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वन संरक्षण संशोधन विधेयक-2023, लोगों की चिंता बरकरार

कानून बन जाने से वन क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ेंगी Ranchi :   व‍न‍ संरक्षण एक गंभीर विषय है. समय-समय पर केंद्र सरकार इस पर विधेयक लाकर वन संरक्षण को बढ़ावा देती रही है. इस क्रम में वन (संरक्षण) संशोधन विधेयक-2023 संसद में पेश किया गया है. लेकिन विधेयक को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ गयी है. दरअसल इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद जंगल पर निर्भर आबादी, माइनिंग, वनों का निजीकरण और उसका उपयोग जैसे कई मुद्दे होंगे, जिससे वन क्षेत्र प्रभावित होगा. इसमें वन क्षेत्र में बड़े प्रोजेक्ट, बड़े सोलर पार्क, इको-टूरिज्म और व्यावसायिक आर्थिक गतिविधियां सरल होंगी. इसके अलावा नए कानून से इको-टूरिज्म, व्यावसायिक, वनीकरण जैसी आर्थिक गतिविधियां आसान होंगी. सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों को चिंता है कि राज्य के वन संसाधन व्यापारी वर्ग के हाथों में चले जाएंगे. वन भूमि के संरक्षण के नाम पर वनों के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा.सामाजिक कार्यकर्ताओं की चिंता इस बात को लेकर है कि इससे आदिवासी तथा वन में रहने वाले समुदायों के अधिकारों का और अधिक हनन होगा. हालांकि दूसरी बात यह है कि इससे रेल लाइन बिछाने और सार्वजनिक सड़क का निर्माण भी होगा. जाहिर है कहीं न कहीं इससे पूरी पारिस्थितिकी प्रभावित होगी. शुभम संदेश की टीम ने इस गंभीर विषय को उठाया और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बात कर रिपोर्ट तैयार की. प्रस्तुत है रिपोर्ट...

जमशेदपुर

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वनों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा : भरत सिंह

वीर युवा सेना के केंद्रीय कमेटी सदस्य सह सामाजिक कार्यकर्ता भरत सिंह कहते हैं कि केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित वन संरक्षण संशोधन विधेयक वनों का अस्तित्व समाप्त करने वाला है. इस विधेयक में राज्य सरकार के अधिकार शिथिल किए गए हैं. साथ ही वैसे लोग जो वनों में रहते हैं तथा उनकी आजीविका का साधन वन है, उनकी आजीविका प्रभावित होगी. उन्होंने कहा कि नया कानून लागू होने से वनों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. केंद्र सरकार को सभी राज्यों से सलाह के बाद इसे लागू करना चाहिए.

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alt="" width="150" height="150" />आदिवासी-मूलवासी के अधिकारों का हनन : भीम

जुगसलाई निवासी सह सामाजिक कार्यकर्ता भीम सरदार ने बताया कि केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 लागू होने से आदिवासी एवं मूलवासी की सदियों से चला आ रहा अधिकार खत्म हो जाएगा. वनों में रहने वालों को मिलने वाले वनाधिकार पट्टा के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी, क्योंकि राज्य सरकार के अधिकांश अधिकार इस विधेयक में शिथिल किए गए हैं. उन्होंने केंद्र सरकार से इस विधेयक को लागू करने से पहले पुनर्विचार का आग्रह किया.

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alt="" width="150" height="150" />आम हित की बजाय औद्योगिक हित पर फोकस हो: सुमन शर्मा

गोलपहाड़ी दुर्गा पूजा न्यास ट्रस्ट के अध्यक्ष सह सामाजिक कार्यकर्ता सुमन शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार का नया वन संरक्षण संशोधन विधेयक वनों के संरक्षण की बजाय उसके विनाश पर ज्यादा फोकस है. इससे औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिलेगा. इससे तेजी से पेड़ों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. उनका मानना है कि जिस तरह पेड़-पौधे इंसानों के लिए जरूरी है, उसी तरह पशु, पक्षी तथा जंगली जानवरों के लिए भी वन का होना नितांत जरूरी है. लेकिन नए विधेयक से इसका एकाधिकार केंद्र सरकार के हाथों में चला जाएगा.

