अब किस विधायक को सुनना चाहेंगे आप? किसके पास तर्क और अध्ययन है? कौन मुद्दे की बात करता है? सबने लोकतंत्र के मंदिर को लूट-झूठ का प्रहसन केंद्र बना दिया. सच यह है कि सदन अब बहस नहीं, हंगामा-केंद्र हैं. वहां बहस नहीं, ड्रामा होता है, कई बार हिंसक भी. उनके लिए हम झुनझुने हैं. दुष्यंत कुमार ने लिखा था- जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में, हम नहीं है आदमी, हम झुनझुने हैं.

सुनिए महाशय 

वे तर्क नहीं करेंगे. वे अपनी गाल बजाएंगे. वे हमारे पैसों की होली करेंगे. वे अपनी चलाएंगे. वे अपने फायदे की सोचेंगे. धर्म के बरक्श जाति लाएंगे/लड़ाएंगे. वे भीतरी-बाहरी करेंगे. वे भाई-भतीजावाद करेंगे. वे हमें झुनझुना मान, बजाएंगे. तो हम क्या करें? अदम गोंडवी से बात शुरू की थी. उन्हीं से समाप्त करते हैं. उन्होंने लिखा है-जनता के पास एक ही चारा है बगावत. यह बात कह रहा हूं मैं होशो-हवास में. ..... सुन रहे हो न झारखंड के ...... ?   [wpse_comments_template]

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