
देव कुमार धान
पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) के नियम 30 (1)(क) को लेकर आदिवासी क्षेत्रों में नई बहस छिड़ गई है. इस नियम के तहत ग्राम सभा को अपने क्षेत्र में उपलब्ध लघु खनिज जैसे मिट्टी, पत्थर, रेत और मोरम का उपयोग अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार करने का अधिकार दिया गया है. साथ ही नियम 30 (1) में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में संबंधित ग्राम सभा की पूर्व सहमति के बिना कोई खनन पट्टा जारी नहीं किया जा सकता.
हालांकि इन प्रावधानों को जब PESA नियमावली 2025 के नियम 2(छ), 3, 4, 5 तथा प्रपत्र–1 और प्रपत्र–2 के साथ पढ़ा जाता है, तो कई गंभीर प्रश्न सामने आते हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लघु खनिजों पर किस ग्राम सभा का अधिकार होगा. राजस्व गांव की ग्राम सभा का या फिर टोला स्तर पर गठित नई ग्राम सभा का?
नियम 2(छ), 3, 4 और 5 के तहत प्रत्येक टोले को अलग ग्राम सभा बनाने और नए गांव के रूप में मान्यता प्राप्त करने का अवसर मिलता है. ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि जिन टोलों के भौगोलिक क्षेत्र में लघु खनिज उपलब्ध हैं, वे स्वयं को अलग गांव और अलग ग्राम सभा घोषित कर नियम 30(1)(क) के तहत उन खनिजों पर विशेष अधिकार का दावा कर सकते हैं. इससे मूल राजस्व गांव के अन्य टोलों के निवासी संसाधनों से वंचित हो सकते हैं, जिनका वे पारंपरिक रूप से सामूहिक उपयोग करते आए हैं.
वर्तमान में राजस्व गांव की ग्राम सभा अपने अधीन सभी टोलों के हित में, अनादिकाल से अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार लघु खनिजों का सामूहिक उपयोग करती रही है. लेकिन नई नियमावली के तहत यदि खनिज-संपन्न टोले अलग गांव बन जाते हैं, तो यह साझा संसाधनों की अवधारणा को कमजोर कर सकता है और गांवों के भीतर विभाजन को बढ़ावा दे सकता है.
PESA नियमावली 2025 के ये प्रावधान भ्रष्ट, लालची और अवसरवादी ताकतों को गांव-गांव में आदिवासी समुदायों को बांटने का मौका दे सकते हैं. इससे न केवल सामाजिक एकता प्रभावित होगी, बल्कि आदिवासी रीति-रिवाजों, परंपराओं और सामुदायिक संसाधन प्रबंधन की परंपरा को भी नुकसान पहुंच सकता है. विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि PESA नियमावली 2025 के नियम 2(छ), 3, 4, 5, प्रपत्र–1, प्रपत्र–2 तथा नियम 30(1)(क) और 30(1) मौजूदा पारंपरिक आदिवासी गांव व्यवस्था और समुदाय आधारित संसाधन उपयोग प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं.
उनका मानना है कि ये प्रावधान PESA अधिनियम, 1996 की मूल भावना के अनुरूप नहीं हैं, जिसमें ग्राम सभा की सामूहिक शक्ति और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को सर्वोच्च माना गया है. इस पृष्ठभूमि में आदिवासी संगठनों और सामाजिक चिंतकों द्वारा इन नियमों पर पुनर्विचार और स्पष्टता लाने की मांग तेज होती जा रही है, ताकि ग्राम सभा की परिभाषा और अधिकारों को लेकर किसी भी तरह का भ्रम या टकराव न उत्पन्न हो.
लेखक मांडर के पूर्व विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं
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