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alt="" width="150" height="150" />इससे जनजातीय समुदाय प्रभावित होगा : बिमो मुर्मू

आदिवासी सेंगेल अभियान के केंद्रीय संयोजक बिमो मुर्मू नए वन संरक्षण विधेयक पर कहते हैं कि केंद्र सरकार वनों के संरक्षण के नाम पर इसका एकाधिकार अपने हाथ में लेना चाहती है. ऐसा होने से वनों में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोग ज्यादा प्रभावित होंगे. वर्षों से वन को जीविकोपार्जन एवं निवास का माध्यम बनाने वाले जनजातीय समुदाय को वनाधिकार पट्टा मिलने में दिक्कत होगी. ग्रामसभा का अधिकार कम हो जाएगा. कहा कि केंद्र सरकार कोविधेयक को समुदाय के हितों को ध्यान में रखकर लागू करना चाहिए.

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alt="" width="150" height="150" />ग्रामसभा व पेसा कानून को खत्म करने का षड्यंत्र : डेमका सोय

भूमि बचाओ संघर्ष समिति (कोल्हान) के संयोजक डेमका सोय ने केंद्र सरकार के नए वन संरक्षण संशोधन विधेयक का पुरजोर विरोध किया. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पूंजीपतियों के हाथों देश को गिरवी रखना चाहती है, इसीलिए इस तरह का विधेयक ला रही है. उक्त विधेयक के कानून बन जाने से वनों का तेजी से कटाव होगा. पूंजीपति वनों का अपने तरीके से उपयोग करेंगे. ग्रामसभा का महत्व कम हो जाएगा.

चाईबासा

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यह वन को खत्म करने की साजिश है : पंडित महतो

चाईबासा के जन रक्षा संघर्ष समिति के संयोजक पंडित महतो कहते हैं कि केंद्र सरकार की ओर से जिस तरह का वन क्षेत्र अधिग्रहण करने को लेकर कानून तैयार किया जा रहा है, वह वन को खत्म करने की साजिश है. मौजूदा स्वरूप में लागू करने से वनों का तेजी से विनाश होगा. पेसा और वन अधिकार कानूनों का महत्व कम हो जायेगा. आदिवासी तथा वन में रहने वाले समुदायों के अधिकारों का और अधिक हनन होगा. वन भूमि के संरक्षण के नाम पर वनों के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा.

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alt="" width="150" height="150" />इस विधेयक से हमारा ही विनाश होगा : अशोक तांती

चाईबासा के जन रक्षा संघर्ष समिति के अध्यक्ष अशोक तांती कहते हैं कि केंद्र सरकार के विधेयक से हमारा विनाश होगा. सरकार को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. जल, जंगल व जमीन है तो मानव जीवन धरती पर है. यदि पूरी तरह से केंद्र सरकार वनों को अपने कब्जे में ले लेगी तो बड़े-बड़े उद्योगों का निर्माण होगा. वनों की कटाई होगी. लोगों को खदेड़ा जायेगा. जीव-जंतु के लिये जगह नहीं होगा. कई पेड़ों को काटा जायेगा. सिर्फ पूंजीपतियों के लाभ हेतु पूरे समाज को खत्म करना होगा. इस तरह का विधेयक का विरोध करते हैं.

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alt="" width="150" height="150" />विधेयक का विरोध किया जाएगा : सोनाराम महतो

चाईबासा के सामाजिक कार्यकर्ता सोनाराम महतो कहते हैं कि वनों की रक्षा करने को लेकर कई तरह के आंदोलन नियमित रूप से चल रहे हैं. कई पीढ़ी से चलते आ रहा है. आगे भी यह आंदोलन चलता रहेगा. सरकार ने जिस तरह की योजना तैयार की है, उसे धरातल पर लागू करने नहीं दिया जाएगा. जल, जंगल व जमीन की रक्षा करना हमारा दायित्व है. इस दायित्व को निभाने के लिये हमें आंदोलन करना होगा. यदि केंद्र सरकार वन संबंधित विधेयक को पारित कर धरातल पर लायेगी तो इसका विरोध किया जायेगा.

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alt="" width="150" height="150" />विधेयक को पारित नहीं होने दिया जाएगा : अर्पित सुमन

चाईबासा महिला कॉलेज की शिक्षिका सह सामाजिक कार्यकर्ता अर्पित सुमन टोपनो कहती हैं कि वन (संरक्षण) संशोधन विधेयक- 2023 संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन इसको किसी भी हाल में पारित नहीं होने दिया जायेगा. केंद्र सरकार संरक्षण के नाम पर पूरा वनों का अधिकार अपने पास रखना चाह रहा है, ताकि यहां के वनों को पूंजीपतियों के हाथ में बेच दे. इस तरह से होने नहीं दिया जायेगा. सरकार ने जिस तरह की योजना बनायी है इसको पूरा नहीं होने दिया जाएगा. झारखंड में वनों की संख्या अधिक है.

