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MNREGA के दैनिक मजदूरी पर नियुक्त कर्मियों को आउटसोर्सिंग के तहत स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए : HC

MNREGA योजना के तहत दैनिक मजदूरी पर नियुक्त कंप्यूटर ऑपरेटर मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने एक फैसला सुनाया है.  हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में सरकार को निर्देश दिया गया है कि कार्यरत कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग के तहत स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए.
 
कोर्ट-कचहरी की खबरें
  • याचिकाकर्ता के लिए स्वीकृत पद सृजित किए जाएं और उन्हें उन पदों के विरुद्ध समायोजित किया जाए
  • सरकार को अपने कर्मचारियों को कुछ ठेकेदारों की दया पर नहीं छोड़ना चाहिए

Ranchi :  MNREGA योजना के तहत दैनिक मजदूरी पर नियुक्त कंप्यूटर ऑपरेटर मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने एक फैसला सुनाया है.  हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में सरकार को निर्देश दिया गया है कि कार्यरत कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग के तहत स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए.

 

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को 2007 के नियमों के सुरक्षा दायरे में रखते हुए स्वीकृत पद सृजित किए जाएं और उन्हें उन पदों के विरुद्ध समायोजित किया जाए. मामले में सोनू प्रसाद एवं अन्य के अलावा महिमा प्रकाश केरकेट्टा एवं अन्य की ओर से याचिका दाखिल की गई थी.

 

कोर्ट ने सुनवाई के बाद यह निर्णय दिया कि जिन कर्मचारियों की सेवा 10 वर्ष से अधिक समय से जारी है, उन्हें नियमित कर्मचारी के रूप में योजना के अंतर्गत रखा जाना चाहिए.  

 

MNREGA योजना के अंतर्गत रोजगार 2007 के सेवा नियमों द्वारा शासित होता है. इस योजना के तहत नियुक्त या नियमित कर्मचारियों को नियमों का सुरक्षित संरक्षण प्राप्त होता है और शोषण की संभावना कम होती है, उन्हें नियमित वेतन भुगतान और नौकरी की सुरक्षा का लाभ भी मिलता है.

 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे ठेकेदार की शोषणकारी प्रथाओं से सुरक्षित रहते हैं. उन्हें सरकार द्वारा समय-समय पर जारी की जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी मिलता है. यह संवैधानिक दायित्व है कि प्रत्येक सरकार अपने कर्मचारियों के कल्याण और हित में कार्य करे. अपने नागरिकों से किए गए उस वादे को निभाने के लिए, सरकार को अपने कर्मचारियों को कुछ ठेकेदारों की दया पर नहीं छोड़ना चाहिए.

 

दरअसल, मामले के याचिकाकर्ताओं को शुरू में MNREGA योजना के तहत कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में नियुक्त किया गया था. उन्हें दैनिक मजदूरी के आधार पर काम पर रखा गया था और उन्होंने MNREGA योजना के तहत सरकार के लिए काम किया था.

 

उन्होंने MNREGA योजना के तहत सरकार के लिए 15 वर्ष या उससे अधिक समय तक काम किया और उन्हें योजना के नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन दिया जाता था. याचिकाकर्ता का कहना था  कि सरकार द्वारा अचानक यह निर्देश दिया गया कि कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग कंपनियों में स्थानांतरित कर दिया जाएगा और इस प्रकार इस योजना में सरकार की भूमिका और कर्मचारियों को दी गई वैधानिक सुरक्षा समाप्त हो जाएगी.

 

ऐसे में अब उनका रोजगार उन्हें काम पर रखने वाले ठेकेदारों की दया पर निर्भर करेगा और उन्हें नियमित MNREGA कर्मचारियों की तरह वेतन सुरक्षा आदि का लाभ नहीं मिलेगा. 

 

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सौरभ शेखर ने कोर्ट के समक्ष यह तर्क दिया कि कर्मचारियों को कानून के शासन और अधिनियम के प्रावधानों के संरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए. आउटसोर्सिंग के तहत दिए गए रोजगार असुरक्षित होते हैं और ठेकेदारों की दया पर निर्भर होते हैं. ठेकेदार कर्मचारियों के साथ अनुचित व्यवहार करते हैं और कई बार यह शोषण का मामला होता है.

 

वहीं सरकार का कहना था कि याचिकाकर्ताओं को unsanctioned  पदों पर दैनिक मजदूरी पर रखा गया था और उन्हें मानदेय का भुगतान किया गया था. सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि श्रमिकों को योजना के तहत नियमित रूप से नियुक्त नहीं किया गया था, इसलिए उन्हें इस योजना में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती. ऐसे में उनकी सेवाओं को आउटसोर्सिंग ठेकेदारों को हस्तांतरित करना सही निर्णय है.

 

 

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