Lagatar Desk
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरु करने की अनुमति मांगी है. इसे लेकर उन्होंने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखा है. पत्र में कोर्ट ऑफ कंटेम्प्ट एक्ट, 1971 की धारा 15(1)(बी) और धारा 2(सी) का हवाला दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट में किसी के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका दायर करने से पहले अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित अनुमति जरूरी होती है.
अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने आरोप लगाया है कि ज्ञानेश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों की जानबूझकर अवहेलना की है जो चुनाव आयोग के कामकाज को तय करते हैं. खासकर टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ और अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ के फैसलों का.
फैसलों के मुताबिक क्या ग़लत
- चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है.
- मुख्य चुनाव आयुक्त “प्राइमस इंटर पारेस” (समानों में प्रथम) हैं, पूर्ण शासक नहीं.
- आयोग के फैसले पूरे आयोग के होते हैं, सिर्फ अध्यक्ष के नहीं.
- CEC को संस्था से बड़ा नहीं बनाया जा सकता.
अधिवक्ता का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने आयोग को “एक व्यक्ति की तानाशाही” में बदल दिया है. इससे संस्था की गरिमा घटी और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव का सिद्धांत प्रभावित हुआ, जो संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना जाता है.
उल्लेखनीय है 23 सितंबर 2026 को अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई.
किन बिंदुओं पर आपत्तियां
- मतदाता पंजीकरण सॉफ्टवेयर में बड़े बदलाव.
- फॉर्म-6 में परिवर्तन.
- स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया.
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों आयुक्तों का आरोप था कि ये कदम उनकी जानकारी या पूरे आयोग की मंजूरी के बिना “अनधिकृत और गैरकानूनी” तरीके से लिए गए. हालांकि चुनाव आयोग की तरफ से सफाई दी गई कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से लिए जाते हैं और तीनों आयुक्तों के हस्ताक्षर होते हैं.