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alt="" width="150" height="150" />इस विधेयक से वनों को खत्म किया जाएगा : सन्नी सिंकू

चाईबासा के झारखंड पुनरुत्थान अभियान के संयोजक सन्नी सिंकू कहते हैं कि सरकार की योजना को पूरी तरह से विफल करने की योजना अब सामाजिक संगठन को तैयार करना है. पारी-पारी कर केंद्र सरकार हर क्षेत्र को प्राइवेट क्षेत्र बनाने की योजना बना रही है. वन विधेयक लाकर यहां के जल, जंगल, जमीन पर नजर डाला गया है. इस विधेयक से झारखंड में वनों को खत्म किया जायेगा.

चक्रधरपुर

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जल, जंगल, जमीन आदिवासियों की पहचान है : दयासागर केराई

चक्रधरपुर के गुलकेड़ा गांव निवासी समाजसेवी दयासागर केराई कहते हैं कि वन संरक्षण संशोधन विधेयक लाये जाने से पूंजीपतियों को लाभ मिलेगा. जल, जंगल, जमीन ही आदिवासियों की पहचान है. जंगल में ही आदिवासी निवास करते हैं. पेड़-पौधों की पूजा-अर्चना की जाती है. यह विधेयक लाकर मनमाने तरीके से पेड़ों को काटा जाएगा. इससे सीधे तौर पर जंगल व सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों को नुकसान पहुंचेगा. इसका विरोध संगठित होकर करना होगा. वनों का निजीकरण किया जाना गलत है. हमारा क्षेत्र वनों से भरा क्षेत्र है. ऐसे में विकास के नाम पर ग्रामीणों को ठगना गलत है.

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alt="" width="150" height="150" />विकास के नाम पर तेजी से किया जा रहा विनाश : गंगाराम गागराई

चक्रधरपुर के सुदूरवर्ती क्षेत्र भरनिया गांव निवासी समाजसेवी गंगाराम गागराई कहते हैं कि विकास के नाम पर तेजी से विनाश भी किया जा रहा है. वन संरक्षण संशोधन विधेयक लाकर तेजी से वनों की कटाई की जाएगी. जंगल में रास्ते व अन्य विकास कार्य कर जंगल को उजाड़ने का काम किया जाएगा. जंगल पर ही आदिवासी निर्भर रहते हैं. जंगल की जड़ी-बूटियों, पत्ते, फल-फूल इत्यादि बेचकर गरीब आदिवासी अपना जीवन यापन करते हैं. ऐसे में आदिवासियों के जंगल पर कब्जा करने की रणनीति पूरी तरह गलत है. इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

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alt="" width="150" height="150" />वन को खत्म करने की योजना सफल नहीं होने देंगे: रमेश कोड़ाह

चक्रधरपुर के सिलफोड़ी पंचायत के पुसालोटा गांव निवासी वन रक्षा समिति के अध्यक्ष रमेश कोड़ाह ने कहा कि वनों की रक्षा के लिए हम लगातार प्रयासरत हैं. ऐसे में विधेयक लाकर जंगल को समाप्त करने की योजना बनायी गई है, जिसे कभी सफल नहीं होने दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि आदिवासियों का प्राण जंगल में ही बसता है. हमारे सारे पर्व-त्योहार जंगल व प्रकृति से ही जुड़े हैं. विधेयक लाकर विकास के नाम पर जंगलों को समाप्त करने की योजना कभी सफल नहीं होने दी जाएगी. वन रक्षा समिति वनों की कटाई रोकने का काम करते आ रही है.

बहरागोड़ा

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इससे सिर्फ वनों के निजीकरण को ही बढ़ावा मिलेगा: स्वपन महतो

संसद में पेश वन संरक्षण संशोधन विधेयक - 2023 वनों के विनाश का कारण बनेगा. यह विधेयक जल, जंगल, जमीन को खत्म करने की साजिश है. उक्त बातें बहरागोड़ा निवासी सीपीआई (एम) के झारखंड राज्य कमेटी के सदस्य सपन कुमार महतो ने कही. उन्होंने कहा कि विधेयक के लागू करने से वनों का तेजी से विनाश होगा और पेसा और वन अधिकार कानूनों का महत्व कम हो जाएगा. आदिवासी तथा वन में रहने वाले विभिन्न गांव के ग्रामीणों के अधिकारों का हनन होगा. वनों के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा और वनों पर पूंजीपतियों का कब्जा होगा. वन्य जीव प्राणियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा. यह अधिनियम प्रकृति के लिए विनाशकारी साबित होगा. सभी जानते हैं कि वन आदिवासियों के लिए कितना महत्वपूर्ण है. यह उनके आवास क्षेत्र में आता है. वे हमेशा से इसके संरक्षण के लिए कार्य करते रहते हैं. पेड़ों की रक्षा करते हैं. वहां से कंद-मूल लेते हैं. वहां से कई तरह की जरुरतें पूरी होती हैं. जब वहां पर पूंजीपतियों का प्रवेश होगा तो इसका असर पड़ेगा. सरकार को इसे समझना होगा.

घाटशिला

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वन अधिकार कानूनों के महत्व पर पड़ेगा असर : बहादुर सोरेन

केंद्र सरकार के वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 के मसौदे में शामिल किए गए प्रस्तावों पर वन अधिकार अधिनियम पर काम करने वाले माझी परगना महाल के देश विचार सचिव सह सामाजिक कार्यकर्ता बहादुर सोरेन ने कहा कि मौजूदा स्वरूप को लागू करने से वनों का तेजी से विनाश होगा. पेसा और वन अधिकार कानूनों के महत्व पर काफी बुरा असर पड़ेगा. आदिवासी तथा वन क्षेत्र में रहने वाले समुदायों के अधिकारों का और अधिक हनन होगा. वन भूमि के संरक्षण के नाम पर वनों के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा. इसलिए माझी परगना महाल इसका पुरजोर विरोध करता है.

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alt="" width="150" height="150" />इस विधेयक लागू होने से वन को काफी नुकसान होगा : सुधीर

वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 के संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता सह माझी परगना महाल के पूर्व जिला महासचिव सुधीर सोरेन ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी वन अधिकार अधिनियम 2006 लागू किया गया था. उसे पूरी तरह समाप्त करने की साजिश रची जा रही है. वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 के लागू होने से वर्षों वर्ष से वन भूमि पर रह रहे वैसे लोग जिनका रोजगार का साधन वनों का उत्पाद ही है, उन्हें काफी नुकसान होगा. वन संरक्षण संशोधन के लागू होने से जंगलों का विनाश शुरू हो जाएगा.

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alt="" width="150" height="150" />इससे वनवासियों का अधिकार समाप्त हो जाएगा : मनसा हेम्ब्रम

केंद्र सरकार के वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 के संबंध में पूछे जाने पर घाटशिला के सामाजिक कार्यकर्ता मनसा हेम्ब्रम ने बताया कि इस विधेयक के लागू हो जाने से वनों की रक्षा संरक्षण व अन्य सभी मामलों से स्थानीय वनवासियों का अधिकार समाप्त हो जाएगा. पूरा अधिकार केंद्र सरकार के अधीन रहेगा. इससे ना तो वनों की रक्षा हो पाएगी, न ही संरक्षण इस विधेयक के लागू होने से अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी वन अधिकार अधिनियम 2006, 2008 पूरी तरह समाप्त करने की संभावना है. स्थानीय लोगों का वनों से अधिकार खत्म करने की साजिश है.

हजारीबाग

जल, जंगल, जमीन के विनाश की शर्त पर विकास के कार्य नहीं होने चाहिए

वन (संरक्षण) संशोधन विधेयक- 2023 संसद में पेश किया जा चुका है. केंद्र सरकार के वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 के मसौदे में शामिल किए गए प्रस्तावों पर वन अधिकार अधिनियम पर काम करने वाले राज्य के सामाजिक कार्यकर्ता चिंतित हैं. इस पर हजारीबाग के पर्यावरणविद्, जनजातीय समुदाय से जुड़े लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जल, जंगल, जमीन के विनाश के शर्त पर विकास का कार्य नहीं हो. इसमें ही सभी की भलाई है. बल्कि इसे बढ़ाने के बारे में गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए.

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alt="" width="150" height="150" />पूरे जंगल को बचाते हुए नियम बने : शुभाशीष दास

पर्यावरण से जुड़े मेगालिथ शोधकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता शुभाशीष दास कहते हैं कि जंगलों को बचाते हुए नियम बने. ऐसे कानून बने जिससे वन को कोई नुकसान नहीं हो. जिस प्रकार गांव-शहर में मानव रहते हैं, उसी प्रकार हर जीवों का अपना प्राकृतिक आवास है. सभी प्राणियों को जीने का समान अधिकार है. मानव अपने स्वार्थ के लिए अन्य प्राणियों के प्राकृतिक आवास का क्षरण कैसे कर सकता है. ऐसे में हमें जल, जंगल, जमीन की रक्षा करते हुए नियम बनाने की जरूरत है. ग्लोबल वार्मिंग से अगर पृथ्वी को बचाना है, तो वनों को सहेजना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए. वैसे भी पर्यावरण दूषित हो रहा है. आज सभी इसका परिणाम भुगत रहे हैं. इसलिए इस पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है.

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alt="" width="150" height="150" />इस विधेयक से लोगों की चिंता बढ़ी है : मृत्युंजय शर्मा

इस विधेयक को लेकर लोगों की चिंता बढ़ गई है. इको क्लब के अध्यक्ष मृत्युंजय शर्मा कहते हैं कि जंगलों के विनाश के शर्त पर कोई विधेयक नहीं हो. पर्यावरण की सुरक्षा हमारी पहली शर्त हो. जो भी नियम बनाए जाएं, उसमें जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा की ख्याल रखा जाए. प्रकृति ने हमें सुंदर उपहार दिए हैं. उन्हें सहेजकर रखना हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए. विधेयक में इन बातों का ख्याल रखा जाना चाहिए. जंगल है तो हम हैं. इसके बिना जीवन संभव नहीं है. जहां तक हो सके इसे बढ़ाने पर विचार करना चाहिए. पेड़-पौधे लगाना चाहिए. लेकिन यहां पर ऐसा कानून बनाया जा रहा है, जिससे वन को नुकसान होगा. नए कानून से माइनिंग और बड़े प्रोजेक्ट पर काम होंगे. इसका असर पड़ेगा.

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alt="" width="150" height="150" />पर्यावरण संरक्षण के लिए एक बैरियर हो : सत्यप्रकाश

वन्य संरक्षण पर काम करनेवाले पर्यावरणविद् सह सामाजिक कार्यकर्ता सत्यप्रकाश कहते हैं कि पर्यावरण संरक्षण के लिए बैरियर तो होना ही चाहिए. किसी भी विधेयक को संशोधित या पारित करने के लिए उसमें उस विधा से जुड़े विशेषज्ञों की राय महत्वपूर्ण होती है. वन या वन्यप्राणी मामले में भी इन बातों का ख्याल रखा जाना चाहिए. वन सुरक्षा समिति के विमर्श के बाद ही कोई काम होना चाहिए. वन प्रकृति का दिया अनमोल उपहार है. इसका संरक्षण और संवर्धन ही हमारे जीवन को सुरक्षित रख सकता है. केंद्र सरकार संरक्षण के नाम पर पूरा वनों का अधिकार अपने पास रखना चाह रही है, ताकि यहां के वनों को पूंजीपतियों के हाथ में बेच दे. यह ठीक नहीं है. हमें इसकी रक्षा करने और इसका क्षेत्र बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए. जाहिर है नहीं तो आनेवाले दिनों में समस्या और बढ़ेगी. पानी की भी कमी होगी.

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alt="" width="150" height="150" />विधेयक पर पुनर्विचार करने की जरूरत : अनूप

जनजातीय समुदाय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता राजेश अनूप लकड़ा कहते हैं कि केंद्र सरकार को विधेयक पर पुनर्विचार करने की जरूरत है. जंगल में इंडस्ट्री बैठाकर वनों का विनाश करना उचित नहीं है. अगर उद्योग लगाना ही है तो कहीं और करना चाहिए. कहीं-न-कहीं अब तक सबकुछ ठीक चल रहा था. अब विधेयक से प्रकृति के साथ छेड़छाड़ मानव व अन्य जीवों के लिए उचित नहीं होगा. केंद्र सरकार को सामाजिक कार्यकर्ताओं से सलाह-मशविरा करके ही कोई विधेयक लाना चाहिए. इससे वन, वन्यप्राणी और वनवासियों सबका संरक्षण होगा. बिना विशेषज्ञों के विधेयक में संशोधन से वनों का विनाश होगा. नए कानून से रणनीतिक संरचना, बड़े सोलर पार्क, इको-टूरिज्म, व्यावसायिक, वनीकरण जैसी आर्थिक गतिविधियों को आसान होंगी. इसका असर ठीक नहीं होगा.

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alt="" width="150" height="150" />पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून बनना चाहिए: मनोज कुमार

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मनोज कुमार कहते हैं कि पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून बने, न कि उसके विनाश के लिए. कोई भी विधेयक पारित करने से पहले, यह बात का मूल्यांकण होना चाहिए कि उसका प्रभाव क्या पड़ेगा. अगर जंगल बचता है, तो वह विधेयक बेहतर है. आखिर जंगल हमारे लिए सबसे अधिक जरूरी है. इसे बढ़ाने पर विचार करना चाहिए. इसके लिए काम होना चाहिए. लेकिन विनाश की शर्त पर कोई कानून लागू नहीं होना चाहिए. पर्यावरण संरक्षण सभी लोगों का परम कर्तव्य होना चाहिए. बिना पर्यावरण सुरक्षा के हम जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं. इसके लिए कोई कानून बनाने के पहले वनों के हितों को ध्यान में रखने की जरूरत है. ताकि सभी लोगों को इसका फायदा हो.

लातेहार

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यहां वन भूमि पर अतिक्रमण को रूकना जरुरी है : विनोद उरांव

जिला परिषद सदस्य विनोद उरांव ने कहा कि वन भूमि पर अतिक्रमण रूकनी चाहिए. जंगल के बिना जीवन की उम्मदी नहीं की जा सकती है. यह पर्यावरण के लिए अच्छा है. लेकिन केंद्र सरकार वन संरक्षण संशोधन विधयेक 2023 में जो कानून बनाने जा रही है, उससे नुकसान अधिक होने की संभावना है. इस कानून की वजह से वन क्षेत्र में व्यवसायिक गतिविधियां बढ़ेंगी. इसका असर पूरे इलाके पर पड़ेगा. एक बार कानून बन जाने के बाद उसमें बदलाव करना मुश्किल होगा. इससे वन भूमि के संरक्षण के नाम पर वनों के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा. इससे आगे लोगों को काफी नुकसान होगा.

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alt="" width="150" height="150" />इस विधेयक के लागू होने से पेशा कानून कमजोर होगा : नगेशिया

नेतरहाट मुखिया रामविशुन नगेशिया ने कहा कि इस विधेयक के आने से पेशा व वन अधिकार काननू का प्रभाव कम होगा. परियोजनाओं के लिए वन भूमि का अधिग्रहण करने से न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान होगा वरन जंगलों में सदियों से रहने वाले आम आदिवासियों की जिंदगी भी प्रभावित होगी. जल, जंगल व जमीन है तो मानव जीवन है. यदि पूरी तरह से केंद्र सरकार वनों को अपने कब्जे में ले लेगी तो बड़े-बड़े उद्योगों का निर्माण होगा. वहां पर कई तरह के अवैध कार्य भी होंगे. वनों की कटाई होगी. लोगों को हटाया जायेगा. जीव-जंतु के लिये जगह नहीं होगा. कई पेड़ों को काटा जायेगा.

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alt="" width="150" height="150" />इस कानून के लागू होने से आधी आबादी प्रभावित होगी : रवि डे

सामाजिक कार्यकर्ता रवि कुमार डे ने कहा कि इस विधेयक के आने से जंगल पर निर्भर राज्य की 50 प्रतिशत आबादी प्रभावित होगी. राज्य की अधिकांश आबादी जंगलों में रहती है. खासकर आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए अब भी जंगल ही सबकुछ है. वहां से बहुत कुछ प्राप्त करते हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं. इस कानून के बन जाने से सभी का प्रवेश होगा. वृक्ष काटे जाएंगे. रक्षा संबंधी परियोजना, अर्द्धसैनिक शिविर के मामले में राज्य सरकार की शक्तियां शिथिल हो जायेगीं. इसका पूरे इलाके पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा. हम इस तरह के विधेयक का विरोध करते हैं.

रांची

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यहां वन में रहने वाले लोग जंगल पर निर्भर हैंः अभय भुटकुंवर

इस संशोधन में ग्राम सभा की शक्तियों को कम कर दिया गया है, जो पूरी तरह से जंगल के हितों के विरूद्ध है. जंगल में रहने वाले लोग जंगल पर निर्भर हैं. वे प्रकृति की रक्षा करते हैं. उद्योगों का लाभ उन्हे नहीं मिल पाता है. ये संशोधन उन्हे उनके हक से और वंचित करेगा. वैसे भी जहां तक पर्यावरण की बात है तो इससे नुकसान होगा. कहा कि मौजूदा स्वरूप में विधेयक लागू करने से वनों का तेजी से विनाश होगा. पेसा और वन अधिकार कानूनों का महत्व कम हो जाएगा. जंगलों को उद्योगपतियों को बेचना चाहती है भाजपा सरकारः सतीश आदिवासी नेता सतीश पाल ने कहा बीजेपी उद्योगपतियों की पार्टी है. उसकी नीति ही है उद्योगपतियों का हित और गरीब, आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यकों का अहित. ये संशोधन विधेयक भी वही है. ये सरकार जंगलों को भी उद्योगपतियों के हाथों बेचना चाहती है. इनके अधिकारों को समाप्त करना चाहती है. ऐसे नहीं चलेगा. कहा कि विधेयक के कानून का रूप लेते ही जंगल पर निर्भर राज्य की बड़ी आबादी प्रभावित होगी. वन भूमि के डायवर्सन के लिए सरल मानदंड तय हैं, जो झारखंड के मौजूदा वन संरक्षण अधिनियम के सुरक्षात्मक आवरण से बाहर कर देगा. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/06/25-Ranchi-Satish-pal-150x150.jpg"

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इससे जंगल और वहां को लोगों को भारी क्षति होगीः प्रभाकर तिर्की

ये एक्ट इसलिए लाया गया था कि जंगलों के अंदर रहने वाले आदिवासी खेती कर सकें और उसका स्वामित्व भी उनके पास हो. इसके अलावा वे जंगल की रक्षा भी करते थे. लेकिन सरकार को ये पसंद नहीं. इससे ग्रामसभा की शक्तियां छीन जाएंगी. जंगलों को भारी क्षति होगी. ये संशोधन पूरी तरह से गलत है. कहा कि आदिवासियों के लिए जंगल काफी महत्वपूर्ण है. वे हैं तो इसकी रक्षा होती है. आज जंगल की हरियाली है तो इसका श्रेय आदिवासियों को जाता है. यदि यह कानून लागू होगा तो वन क्षेत्र पर इसका गलत असर पड़ेगा.

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alt="" width="150" height="150" />यह विधेयक पूरी तरह से आदिवासियों के खिलाफ है : प्रेम शाही मुंडा

ये संशोधन पूरी तरह से आदिवासियों के खिलाफ है. इसका खामियाजा आदिवासी समाज को भुगतना पड़ेगा. आदिवासी जन परिषद् इसे लेकर काफी गंभीर है. इस संशोधन का गहन अध्ययन कर रहा है. इसका व्यापक विरोध किया जाएगा. झारखंड के परिप्रेक्ष्य में भी ये आदिवासियों के नुकसान में है. परिषद् इसका पुरजोर विरोध करेगी. जहां जंगल को बचाने की बात होनी चाहिए, वहां इसमें कटौती की बात हो रही है. यह ठीक नहीं है. वैसे भी पर्यावरण को बचाने की बात होनी चाहिए, लेकिन यहां पर तो इसे कम करने या घटाने की बात हो रही है.

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alt="" width="150" height="150" />इससे वन भूमि में रहनेवालों को नुकसान होगा : फूलचंद तिर्की

केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा कि वन अधिकार कानून 2006 में वनों में रहने वाले लोगों को अधिकार दिया गया था. उनके अधिकारों का संरक्षण किया गया था, लेकिन वन अधिकार (संशोधन) विधेयक 2023 से आदिवासी और वन उजड़ेंगे. वनों में रहने वाले लोगों के अधिकारों का हनन होगा. बाहरी लोगों का दखल वनों में बढ़ेगा. वन भूमि और वनोपज का उपयोग उद्योग और कारखानों के लिए होगा. यह पेसा कानून का भी उल्लंघन है. वन भूमि में रहने वाले लोगों को बड़ा नुकसान होने वाला है. [wpse_comments_template]

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